ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जब जिंदगी इंसान की सबसे कठिन परीक्षा ले रही होती है, तब या तो इंसान टूटकर बिखर जाता है या फिर कड़े संघर्ष से इतिहास रच देता है। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के रहने वाले सुनील लोहार की कहानी ऐसा ही उदाहरण है, जो हर उस विद्यार्थी का हौसला बढ़ाता है जो अभावों के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं। कबाड़ की दुकान चलाने वाले और सड़कों से कबाड़ बीनने वाले सुनील लोहार ने देश की सबसे कठिन चिकित्सा प्रवेश परीक्षाओं में से एक नीट यूजी में शानदार सफलता हासिल करके डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर दिखाया है।
6 महीने के मासूम बेटे को खोने का गहरा दर्द
2020 में 12वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई रोक दी थी। वे पिता का हाथ बंटाने के लिए कबाड़ी के काम में लगे थे। सुनील लोहार की सफलता के पीछे एक बेहद भावुक और दर्दभरी कहानी छिपी है। आर्थिक तंगी के कारण सुनील का परिवार बहुत ही साधारण जिंदगी जी रहा था। उनके जीवन में सबसे बड़ा दुखों का पहाड़ तब टूटा जब उनके 6 महीने के मासूम बेटे का सही समय पर सही इलाज न मिलने के कारण निधन हो गया। पैसों की कमी और अस्पताल में समय पर डॉक्टरी सहायता न मिल पाना मासूम की जान जाने की वजह बना। इस व्यक्तिगत त्रासदी ने सुनील के दिल और दिमाग को पूरी तरह हिलाकर रख दिया।
मासूम बेटे की मौत के बाद सुनील ने रोने के बजाय एक कड़ा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे खुद पढ़ाई करेंगे और डॉक्टर बनेंगे, ताकि भविष्य में किसी भी गरीब पिता को पैसों या इलाज के अभाव में अपने बच्चे को न खोना पड़े। पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ सुनील कबाड़ बीनने और दुकान संभालने का काम करते थे। दिन भर मेहनत करने के बाद वे रात-रात भर जागकर नीट की तैयारी में जुट जाते थे। उनके पास न तो कोई महंगी कोचिंग लेने के पैसे थे और न ही शानदार पढ़ाई का माहौल, लेकिन उनके पास था अपने बेटे की याद में लिया गया फौलादी संकल्प।
दिन में कबाड़ का काम, रात में नीट की पढ़ाई
सुनील की राह बिल्कुल भी आसान नहीं थी। उन्हें समाज के तानों और आर्थिक संकट का सामना रोज करना पड़ता था। दुकान पर आने वाले ग्राहक और आसपास के लोग अक्सर उनके डॉक्टर बनने के सपने का मजाक उड़ाया करते थे लेकिन सुनील ने अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं भटकने दिया। पुरानी किताबों और सीमित संसाधनों के सहारे उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी। जब नीट का परिणाम घोषित हुआ, तो सुनील की मेहनत रंग लाई और उन्होंने ओबीसी कैटेगरी में ऑल इंडिया रैंक 5,680 हासिल कर अपनी सफलता का परचम लहराया। उन्होंने कट-ऑफ पास करते हुए मेडिकल कॉलेज में अपनी सीट पक्क ी कर ली।
सुनील लोहार की यह सफलता सभी विद्यार्थियों और युवाओं के लिए एक संदेश है कि कोई भी परिस्थितियां आपके सपनों से बड़ी नहीं हो सकतीं। जब आप किसी लक्ष्य को पाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं, तो असफलता भी आपके सामने घुटने टेक देती है।












