ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।बुवाई का आँकड़ा पिछले साल से 1.50 फ़ीसदी पीछे है। सुनने में छोटा लगता है। लेकिन जब आप देखेंगे कि यह कमी किस फ़सल में है, तो बात समझ आएगी।
21 अगस्त 2026 तक देश में खरीफ़ फ़सलों की बुवाई 1,056.70 लाख हेक्टेयर में हुई। पिछले साल इसी तारीख़ तक यह 1,072.77 लाख हेक्टेयर थी। यानी 16.07 लाख हेक्टेयर कम, जो 1.50 फ़ीसदी बैठता है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के इन आँकड़ों में दाल की बुवाई बढ़ी है, जबकि धान, मक्का और रागी का रकबा घटा है।
अब वह हिस्सा जो असल में मायने रखता है। धान — देश की सबसे बड़ी खरीफ़ फ़सल — इस साल 405.10 लाख हेक्टेयर में लगी, जबकि पिछले साल 418.29 लाख हेक्टेयर में थी। यानी अकेले धान में 13.19 लाख हेक्टेयर की कमी, जो 3.15 फ़ीसदी है। सीधी बात यह है कि कुल 16.07 लाख हेक्टेयर की कमी में से क़रीब चार-पाँचवाँ हिस्सा अकेले धान का है।
जहाँ फ़ैसला होता है। धान का खेत। धान को पानी सबसे ज़्यादा चाहिए, इसलिए बारिश में कमी का असर सबसे पहले और सबसे ज़्यादा इसी फ़सल पर दिखता है — बाक़ी फ़सलें बाद में असर दिखाती हैं।
कुल कमी 16.07 लाख हेक्टेयर। इसमें अकेले धान की 13.19 लाख। यह बारिश की कहानी है, किसान की मर्ज़ी की नहीं।
एक नज़र में
• कुल बुवाई (21 अगस्त तक): 1,056.70 लाख हेक्टेयर
• पिछले साल इसी तारीख़ तक: 1,072.77 लाख हेक्टेयर
• कमी: 16.07 लाख हेक्टेयर, यानी 1.50%
• धान: 405.10 लाख हेक्टेयर, पिछले साल 418.29 — 3.15% कम
• बढ़त वाली फ़सल: दलहन
• बारिश: 21 अगस्त तक देश भर में सामान्य से 13% कम
• स्रोत: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
वजह ऊपर से आ रही है। 21 अगस्त तक देश भर में कुल बारिश सामान्य से 13 फ़ीसदी कम रही, और उससे भी बड़ी दिक़्क़त यह रही कि बारिश एकसार नहीं हुई — कहीं ज़्यादा, कहीं बिल्कुल नहीं। धान को सबसे ज़्यादा पानी चाहिए और उसे रोपने की एक तय खिड़की होती है। पानी उस खिड़की में न आए तो किसान या तो दूसरी फ़सल पर चला जाता है, या खेत ख़ाली छोड़ देता है।
इसका आप पर क्या असर पड़ेगा? घबराने की बात नहीं है, पर नज़र रखने की ज़रूर है। देश के पास चावल का सरकारी भंडार बड़ा है, इसलिए राशन की दुकान पर तुरंत कोई असर नहीं दिखेगा। जो असर दिख सकता है, वह खुले बाज़ार के बासमती और अच्छी क़िस्म के चावल के दाम में होगा, और वह भी अक्टूबर-नवंबर की आवक के बाद ही तय होगा। दूसरी तरफ़ एक अच्छी ख़बर भी है — दाल का रकबा बढ़ा है, और भारत को दाल सबसे ज़्यादा बाहर से मँगानी पड़ती है।
आगे का रास्ता वही है जिस पर काम चल रहा है, और जिसकी रफ़्तार बढ़ानी है। कम पानी में तैयार होने वाली धान की क़िस्में, सीधी बुवाई (डीएसआर) की तकनीक जिसमें रोपाई की ज़रूरत नहीं पड़ती, और सूक्ष्म सिंचाई — ये तीनों मिलकर उस खिड़की को चौड़ा कर देते हैं जिसमें किसान को फ़ैसला लेना होता है। जिन राज्यों ने डीएसआर पर ज़ोर दिया है, वहाँ कम बारिश वाले साल में रकबा उतना नहीं गिरा। यही तजुर्बा अब बाक़ी राज्यों तक पहुँचाना है।












