ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन दिल्ली में होते हैं। इस बार ब्रिक्स का विद्वानों वाला मंच लखनऊ में है, और लखनऊ विश्वविद्यालय सिर्फ़ मेज़बान नहीं, सह-आयोजक है। यही इस ख़बर की असली बात है।
18वाँ ब्रिक्स एकेडमिक फ़ोरम लखनऊ में 23 अगस्त 2026 को शुरू हुआ और 25 अगस्त तक चलेगा। इसे ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़), रिसर्च एंड इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर डेवलपिंग कंट्रीज़ (आरआईएस) और लखनऊ विश्वविद्यालय मिलकर करा रहे हैं। यह भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का हिस्सा है। विषय है — “मज़बूती, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास”। तीन दिन में ब्रिक्स देशों के विद्वान, शोधकर्ता और नीति बनाने वाले अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और जलवायु की मज़बूती, स्टार्टअप और एमएसएमई, नई तकनीक और वैश्विक संस्थाओं के सुधार पर बात करेंगे।
यह मंच सबसे कम चर्चा पाता है और सबसे ज़्यादा काम का साबित हुआ है। दरअसल जो बात दो साल बाद नेताओं की घोषणा में छपती है, वह पहले यहीं तय होती है। नया विकास बैंक हो, आपसी मुद्राओं में लेन-देन की बात हो या डिजिटल भुगतान पर सहयोग — ये सब पहले इसी शैक्षिक मंच के काग़ज़ों में आए। और इस साल बात और बड़ी है, क्योंकि ब्रिक्स अपने सहयोग के बीस साल पूरे कर रहा है और अध्यक्षता भारत के पास है।
बीस साल का ब्रिक्स। 2025 के शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स नेता। 2026 की अध्यक्षता भारत के पास है, और लखनऊ में इस हफ़्ते जो बहस हो रही है उसी से नेताओं के लिए पहला मसौदा बनता है।
घोषणापत्र दो बार लिखा जाता है। दूसरी बार कैमरे के सामने राजधानी में। पहली बार बिना कैमरे के, किसी सेमिनार हॉल में।
एक नज़र में
• आयोजन: 18वाँ ब्रिक्स एकेडमिक फ़ोरम, लखनऊ, 23–25 अगस्त 2026
• आयोजक: ओआरएफ़, आरआईएस और लखनऊ विश्वविद्यालय
• विषय: मज़बूती, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास
• मौक़ा: भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता; समूह के सहयोग के बीस साल
• तकनीक पर चर्चा: एआई, क्वांटम और डिजिटल पब्लिक इन्फ़्रास्ट्रक्चर
• आगे कहाँ जाता है: शेरपा प्रक्रिया और नेताओं का घोषणापत्र
लखनऊ में होने का मतलब सिर्फ़ जगह बदलना नहीं है। भारत के बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन आमतौर पर दो-तीन शहरों में सिमटे रहते हैं, और इसका नतीजा यह होता है कि देश के सबसे बड़े राज्यों के विश्वविद्यालय उस कमरे के बाहर रह जाते हैं जहाँ विदेश नीति पर बात होती है। यहाँ लखनऊ विश्वविद्यालय सह-आयोजक है। यानी उत्तर प्रदेश के शोध छात्र तीन दिन उन्हीं सत्रों में बैठेंगे जिनमें ब्राज़ील, रूस, चीन और दक्षिण अफ़्रीका के प्रतिनिधि हैं। जी-20 अध्यक्षता के समय भारत ने 50 से ज़्यादा शहरों में 200 से ज़्यादा बैठकें कराकर यह तरीक़ा आज़माया था — यह उसी का अगला क़दम है।
बात के मुद्दे भी भारत के अपने हैं। डिजिटल पब्लिक इन्फ़्रास्ट्रक्चर सबसे साफ़ उदाहरण है — भारत ने पहचान, भुगतान और डेटा साझा करने का ढाँचा सरकारी पटरी की तरह बनाया, निजी प्लेटफ़ॉर्म की तरह नहीं। सवाल यह है कि क्या यही ढाँचा उन देशों में भी चल सकता है जहाँ सरकारी क्षमता कम है। एआई पर विकासशील देशों की चिंता बड़े मॉडल नहीं, बल्कि कंप्यूटिंग तक पहुँच और अपनी भाषाओं की जगह है। आगे की राह यह है कि इस फ़ोरम की सिफ़ारिशें छपें, उन्हें आगे ले जाने वाले कार्यसमूह का नाम तय हो, और अध्यक्षता ख़त्म होने से पहले उन पर प्रगति बताई जाए। लखनऊ की परीक्षा मंगलवार के समापन सत्र में नहीं होगी — वह तब होगी जब नेताओं के घोषणापत्र में यहाँ की बात दिखे।












