ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।चिप बनाने की योजना की ख़बर अक्सर मंज़ूरियों की गिनती में छपती है। नौजवान के लिए काम की गिनती अलग है — कितने कारखाने सचमुच चालू हैं, और उनमें काम क्या होता है।
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत अब तक मंज़ूर निवेश करीब 1,65,685 करोड़ रुपये का है, और यह छह राज्यों में फैला है। मंज़ूर 12 व्यावसायिक इकाइयों में से तीन चालू हैं और उत्पादन कर रही हैं — गुजरात के साणंद में माइक्रोन का कारखाना, जिसका उद्घाटन 28 फ़रवरी 2026 को हुआ, तथा सीजी सेमी और केन्स। यानी मंज़ूर इकाइयों का 25 फ़ीसदी हिस्सा उत्पादन में है।
अब असली फ़र्क़ समझिए, क्योंकि यहीं ज़्यादातर ख़बरें एक बात को गोल कर जाती हैं। ये तीनों कारखाने पैकेजिंग के हैं — बाहर बनी चिप की परत यहाँ आती है, उसे काटा, जोड़ा, जाँचा और डिब्बाबंद किया जाता है ताकि वह किसी सर्किट बोर्ड पर लग सके। यह असली मैन्युफ़ैक्चरिंग है, इसमें हज़ारों लोगों को काम मिलता है, और हर देश यहीं से शुरू करता है। पर यह चिप बनाना नहीं है। चिप बनाने वाला पहला कारखाना — टाटा-पीएसएमसी का ढोलेरा प्लांट — अभी बन रहा है। उसकी क्षमता होगी 50,000 वेफ़र हर महीने, यानी साल में 6 लाख वेफ़र, और वह 28 नैनोमीटर पर काम करेगा।
यही वह चीज़ है जिसे भारत अभी बाहर से मँगाता है। सिलिकॉन वेफ़र। देश के तीन चालू कारखाने चिप को डिब्बाबंद करते हैं; ढोलेरा में बन रहा कारखाना चिप बनाएगा। पहली सिलिकॉन का लक्ष्य दिसंबर 2026 है।
चिप को डिब्बे में बंद करना और चिप बनाना — ये दो अलग उद्योग हैं। भारत ने पहला शुरू कर दिया है, दूसरा बना रहा है।
एक नज़र में
• मंज़ूर निवेश: करीब 1,65,685 करोड़ रुपये, छह राज्यों में
• मंज़ूर इकाइयाँ: 12; उत्पादन में: 3
• चालू: माइक्रोन (साणंद, 28 फ़रवरी 2026), सीजी सेमी, केन्स
• पहला चिप कारखाना: टाटा-पीएसएमसी, ढोलेरा — निर्माणाधीन
• क्षमता: 50,000 वेफ़र महीना; 28 नैनोमीटर
• लक्ष्य: 2026 के अंत तक चार कारखाने चालू, 2027 में दो और
• पहली सिलिकॉन: दिसंबर 2026 का लक्ष्य
28 नैनोमीटर पर एक सफ़ाई ज़रूरी है, क्योंकि इसे अक्सर समझौता मान लिया जाता है। दुनिया की सबसे उन्नत चिप 3 और 2 नैनोमीटर पर बनती है और भारत उसकी कोशिश नहीं कर रहा। लेकिन 28 नैनोमीटर वाली चिप गाड़ियों के इंजन कंट्रोलर, कारखानों के सेंसर, वॉशिंग मशीन, इन्वर्टर और डिस्प्ले में लगती है। यह बाज़ार बहुत बड़ा है, बिजली से चलने वाली गाड़ियों के साथ बढ़ रहा है, और यहाँ नया कारखाना भरोसे और दाम के दम पर काम पा सकता है। यानी यह कम पर संतोष नहीं, बल्कि बाज़ार का वह हिस्सा चुनना है जहाँ माल बिक जाए।
नौजवान के लिए सबसे काम की बात यह है कि नौकरी सिर्फ़ कारखाने के भीतर नहीं बनती। एक चिप कारखाना ख़ास तरह के रसायन, गैस, फ़ोटोरेज़िस्ट, मास्क और नाप-जोख के उपकरण खाता है — और ये सब अभी बाहर से आते हैं। जो हिस्सा भारत में बनेगा, उसी से यहाँ प्रोसेस इंजीनियर, तकनीशियन और मरम्मत का काम बनेगा। आगे की राह भी यही है — आईटीआई और पॉलिटेक्निक स्तर पर साफ़-सुथरे कमरे (क्लीन रूम) और प्रक्रिया नियंत्रण का प्रशिक्षण अभी से शुरू हो, ताकि 2027 में जब कारखाने चलें तो अंदर काम करने वाले तैयार मिलें।











