ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इस मानसून ने वाक़ई वापसी की है और बुवाई के आँकड़े यह दिखा भी रहे हैं। पर बाँधों का हिसाब अलग है — और अगली गर्मी में थाली में क्या आएगा, यह वही तय करेगा।
शुरुआत ख़राब रही थी। जून के आख़िर तक बारिश सामान्य से करीब 35 फ़ीसदी कम थी। 19 अगस्त तक यह कमी घटकर करीब 12.6 फ़ीसदी रह गई — यानी सात हफ़्तों में करीब 22 अंक की भरपाई। खेतों में भी असर दिखा। जून के आख़िर में खरीफ़ की बुवाई 20 फ़ीसदी से ज़्यादा पीछे थी, अगस्त के मध्य तक यह अंतर घटकर करीब 2 फ़ीसदी रह गया। पर देश के 166 बड़े जलाशयों में पानी अब भी क्षमता का सिर्फ़ 44.39 फ़ीसदी है — यानी वे करीब 55.6 फ़ीसदी ख़ाली हैं, और मानसून के अब पाँच हफ़्ते बचे हैं।
दोनों बातें एक साथ सच हैं, और इसकी वजह समझना ज़रूरी है। बारिश खड़ी फ़सल को सीधे पानी देती है। बाँध वह पानी है जो रोककर रखा गया। मानसून देर से आए और फिर तेज़ बरसे तो कुल आँकड़ा पूरा हो जाता है, पर पानी बहकर निकल जाता है — ज़मीन सूखी होती है, रफ़्तार तेज़ होती है, और कैचमेंट उस हिसाब से नहीं बने। खरीफ़ बारिश पीता है। रबी — गेहूँ, सरसों, चना, जो अक्टूबर से बोई जाती है — बाँध का पानी पीती है। और शहरों का पीने का पानी तथा सूखे महीनों की पनबिजली भी उसी पर टिकी है।
बारिश का आँकड़ा रोज़ छपता है, बाँध का कभी-कभार। जीते हम बाँध के पानी पर हैं। आज छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा और पूर्वी मध्य प्रदेश में भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट है।
बारिश बहती है, बाँध जमा करता है। ख़बर बारिश की बनती है और गुज़ारा बाँध से होता है।
एक नज़र में
• बारिश की कमी: जून के आख़िर में करीब 35%, 19 अगस्त तक करीब 12.6%
• खरीफ़ बुवाई: जून के आख़िर में 20% से ज़्यादा पीछे, अगस्त मध्य तक करीब 2% पीछे
• जलाशय: 166 बड़े जलाशयों में पानी क्षमता का 44.39%
• यानी: करीब 55.6% ख़ाली, मानसून के पाँच हफ़्ते बाक़ी
• आज का अलर्ट: छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, पूर्वी मध्य प्रदेश — ऑरेंज
• बाँध किस पर असर डालता है: रबी की फ़सल, शहरों का पानी, पनबिजली
• मौसम विभाग का अनुमान: अगस्त-सितंबर में सामान्य से कम बारिश
किसान के लिए इसका सीधा मतलब क्या है? पहला, खरीफ़ की फ़सल इस साल संभल गई है, यह अच्छी ख़बर है। दूसरा, रबी की बुवाई से पहले अपने ज़िले के जलाशय का स्तर देख लेना समझदारी है — क्योंकि नहर से कितना पानी मिलेगा, यह उसी से तय होगा। तीसरा, जहाँ भूजल गिर रहा है वहाँ टपक और फ़व्वारा सिंचाई पर सब्सिडी प्रति बूँद अधिक फ़सल योजना के तहत मिलती है, और आवेदन का सही समय बुवाई से पहले होता है, बाद में नहीं।
बड़ी तस्वीर यह है कि बारिश के दिन घट रहे हैं और एक-एक दिन की बारिश तेज़ हो रही है। उतना ही पानी, कम दिनों में। इतने पानी को बड़े बाँधों में रोकना अब न सस्ता है न आसान, और ज़्यादातर नदी घाटियों में नया बड़ा बाँध बनाने की जगह भी नहीं बची। इसलिए काम ज़मीन के नीचे और ऊपर की ओर करना होगा — भूजल रिचार्ज, छोटे चेक डैम, खेत तालाब और जलग्रहण क्षेत्र का सुधार, जो पानी को वहीं रोक लेते हैं जहाँ वह गिरता है। अटल भूजल योजना और पीएमकेएसवाई के तहत यह काम पहले से चल रहा है। आगे का रास्ता सीधा है — बारिश की तरह बाँधों का आँकड़ा भी रोज़ छपे, ताकि लोग बहाव नहीं, जमा पूँजी देखें।













