इसका आप पर क्या असर पड़ेगा? आज बिजली सिर्फ़ तार से नहीं आती, सॉफ़्टवेयर से भी चलती है। और अब पहली बार क़ानून यह तय करता है कि उस सॉफ़्टवेयर की हिफ़ाज़त कौन करेगा।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के नए साइबर सुरक्षा नियम 31 जुलाई 2026 को राजपत्र में अधिसूचित हुए। इनके ज़रूरी प्रावधान 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे। ये नियम विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 177 के तहत बने हैं, और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की सहमति से बने हैं।
अब तक इस मामले में सलाह और दिशा-निर्देश जारी होते थे। सलाह न मानने पर कुछ नहीं होता था। दरअसल यही सबसे बड़ा बदलाव है — अगले अप्रैल से यह सलाह नहीं, नियम होगा, और न मानना नियम का उल्लंघन होगा।
दायरा बड़ा है: ट्रांसमिशन कंपनियाँ, बिजली वितरण कंपनियाँ, लोड डिस्पैच केंद्र, पावर एक्सचेंज और 50 मेगावाट से बड़ा हर संयंत्र इसमें शामिल है।
सबसे सख़्त शर्त तकनीकी नहीं है। हर कंपनी को अपना ही नियमित वरिष्ठ कर्मचारी साइबर सुरक्षा अधिकारी बनाना होगा — कम से कम तीन साल के लिए।
एक नज़र में
• नियम: सीईए (विद्युत क्षेत्र में साइबर सुरक्षा) विनियम, 2026
• राजपत्र: 31 जुलाई 2026 · ज़रूरी प्रावधान 1 अप्रैल 2027 से
• क़ानून: विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 177 और 73(ग)
• सहमति: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय
• किन पर लागू: ट्रांसमिशन कंपनियाँ, वितरण कंपनियाँ, लोड डिस्पैच केंद्र, पावर एक्सचेंज
• यह भी: 50 मेगावाट या उससे बड़े बिजलीघर, कैप्टिव प्लांट और बैटरी भंडारण
• अधिकारी: नियमित वरिष्ठ कर्मचारी, कम से कम तीन साल का कार्यकाल, एक वैकल्पिक अधिकारी भी
• निगरानी: 24 घंटे चलने वाला सूचना सुरक्षा प्रभाग
• रिपोर्ट: साइबर घटना 6 घंटे में · गंभीर तोड़फोड़ 24 घंटे में
• नोडल एजेंसी: सीएसआईआरटी-पावर, सीईआरटी-इन और एनसीआईआईपीसी के साथ
नियम का दायरा जान लीजिए। ट्रांसमिशन कंपनियाँ, बिजली बाँटने वाली कंपनियाँ, लोड डिस्पैच केंद्र, पावर एक्सचेंज और ओटीसी प्लेटफ़ॉर्म — सब इसमें हैं। साथ में 50 मेगावाट या उससे बड़ा हर बिजलीघर, कैप्टिव प्लांट और बैटरी भंडारण सिस्टम भी। बैटरी को शामिल करना नई बात है, और ज़रूरी भी — अब भंडारण इतना बड़ा और इतना जुड़ा हुआ हो चुका है कि उस पर हमला ग्रिड को हिला सकता है।
सबसे सख़्त शर्त कागज़ी नहीं, इंसानी है। हर कंपनी को अपना नियमित वरिष्ठ कर्मचारी मुख्य सूचना सुरक्षा अधिकारी बनाना होगा — ठेके का सलाहकार नहीं — और कम से कम तीन साल के लिए। एक वैकल्पिक अधिकारी भी रखना होगा, और 24 घंटे चलने वाला सुरक्षा प्रभाग भी। असली चुनौती अब यही है: राज्यों की कई बिजली वितरण कंपनियों के पास इतने प्रशिक्षित लोग नहीं हैं, और उन्हें क़रीब उन्नीस महीने में यह इंतज़ाम करना है। रास्ता भी साफ़ है — क्षेत्रीय लोड डिस्पैच केंद्रों के ज़रिए साझा प्रशिक्षण, छोटी कंपनियों के लिए साझा सुरक्षा केंद्र, और अगले टैरिफ़ में इसका ख़र्च शामिल करना। आपके घर की बिजली के लिए इसका मतलब सीधा है: अब ग्रिड की हिफ़ाज़त किसी की मर्ज़ी नहीं, ज़िम्मेदारी है।













