ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।गोबरधन योजना को हर जगह साफ़ ऊर्जा की ख़बर की तरह पढ़ा गया। असल बात यह है कि सरकार ने गैस का दाम दस साल के लिए तय कर दिया है और ख़रीदार भी तय कर दिया है। किसान और गाँव के कारोबारी के लिए यही सबसे बड़ी बात है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 6 अगस्त 2026 को गोबरधन योजना को मंज़ूरी दी। पूरा नाम है राष्ट्रीय सर्कुलर बायोएनर्जी योजना, और इसका बजट है 23,731 करोड़ रुपये। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक, यानी दस साल चलेगी। इसे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय चलाएगा। सीधी बात यह है कि गोबर, पराली, प्रेस मड और शहरों का गीला कचरा — इन सबसे बनने वाली गैस, जिसे सीबीजी यानी कंप्रेस्ड बायोगैस कहते हैं — अब एक राष्ट्रीय ढाँचे के अंदर आ गई है। सरकार का लक्ष्य है कि दस साल में इसका उत्पादन करीब दस गुना हो जाए।
अब सबसे ज़रूरी हिस्सा। योजना में छह घटक हैं, पर तीन से सब कुछ तय होता है। पहला, शहरों में गैस बेचने वाली कंपनियों को अब सीबीजी ख़रीदनी ही होगी — 2026-27 में 3 फ़ीसदी, 2027-28 में 4 फ़ीसदी और 2028-29 से 5 फ़ीसदी, सीएनजी और घरों की पाइप वाली गैस, दोनों में। दूसरा, दाम तय कर दिया गया है — 2,110 रुपये प्रति MMBTU, कम से कम दस साल के लिए। तीसरा, नया प्लांट लगाने वाले को 2 करोड़ रुपये प्रति टन प्रतिदिन क्षमता तक की पूँजी सहायता मिलेगी, और यह मदद सिर्फ़ मशीन तक सीमित नहीं है — कच्चा माल जुटाने और जैविक खाद बनाने के काम पर भी मिलेगी।
जो अब तक कचरा था। गोबरधन योजना का पूरा गणित इसी पर टिका है कि गोबर और फसल अवशेष खेत से प्लांट तक पहुँचें। देश में 200 से ज़्यादा सीबीजी प्लांट पहले से चालू हैं — उनके पास पक्का ख़रीदार और तय दाम नहीं था, अब है।
200 प्लांट बिना पक्के ख़रीदार के बने। इस योजना का असली सामान ख़रीदार है, पैसा नहीं।
एक नज़र में
• योजना: गोबरधन — राष्ट्रीय सर्कुलर बायोएनर्जी योजना, मंज़ूरी 6 अगस्त 2026
• बजट: 23,731 करोड़ रुपये, 2026-27 से 2035-36 तक
• दाम: 2,110 रुपये प्रति MMBTU, कम से कम दस साल तक
• ख़रीद की शर्त: 3% (FY27), 4% (FY28), 5% (FY29 से)
• पूँजी सहायता: 2 करोड़ रुपये प्रति टन प्रतिदिन क्षमता तक
• किसके लिए: निजी कंपनियाँ, एमएसएमई, सहकारी समितियाँ, गाँव के उद्यमी
• बैंक की दिक़्क़त पर: एमएसएमई परियोजनाओं के लिए अलग क्रेडिट गारंटी
• मंत्रालय: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
तो फ़ायदा किसे? योजना में साफ़ लिखा है — निजी कंपनियों के साथ-साथ एमएसएमई, सहकारी समितियों और गाँव के उद्यमियों को भी पूँजी सहायता मिलेगी। और सबसे बड़ी अड़चन, बैंक लोन, उसके लिए अलग से क्रेडिट गारंटी रखी गई है। दरअसल छोटे कारोबारी की समस्या प्लांट नहीं, गारंटी होती है — प्रोजेक्ट ठीक होता है पर बैंक जो ज़मानत माँगता है वह उसके पास नहीं होती। इस गारंटी से बैंक का जोखिम बँट जाता है। यानी दूध की सहकारी समिति, चीनी मिल जिसके पास प्रेस मड पड़ा रहता है, या नगर पालिका जो गीला कचरा फेंकने पर पैसा ख़र्च करती है — तीनों के लिए अब वह चीज़ कमाई है जो अब तक ख़र्च थी।
एक बात साफ़ कहनी चाहिए। इन प्लांटों की असली परीक्षा तकनीक नहीं, कच्चा माल है। गोबर गाँव भर में बिखरा रहता है, पराली सिर्फ़ मौसम में मिलती है, और जितनी दूर से ढुलाई होगी उतना मुनाफ़ा घटेगा। इसीलिए योजना का छठा हिस्सा — सीबीजी इकोसिस्टम चैलेंज फ़ंड — ज़िला स्तर पर कच्चे माल की मैपिंग, इकट्ठा करने की व्यवस्था और योजना बनाने के लिए है। बड़ी बात यह है कि जहाँ पहले माल जुटाने का इंतज़ाम बनेगा, वहीं प्लांट पूरी क्षमता पर चलेगा। दस साल बाद गिनती प्लांटों की नहीं होनी चाहिए — यह देखना चाहिए कि किसान को उसकी पराली का कितना दाम मिला, और खाद बिकी या गोदाम में पड़ी रही।












