दीपक द्विवेदी
नई दिल्ली। कश्मीर को लेकर अमेरिका की भाषा में आया बदलाव भारत की बढ़ती वैश्विक साख का नया और महत्वपूर्ण संकेत है। वॉशिंगटन लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर पर बेहद सावधानी से बोलता रहा है। 1993 में अमेरिकी अधिकारी रॉबिन राफेल ने इसे “विवादित क्षेत्र” (डिस्प्यूटेड टेरिटरी) तक कहा था और अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 से जुड़े बदलाव के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने साफ कहा था कि कश्मीर पर उसकी नीति नहीं बदली है लेकिन अब अमेरिका के भारत स्थित राजदूत सर्जियो गोर ने श्रीनगर की धरती से जम्मू-कश्मीर को भारत का “अहम हिस्सा” (इंपोर्टेंट पार्ट) बताया है।
यह औपचारिक अमेरिकी नीति परिवर्तन की घोषणा नहीं है लेकिन सात दशकों की अमेरिकी कूटनीतिक शब्दावली को देखते हुए इसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
गोर ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद जम्मू-कश्मीर में बेहतर हुई सुरक्षा व्यवस्था की भी सराहना की और संकेत दिया कि अमेरिका अपनी मौजूदा “डू नॉट ट्रैवल” एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है। पाकिस्तान इस बयान से आंदोलित हो गया और इस्लामाबाद में अमेरिकी राजनयिक को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया।
यही प्रतिक्रिया बताती है कि कुछ शब्द कूटनीति में कितने मायने रखते हैं। हालांकि अमेरिका ने अभी अपनी पुरानी कश्मीर नीति को किसी औपचारिक दस्तावेज से खत्म नहीं किया है लेकिन उसके राजदूत का श्रीनगर जाकर इस तरह भारत की स्थिति के करीब खड़ा बयान देना अपने आप में महत्वपूर्ण संदेश है।
– “डू नॉट ट्रैवल” एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है अमेरिका
संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ से आगे बढ़ी जमीनी हकीकत
कश्मीर का अंतरराष्ट्रीय संदर्भ 1948 से संयुक्त राष्ट्र से जुड़ा रहा है। सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव – 47 में जनमत-संग्रह की व्यवस्था का सुझाव था, लेकिन उससे पहले पाकिस्तान की ओर से आए लड़ाकों की वापसी और चरणबद्ध ढंग से सैन्य तैनाती में कमी जैसी शर्तें पूरी होनी थीं। लेकिन, यह प्रक्रिया कभी पूरी नहीं हुई और प्रस्तावित जनमत-संग्रह भी नहीं हुआ।
1972 के शिमला समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान ने अपने मतभेद शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय बातचीत से हल करने पर सहमति जताई। संयुक्त राष्ट्र आज भी अपनी स्थिति में उन पुराने चार्टर, सिक्योरिटी कौंसिल के प्रस्तावों और शिमला समझौते का उल्लेख करता है तथा यूएनएमओजीआईपी का सीमित मिशन जारी है। इसलिए गोर का बयान महत्वपूर्ण जरूर है, पर इसे यूएन की औपचारिक स्थिति बदलने के रूप में नहीं देखा जा सकता।
हालांकि यहां पर यह बात भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान में यूनाइटेड नेशंस अपनी उपयोगिता पूरी तरह से खो चुका है। यही वजह है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अनेक बार अंतरराष्ट्रीय मंचों से यूनाइटेड नेशंस के रिफॉर्म की बात कह चुके हैं और अब भारत के इस संकल्प को दुनिया के लगभग सभी देश लगातार दोहरा रहे हैं।
इस बीच भारत के भीतर कश्मीर की संवैधानिक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी करने के बाद जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आर्टिकल 370 से जुड़े केंद्रीय संवैधानिक फैसले को बरकरार रखा।
इसके बाद 2024 में जम्मू-कश्मीर में 90 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए और 63.88 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।
आज वहां उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में निर्वाचित सरकार है, हालांकि पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल होना अभी बाकी है।
युद्धों के बीच भारत से संवाद की उम्मीद
कश्मीर पर बदलती अमेरिकी भाषा को दुनिया में भारत की बड़ी होती भूमिका से अलग करके नहीं देखा जा सकता। रूस-यूक्रेन युद्ध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखा। भारत लगातार कहता रहा कि युद्ध का स्थायी समाधान केवल बातचीत और कूटनीति से निकल सकता है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी भारत से अपनी भूमिका निभाने की अपेक्षा जताई। अगस्त 2025 में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को रूस तथा अन्य नेताओं तक शांति का संदेश पहुंचाने के भारत के प्रयास का स्वागत किया। भारत ने भी स्पष्ट किया कि वह शांति की वापसी के लिए हर संभव योगदान देने को तैयार है। पश्चिम एशिया में भी भारत ने संवाद का यही रास्ता अपनाया।
ईरान के राष्ट्रपति से बातचीत में मोदी ने दोहराया कि समस्याओं का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत हर युद्ध में औपचारिक मध्यस्थ बन चुका है लेकिन बड़ी बात यह है कि एक-दूसरे के विरोध में खड़े देश भी नई दिल्ली से बात करने में सहज हैं। यही भारत की बढ़ती कूटनीतिक पूंजी है।
अर्थव्यवस्था ने भी बढ़ाया भारत का वजन
कूटनीति को ताकत भारत की अर्थव्यवस्था से भी मिल रही है। विश्व बैंक के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की विकास दर 7.6 प्रतिशत रही और वह सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहा। वैश्विक व्यापार तनाव और युद्धों से पैदा हुई अनिश्चितता के बीच यह प्रदर्शन भारत की आर्थिक क्षमता को और महत्वपूर्ण बनाता है।
अमेरिकी चुनावी बहस में भी ‘इंडिया मॉडल’
इसी दौर में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने घरेलू चुनाव सुधार अभियान में भारत की चुनाव व्यवस्था को उदाहरण बनाया है। उन्होंने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का उल्लेख करते हुए फोटो पहचान पत्र, 646 मिलियन से अधिक मतदाताओं और बेहद सीमित पोस्टल वोटिंग की चर्चा की तथा अमेरिका में सेव अमेरिका एक्ट को आगे बढ़ाने की मांग की।
यहां तथ्य की एक सीमा स्पष्ट है- ट्रम्प ने भारत निर्वाचन आयोग की एसआईआर प्रक्रिया की सीधे प्रशंसा नहीं की है। उनकी तारीफ मुख्य रूप से भारत की वोटर पहचान पत्र और चुनाव प्रबंधन व्यवस्था को लेकर थी। भारत के विदेश मंत्रालय ने इसके बाद कहा कि भारतीय चुनाव व्यवस्था की मजबूती और विश्वसनीयता दुनिया में स्थापित है।
फिर भी प्रतीकात्मक बदलाव बड़ा है। कभी अमेरिका दूसरे लोकतंत्रों को चुनावी व्यवस्था पर सलाह देता दिखाई देता था; आज उसका राष्ट्रपति अपने घरेलू चुनाव सुधार के समर्थन में भारत का उदाहरण पेश कर रहा है।
बदलते भारत की बड़ी तस्वीर
सर्जियो गोर का कश्मीर बयान, पाकिस्तान की तीखी प्रतिक्रिया, ट्रम्प द्वारा भारतीय चुनाव व्यवस्था की सराहना, युद्धरत देशों के साथ मोदी का निरंतर संवाद और 7.6 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि- इन घटनाओं को साथ रखकर देखें तो तस्वीर साफ होती है।
भारत अब केवल दुनिया का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार, संवाद का भरोसेमंद मंच और कई वैश्विक बहसों में संदर्भ-बिंदु बनता जा रहा है।
कश्मीर पर अमेरिका की भाषा में आया ताजा बदलाव इसी बड़ी कहानी का शायद सबसे स्पष्ट संकेत है। दुनिया भारत को केवल सुन नहीं रही, बदलती वैश्विक व्यवस्था में उसकी बढ़ती ताकत और प्रासंगिकता को स्वीकार भी कर रही है।












