ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।35 पदक — और वह भी उस खेल में, जिसमें भारत का नाम अब तक कम ही लिया जाता था। पर असली बात पदकों की गिनती नहीं, उनकी क़िस्म है।
भारत ने कॉमनवेल्थ तलवारबाज़ी चैंपियनशिप 2026 में कुल मिलाकर पहला स्थान हासिल किया और पहली बार विल्किंसन स्वोर्ड ट्रॉफ़ी जीती। यह चैंपियनशिप 9 से 14 अगस्त 2026 तक नाइजीरिया के लागोस में हुई। अंडर-23 और सीनियर वर्गों को मिलाकर भारत ने 35 पदक जीते — 13 स्वर्ण, 8 रजत और 14 कांस्य।
बड़ी बात यह है कि सीनियर वर्ग के जो छह टीम स्वर्ण दाँव पर थे, उनमें से पाँच भारत ने जीते — पुरुष सेबर, महिला सेबर, पुरुष एपे, महिला एपे और महिला फ़ॉयल। पुरुष फ़ॉयल में रजत मिला। तलवारबाज़ी में टीम मुक़ाबला जीतना व्यक्तिगत पदक से कहीं कठिन होता है। अकेला खिलाड़ी एक अच्छे दिन पर पदक ले आ सकता है, लेकिन टीम ख़िताब के लिए तीन-चार खिलाड़ी एक जैसे स्तर के चाहिए और साथ में कोच की पैनी नज़र भी।
वह खेल जिसमें भारत नया है। तलवारबाज़ी का एक मुक़ाबला। लागोस का नतीजा टीम स्पर्धाओं पर टिका है, व्यक्तिगत पर नहीं — और यही इसे ज़्यादा मज़बूत नतीजा बनाता है।
एक अच्छा खिलाड़ी व्यक्तिगत पदक दिला देता है। छह में से पाँच टीम स्वर्ण के लिए पूरी क़तार चाहिए।
एक नज़र में
• प्रतियोगिता: कॉमनवेल्थ तलवारबाज़ी चैंपियनशिप 2026
• कब और कहाँ: 9–14 अगस्त 2026, लागोस, नाइजीरिया
• भारत के पदक: 35 — 13 स्वर्ण, 8 रजत, 14 कांस्य
• वर्ग: अंडर-23 और सीनियर
• सीनियर टीम स्वर्ण: छह में से पाँच
• रजत: पुरुष फ़ॉयल
• ट्रॉफ़ी: विल्किंसन स्वोर्ड ट्रॉफ़ी — भारत की पहली
तलवारबाज़ी भारत का पुराना खेल नहीं है, और इसीलिए यह नतीजा और दिलचस्प हो जाता है। इसमें सामान महँगा पड़ता है — मुक़ाबले की तलवार, मास्क, धातु की जैकेट और इलेक्ट्रॉनिक स्कोरिंग मशीन, ये सब मिलाकर ज़्यादातर स्कूलों के पूरे खेल बजट से ज़्यादा बैठते हैं। कोचिंग भी लंबे समय तक बाहर से बुलानी पड़ी है। पिछले दस साल में भारत जिन खेलों में तेज़ी से ऊपर आया है — निशानेबाज़ी, तीरंदाज़ी, मुक्केबाज़ी, कुश्ती और अब तलवारबाज़ी — उन सबका ढाँचा एक जैसा है: कुछ अच्छे साज़ो-सामान वाले केंद्र, लगातार विदेशी मुक़ाबले, और साल में एक बार नहीं बल्कि कई बार बाहर खेलने का मौक़ा।
आगे का रास्ता भी वही है जो हर उभरते खेल में रहा है। कॉमनवेल्थ का ख़िताब क्षेत्रीय स्तर की मज़बूत कसौटी है, पर ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप का मैदान अलग है — वहाँ इटली, फ़्रांस, हंगरी, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देश हैं। लागोस के इस नतीजे को टिकाऊ बनाने के लिए ज़रूरत है और शहरों में पिस्ट (मुक़ाबले का ट्रैक) की, अंतरराष्ट्रीय स्तर के भारतीय रेफ़री की, और स्कूल स्तर पर इतने रास्तों की कि जो टीम नाइजीरिया में जीती, उसकी जगह लेने वाले खिलाड़ी तैयार मिलें। तीरंदाज़ी और निशानेबाज़ी में भारत यह कर चुका है। नमूना मौजूद है।












