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युद्ध से मुनाफे की बारिश

ईरान संघर्ष के बीच तेल कंपनियों का मुनाफा ऐतिहासिक ऊंचाई पर

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 10, 2026
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युद्ध से मुनाफे की बारिश

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार का पूरा गणित बदल दिया है। पेट्रोलियम आपूर्ति बाधित होने से दुनिया भर में ईंन्धन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और कई देशों में इसकी कमी भी महसूस की जा रही है। एक ओर आम उपभोक्ता महंगे ईंन्धन और बढ़ती महंगाई का बोझ उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर दुनिया की कुछ बड़ी तेल कंपनियों के लिए यही संकट भारी मुनाफे का अवसर बन गया है।

बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि प्रमुख तेल कंपनियां इस अवधि में असाधारण मुनाफा दर्ज कर सकती हैं। वैश्विक आपूर्ति में कमी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने इन कंपनियों को अपने उत्पाद अधिक दाम पर बेचने का अवसर दिया है।

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हॉर्मुज में रुकावट, दुनिया भर में असर

छठे महीने में प्रवेश कर चुके ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला अधिकांश समुद्री परिवहन प्रभावित हुआ है। यह संकरा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति का प्रमुख रास्ता रहा है।
एक विशेष मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक आपूर्ति सीमित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार के प्रमुख मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर मार्च, अप्रैल और मई के अधिकांश समय में 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रही। एक समय यह कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी।

तेल उत्पादक ऊंची कीमतों का लाभ उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में करोड़ों लोग लगातार बिजली कटौती, ईंन्धन की राशनिंग जैसी मुश्किलों से जूझ रहे हैं

कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का सीधा फायदा उन बड़ी तेल कंपनियों को मिला, जो वैश्विक बाजार में अपना उत्पादन अधिक कीमत पर बेचने की स्थिति में थीं।

आम उपभोक्ताओं पर महंगाई की मार

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के साथ पेट्रोल, डीजल और विमान ईंन्धन भी महंगे हो गए। इसका सीधा असर वाहन चालकों से लेकर हवाई यात्रियों तक की जेब पर पड़ा।

कुछ देशों में ईंन्धन की आपूर्ति इतनी कम हो गई कि सरकारों को नियंत्रण और राशनिंग जैसे कदम उठाने पड़े। ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में समय-समय पर ईंन्धन की राशनिंग करनी पड़ी जबकि नेपाल और श्रीलंका में सरकारी कार्यालय बंद रखने तक की नौबत आ गई।
इस तरह दुनिया के कई हिस्सों में आम लोग ऊंची कीमतों और ईंन्धन की कमी से जूझ रहे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ बड़ी ऊर्जा कंपनियों के मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।

छह यूरोपीय कंपनियों को 22 अरब डॉलर का मुनाफा
पर्यावरण और ऊर्जा से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था ‘ग्लोबल विटनेस’ के मुताबिक, यूरोप की छह सबसे बड़ी तेल कंपनियों ने वर्ष की पहली तिमाही में मिलकर करीब 22 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 43 प्रतिशत अधिक है।
‘ग्लोबल विटनेस’ में जीवाश्म ईंन्धन मामलों के प्रमुख पैट्रिक गैली का कहना है, “दुनिया में कुछ वर्गों के लिए यह संकट बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है और तेल उत्पादक उनमें से एक हैं।”

उनके मुताबिक, एक तरफ तेल उत्पादक ऊंची कीमतों का लाभ उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में करोड़ों लोग लगातार बिजली कटौती, बिजली की खपत पर पाबंदियों, ईंन्धन की राशनिंग और खाद्य पदार्थों की कमी जैसी मुश्किलों से जूझ रहे हैं।
उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा से खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ने की आशंका है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऊर्जा संकट की इतनी बड़ी कीमत आखिर दुनिया के आम लोगों को क्यों चुकानी पड़े।

रिफाइनरियों के लिए बड़ा मौका

मौजूदा बाजार परिस्थितियों में एक्सॉन और शेवरॉन जैसी बड़ी ऊर्जा कंपनियां सबसे मजबूत स्थिति में दिखाई देती हैं। इसकी वजह यह है कि ये कंपनियां केवल तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन ही नहीं करतीं, बल्कि अपनी रिफाइनरियां भी संचालित करती हैं।

रिफाइनरियों में कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल, विमान ईंन्धन और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जाता है। इस समय रिफाइनरियों को ऐतिहासिक रूप से ऊंचे ‘क्रैक स्प्रेड’ का फायदा मिल रहा है।

सरल शब्दों में कहें तो कच्चे तेल की खरीद कीमत और उससे तैयार पेट्रोल, डीजल तथा विमान ईंन्धन जैसे उत्पादों की बिक्री कीमत के बीच का अंतर रिफाइनरी की संभावित कमाई को दर्शाता है।

जुलाई के अंत में करीब 80 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल खरीदने वाली कुछ रिफाइनरियों को प्रति बैरल 50 से 60 डॉलर तक की संभावित कमाई दिखाई दे रही थी। सामान्य परिस्थितियों में यह अंतर करीब 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल रहता है। यानी मौजूदा परिस्थितियों में रिफाइनरियों का संभावित मुनाफा सामान्य स्तर से कहीं अधिक हो गया है।

अमेरिकी रिफाइनरियां फायदे की स्थिति में

जिन रिफाइनरियों के पास पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल उपलब्ध है, खासकर अमेरिकी रिफाइनरियां, वे मौजूदा हालात का सबसे अधिक लाभ उठाने की स्थिति में हैं।

डीजल और विमान ईंन्धन के उत्पादन में मुनाफे की संभावना विशेष रूप से बढ़ी है। अमेरिका में इन ईंन्धनों की कीमतें हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अवरोध पैदा होने से पहले के मुकाबले करीब 41 प्रतिशत अधिक हैं।

अमेरिकी रिफाइनरियां फिलहाल लगभग अपनी पूरी उत्पादन क्षमता के साथ काम कर रही हैं। दूसरी ओर, मध्य पूर्व और रूस की कुछ रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा है, जबकि एशिया की कई रिफाइनरियों को मध्य पूर्व से पहले जितना कच्चा तेल नहीं मिल पा रहा है। इस बदले हुए वैश्विक समीकरण ने अमेरिकी रिफाइनरियों को और मजबूत स्थिति में ला दिया है।

किसी के लिए संकट, किसी के लिए अवसर

वैश्विक ऊर्जा संकट ने दुनिया के सामने एक बड़ा विरोधाभास खड़ा कर दिया है। एक ओर आम उपभोक्ता महंगे पेट्रोल-डीजल, बढ़ते परिवहन खर्च और ईंन्धन की कमी से जूझ रहे हैं, तो दूसरी ओर पर्याप्त कच्चे तेल की उपलब्धता वाली कुछ बड़ी तेल कंपनियों और रिफाइनरियों के लिए यही संकट असाधारण कमाई का अवसर बन गया है।

युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव से पैदा हुए ये हालात एक बार फिर बताते हैं कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में किसी संकट की कीमत सभी को समान रूप से नहीं चुकानी पड़ती। किसी के हिस्से में महंगाई, अभाव और अनिश्चितता आती है, तो किसी के हिस्से में उसी संकट से अप्रत्याशित मुनाफा।

कौन फायदे में, कौन नुकसान में?
मध्य पूर्व की कई ऊर्जा कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और प्राकृतिक गैस की बढ़ी हुई कीमतों का पूरा लाभ नहीं उठा पा रही हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि उन्हें फारस की खाड़ी से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के निर्यात में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, कई कंपनियों के तेल क्षेत्र और तेल उत्पादन एवं प्रसंस्करण संयंत्र भी संघर्ष और हमलों के कारण क्षतिग्रस्त हुए हैं।

बदले हुए हालात में मध्य पूर्व की ऊर्जा कंपनियों के लिए ऊंची कीमतों से लाभ कमाने की तुलना में उत्पादन और आपूर्ति को लगातार बनाए रखना कहीं बड़ी चुनौती बन गया है।

अमेरिका की टेनेसी यूनिवर्सिटी में बिजनेस इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर और पेट्रोलियम उद्योग के विशेषज्ञ टिमोथी फिट्जगेराल्ड के अनुसार, मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में कुछ कंपनियों को खासा फायदा हो रहा है, जबकि कई अन्य कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

फिट्जगेराल्ड कहते हैं, “जब बाजार में अपना उत्पाद बेचने और उसकी पर्याप्त मात्रा पहुंचाने की आपकी क्षमता सीमित हो जाती है, तो स्वाभाविक रूप से आमदनी में भारी गिरावट आती है। दूसरी ओर परिवहन और सुरक्षा से जुड़ी लागत लगातार बढ़ती जाती है, जिससे कंपनियों पर आर्थिक दबाव और बढ़ जाता है।”

फिट्जगेराल्ड के मुताबिक, एक्सॉन और शेवरॉन जैसी वैश्विक तेल कंपनियां भी वर्ष की पहली तिमाही में अपेक्षित मुनाफा नहीं कमा सकीं। इसकी मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कारोबार की प्रक्रिया थी, जिसके चलते बढ़ी हुई कीमतों का फायदा उन्हें तत्काल नहीं मिल पाया।

उनके अनुसार, इन कंपनियों को तेल की ऊंची कीमतों का वास्तविक लाभ उठाने का पहला अवसर अप्रैल से मिलना शुरू हुआ। पूरी स्थिति यह बताती है कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव के दौर में केवल तेल की ऊंची कीमतें ही अधिक मुनाफे की गारंटी नहीं हैं।

उत्पादन, आपूर्ति, परिवहन और सुरक्षा जैसे कारक भी अब ऊर्जा कंपनियों का नफा-नुकसान तय करने में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

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