ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इलेक्ट्रिक गाड़ी अब शौक़ की चीज़ नहीं रही। पर हर श्रेणी अलग रफ़्तार से बदल रही है, और जो सबसे पीछे थी वही अब सबसे तेज़ भाग रही है।
वाहन डीलरों के संगठन फ़ाडा के रजिस्ट्रेशन आँकड़ों के मुताबिक़ जुलाई 2026 में देश में 3,27,901 इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बिकीं — किसी भी महीने का अब तक का सबसे बड़ा आँकड़ा और पिछले साल जुलाई से 66 प्रतिशत ज़्यादा। उस महीने कुल 25,91,138 गाड़ियाँ बिकीं, यानी इस डेस्क की गणना से इलेक्ट्रिक का हिस्सा 12.65 प्रतिशत रहा। एक साल पहले यह 9.6 प्रतिशत था।
अब श्रेणीवार देखिए, क्योंकि असली कहानी वहीं है। तिपहिया में इलेक्ट्रिक का हिस्सा 65.1 प्रतिशत है — यानी अब वहाँ इलेक्ट्रिक विकल्प नहीं, आम पसंद है। दोपहिया पहली बार एक महीने में 2 लाख यूनिट पार गए, हिस्सा 11.2 प्रतिशत। कारों में हिस्सा 7.9 प्रतिशत है, पर बढ़त सबसे तेज़ — पिछले साल से 83 प्रतिशत। और व्यावसायिक वाहनों का हिस्सा लगभग तीन गुना होकर रिकॉर्ड 3.57 प्रतिशत पर पहुँचा।
चार श्रेणियाँ, चार रफ़्तारें। तिपहिया 65.1 प्रतिशत, दोपहिया 11.2, कार 7.9 और व्यावसायिक वाहन 3.57 प्रतिशत। कार का आधार सबसे छोटा है और बढ़त सबसे तेज़।
ऑटो वाला सिर्फ़ ख़र्च का हिसाब लगाकर बदल जाता है। कार वाला तीन हिसाब लगाता है — ख़र्च, रास्ते में चार्जिंग, और बेचते वक़्त क़ीमत। इसीलिए कार सबसे बाद में बदली।
एक नज़र में
• जुलाई 2026 में इलेक्ट्रिक बिक्री: 3,27,901 यूनिट — रिकॉर्ड
• बढ़त: पिछले साल जुलाई से 66% से ज़्यादा
• कुल में हिस्सा: 12.65% (कुल 25,91,138 गाड़ियाँ), पहले 9.6%
• कारें: 83% की बढ़त, हिस्सा 7.9%
• दोपहिया: पहली बार 2 लाख यूनिट पार, हिस्सा 11.2%
• तिपहिया: हिस्सा 65.1%
• व्यावसायिक वाहन: रिकॉर्ड 3.57%
ये श्रेणियाँ जिस क्रम में बदलीं, वह संयोग नहीं है और उसमें आगे की तस्वीर छिपी है। तिपहिया सबसे पहले बदला, क्योंकि वहाँ सारा हिसाब चलने के ख़र्च का है — जो चालक रोज़ सौ किलोमीटर चलाता है, उसकी ज़्यादा क़ीमत कुछ ही महीनों में वसूल हो जाती है, और गाड़ी हर रात एक ही जगह लौटती है, इसलिए चार्जिंग की समस्या अपने आप हल हो जाती है। दोपहिया उसी तर्क पर पीछे-पीछे आया। कार सबसे बाद में आनी ही थी, क्योंकि कार ख़रीदने वाला परिवार तीन जोखिम एक साथ उठाता है — चलने का ख़र्च, बीच रास्ते में चार्जिंग मिलेगी या नहीं, और चार साल बाद बेचते वक़्त कितना मिलेगा। इनमें से सिर्फ़ पहला जोखिम कैलकुलेटर से हल होता है।
इसलिए 7.9 प्रतिशत हिस्से पर 83 प्रतिशत की बढ़त का मतलब यह है कि तीसरा जोखिम — दोबारा बेचने की क़ीमत — अब घटने लगा है। किसी भी गाड़ी की रीसेल पर भरोसा दो चीज़ों से बनता है: बाज़ार में पुरानी गाड़ियों की ठीक-ठाक ख़रीद-फ़रोख़्त, और सड़क पर इतनी गाड़ियाँ कि ख़रीदार को लगे तकनीक अनाथ नहीं होगी। मौजूदा संख्या दोनों के क़रीब पहुँच रही है।
ख़रीदने की सोच रहे लोगों के लिए दो काम की बातें। पहली, ये आँकड़े रजिस्ट्रेशन के हैं, कंपनी से डीलर तक भेजी गई गाड़ियों के नहीं — इसलिए ये असली बिक्री दिखाते हैं, स्टॉक नहीं। दूसरी, कार लेते वक़्त बैटरी की वारंटी की शर्तें उतने ही ध्यान से पढ़िए जितनी क़ीमत — कितने साल, कितने किलोमीटर, और कितनी क्षमता बचने तक। आगे का काम भी यहीं से तय होता है: हाईवे पर चार्जिंग की संख्या बढ़े, और पुरानी गाड़ी बेचते वक़्त बैटरी की सेहत का एक तयशुदा प्रमाणपत्र मिलने लगे। ये दो चीज़ें हो जाएँ, तो सबसे तेज़ भाग रही श्रेणी और तेज़ भागेगी।













