ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।महँगाई का आँकड़ा 4.45 फ़ीसदी आया है। लेकिन आपके किचन में जो हो रहा है, वह इस आँकड़े से कहीं ज़्यादा है। और सबसे बड़ी बात यह है कि गाँव शहर से ज़्यादा चुका रहा है।
जुलाई 2026 में देश की खुदरा महँगाई दर 4.45 फ़ीसदी रही। जून में यह 4.38 फ़ीसदी थी। यानी सिर्फ़ 0.07 फ़ीसदी की बढ़त, लेकिन यह पिछले उन्नीस महीनों का सबसे ऊँचा आँकड़ा है। खाने-पीने की चीज़ों की महँगाई 5.52 फ़ीसदी पर पहुँच गई, जो जून में 5.32 फ़ीसदी थी।
अब वह बात, जो ज़्यादातर जगह छप ही नहीं रही। गाँवों में महँगाई दर 4.84 फ़ीसदी रही और शहरों में 3.96 फ़ीसदी। यानी गाँव लगभग 0.88 फ़ीसदी ज़्यादा चुका रहा है। खाने-पीने की चीज़ों में भी यही फ़र्क है — गाँव में 5.79 फ़ीसदी, शहर में 5.05 फ़ीसदी। सीधी बात यह है कि जिस परिवार की कमाई सबसे कम है, महँगाई उसी की जेब पर सबसे ज़्यादा भारी पड़ रही है।
यहीं से बनता है आँकड़ा। सब्ज़ी मंडी। महँगाई की दर सैकड़ों चीज़ों की औसत क़ीमत से बनती है। इसीलिए एक अकेली चीज़ 83 फ़ीसदी महँगी हो सकती है और पूरा आँकड़ा फिर भी 5 फ़ीसदी के आसपास रह सकता है।
अदरक 83.62 फ़ीसदी महँगा हुआ। कुल खाने-पीने की महँगाई 5.52 फ़ीसदी रही। दोनों बातें सही हैं — और यही औसत का असली मतलब है।
एक नज़र में
• खुदरा महँगाई, जुलाई 2026: 4.45% (जून: 4.38%)
• खाने-पीने की चीज़ें: 5.52% (जून: 5.32%)
• गाँव: 4.84% · शहर: 3.96%
• गाँव में खाद्य महँगाई: 5.79% · शहर में 5.05%
• सबसे ज़्यादा चढ़ीं: अदरक 83.62%, लहसुन 35.36%, प्याज़ 22.54%
• आधार वर्ष: नई शृंखला, 2024=100
• रिज़र्व बैंक का दायरा: 2 से 6 फ़ीसदी
अब असली वजह। जुलाई में अदरक 83.62 फ़ीसदी, लहसुन 35.36 फ़ीसदी और प्याज़ 22.54 फ़ीसदी महँगे हुए। जो घर हर हफ़्ते ये तीनों ख़रीदता है, उसे महँगाई 4.45 फ़ीसदी नहीं, कई गुना ज़्यादा महसूस होगी। तो क्या आँकड़ा ग़लत है? नहीं। अदरक और लहसुन का हिस्सा पूरे बजट में छोटा होता है, इसलिए औसत में उनका वज़न कम है। आँकड़ा सही-सही यही बता रहा है कि औसत परिवार का ख़र्च 4.45 फ़ीसदी बढ़ा, और मसालों का ख़र्च उससे कहीं ज़्यादा।
राहत की बात यह है कि ये तीनों जल्दी तैयार होने वाली फ़सलें हैं। अनाज या दाल की महँगाई एक पूरा सीज़न लेती है, लेकिन अदरक-लहसुन-प्याज़ की क़ीमतें अगली आवक आते ही उतरने लगती हैं। दूसरी राहत यह कि 4.45 फ़ीसदी अब भी रिज़र्व बैंक के 2 से 6 फ़ीसदी के दायरे के अंदर है — यही वह आँकड़ा है जिस पर ब्याज दरें तय होती हैं।
आगे का रास्ता भी साफ़ है। राशन की दुकान से गेहूँ-चावल मिल जाता है, इसलिए अनाज की महँगाई ग़रीब परिवार को उतना नहीं तोड़ती। दिक़्क़त सब्ज़ी और मसाले में है, जहाँ कोई सरकारी सहारा नहीं है। भारत ने अनाज रखने के लिए गोदाम बहुत बना लिए हैं। अब ज़रूरत कोल्ड स्टोरेज और सब्ज़ी की सीधी मंडी-कड़ी की है — ताकि खेत से थाली तक का सफ़र छोटा हो जाए, और बीच का मुनाफ़ा किसान और ख़रीदार दोनों के हिस्से में आए।












