ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) द्वारा राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के केवल शुरुआती दो छंद गाने के अपने ऐतिहासिक (1937 के) रुख पर कायम रहने के फैसले ने देश में एक नया राजनीतिक और वैचारिक तूफान खड़ा कर दिया है। सत्तापक्ष इसे संसद के नए दिशा-निर्देशों और देश की भावनाओं की अवहेलना व तुष्टिकरण बता रहा है, वहीं कांग्रेस पार्टी इसे अपने पुराने व स्वतंत्रता सेनानियों के समय से चले आ रहे निर्णय के अनुकूल मानती है। क्या यह फैसला संविधान विरोधी है और क्या कोई दल संसद से ऊपर है, यह आज एक गंभीर विमर्श का विषय बन गया है।
‘वंदे मातरम ्’ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वाधीनता संग्राम का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत रहा है। वर्ष 1937 में जब कांग्रेस के समक्ष इसकी सांप्रदायिक और राजनीतिक संवेदनशीलता का प्रश्न आया, तो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर इसके केवल पहले दो छंदों को ही राष्ट्रीय सम्मेलनों में गाने का प्रस्ताव स्वीकार किया था। कांग्रेस का तर्क है कि शुरुआती दो छंदों में देश-प्रेम की वह भावना निहित है जिस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, और पार्टी पिछले 80 वर्षों से इसी परंपरा का निर्वाह करती आ रही है।
क्या यह फैसला ‘संविधान विरोधी’ है?
भारतीय संविधान में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का दर्जा प्राप्त है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में उसके बराबर का ऐतिहासिक सम्मान दिया गया है। हालांकि, संविधान का अनुच्छेद 51ए(ए) नागरिकों से राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करने को कहता है, परंतु राजनीतिक दलों के आंतरिक सांगठनिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के कितने छंद गाए जाएं, इसके संबंध में कोई कठोर आपराधिक या बाध्यकारी संवैधानिक प्रतिबंध मूल रूप से नहीं रहा है।
तथापि, हाल के दिनों में संसद और गृह मंत्रालय के नए प्रोटोकॉल व दिशानिर्देशों (जैसे सरकारी कार्यक्रमों में पूरे छह छंदों का गायन) के परिप्रेक्ष्य में, सत्तापक्ष का यह आरोप है कि कांग्रेस का यह निर्णय संसद द्वारा बनाए गए विधायी व राष्ट्रीय सम्मान के मानकों की अनदेखी करता है। यदि कोई कानूनी बाध्यता किसी मंच विशेष पर लागू होती है और उसकी अवहेलना की जाती है, तो उसे कानूनी अनुशासनहीनता कहा जा सकता है, लेकिन किसी दल के आंतरिक सांगठनिक सम्मेलनों पर वैचारिक निर्णय को सीधे तौर पर ‘असंवैधानिक’ ठहराना एक कानून से अधिक राजनीतिक बहस है।
क्या कोई राजनीतिक दल संसद और संविधान से ऊपर है?
इस सवाल का उत्तर स्पष्ट और अकाट्य है: भारत में कोई भी व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक दल संसद, कानून और संविधान से ऊपर नहीं है। भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार ‘संविधान की सर्वोच्चता’ है।
जब संसद कोई कानून पारित करती है या देश की सर्वोच्च विधायी संस्था कोई राष्ट्रीय प्रोटोकॉल तय करती है, तो देश के प्रत्येक नागरिक और राजनीतिक दल का यह नैतिक व विधिक कर्तव्य है कि वे उसका पालन करें। यदि कोई राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ, वोट-बैंक या वैचारिक जिद के कारण संसद के संकल्पों या राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति निर्धारित सम्मान के मानदंडों को दरकिनार करता है, तो यह लोकतंत्र की मर्यादा के खिलाफ है।
तुष्टिकरण बनाम वैचारिक स्वतंत्रता की बहस
इस पूरे प्रकरण में दो दृष्टिकोण सामने आते हैं। एक तरफ आलोचकों (विशेषकर भाजपा) का मानना है कि 1937 की तर्ज पर केवल दो छंद गाना और संपूर्ण राष्ट्रीय गीत के गायन से परहेज करना तुष्टिकरण की राजनीति का विस्तार है, जो देश के विभाजनकारी इतिहास की याद दिलाता है। उनका तर्क है कि राष्ट्रगीत की पूर्णता को स्वीकार न करना देश की सांस्कृतिक चेतना का अपमान है।
दूसरी ओर, कांग्रेस और उसका समर्थन करने वाले पक्षों का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का राजनीतिकरण किया जा रहा है। उनके अनुसार, जब पार्टी अपने आंतरिक कार्यक्रमों में ऐतिहासिक परंपरा का पालन कर रही है, तो इसे राष्ट्रविरोधी या संविधान विरोधी बताना केवल राजनीतिक ध्यान भटकाने की रणनीति है। दरअसल ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आत्मा का स्वर है।
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है, परंतु यह स्वतंत्रता राष्ट्र की एकता और संसद की गरिमा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक दल कितने भी बड़े क्यों न हों, वे देश की संसद और संविधान से बड़े नहीं हो सकते। राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के विषय पर दलों को संकीर्ण राजनीतिक दायरे से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए, तभी एक स्वस्थ और सुदृढ़ लोकतंत्र की परंपरा जीवित रह सकती है।
‘वंदे मातरम्’ के केवल 2 अंतरे गाने का कांग्रेसी फैसला, न केवल देशविरोधी, संसद के बनाए कानून की खुली अवहेलना बल्कि फिर तुष्टिकरण के रास्ते पर कांग्रेस : अमित शाह
1937 में तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस ने ही ‘वंदे मातरम्’ के दो टुकड़े किए
‘वंदे मातरम्’ को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच चल रही तनातनी के इस बीच गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी पार्टी पर तीखा हमला किया। शाह ने कांग्रेस पर अपनी ‘तुष्टिकरण की चरम नीति’को फिर से शुरू करने का आरोप लगाया है।
शाह ने एक्स पर पोस्ट वीडियो में कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति ने ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गान की जगह केवल दो अंतरे गाने का जो फैसला लिया है, वह न केवल देशविरोधी है, बल्कि संसद के बनाए कानून की खुली अवहेलना भी है। 1937 में तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस ने ही ‘वंदे मातरम्’ के दो टुकड़े किए। वहीं से दो-राष्ट्र सिद्धांत को ताकत मिली और आखिरकार देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष पर मोदी सरकार ने यह ऐतिहासिक गलती सुधारी और पूर्ण गान को कानूनी स्वरूप दिया लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस फिर उसी वोट बैंक के लिए तुष्टीकरण के रास्ते पर है।’वंदे मातरम्’ के टुकड़े करने की गलती एक बार हो चुकी और देश उसके परिणाम भुगत चुका। देशवासियों से यह अपील है कि एकजुट होकर कांग्रेस के इस तुष्टिकरण के खिलाफ आवाज बुलंद करें। वोट बैंक के तुष्टिकरण के लिए, उन्होंने न केवल स्वर्गीय बंकिम बाबू की अमर रचना का अपमान किया है, बल्कि उन लाखों शहीदों का भी अपमान किया है जो देश की आजादी के लिए ‘वंदे मातरम्’ का नारा लगाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़े और कई साल जेल में बिताए।














