ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।केंद्र ने चांदीपुरा वायरस के प्रकोप को देखते हुए एक राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल गुजरात और राजस्थान भेजा है। गुजरात में इस मॉनसून अब तक 35 मामलों की प्रयोगशाला में पुष्टि हुई है और 22 बच्चों की मौत हुई है — देश में सबसे ज़्यादा।
इस टीम में सिर्फ़ डॉक्टर नहीं हैं। इसमें राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और पशुपालन एवं डेयरी विभाग — तीनों के विशेषज्ञ हैं। पशुपालन विभाग का इसमें होना ही सबसे बड़ा संकेत है, और वह संकेत यह है कि अब तक यह तय नहीं हुआ कि वायरस फैला किससे रहा है। बालू मक्खी (सैंडफ़्लाई) को इसका ज्ञात वाहक माना जाता है, लेकिन मच्छर, किलनी और माइट की भूमिका है या नहीं, इसकी जांच अभी चल रही है।
घंटे मायने रखते हैं, दिन नहीं: छोटे बच्चों में यह बीमारी बहुत तेज़ी से बढ़ती है, इसलिए माता-पिता के लिए ज़रूरी बात इलाज का नाम नहीं — अस्पताल पहुंचने की रफ़्तार है।
तेज़ बुखार के साथ अगर बच्चा सुस्त पड़ने लगे, उल्टी करे या झटके आएं — तो सुबह का इंतज़ार नहीं करना है।
एक नज़र में
• कहां भेजी गई टीम: गुजरात और राजस्थान, घोषणा 5 अगस्त 2026
• टीम में कौन: एनसीडीसी, आईसीएमआर और पशुपालन एवं डेयरी विभाग के विशेषज्ञ
• गुजरात में स्थिति: 35 पुष्ट मामले, 22 बच्चों की मौत — देश में सबसे ज़्यादा
• काम: प्रकोप की जांच, महामारी विज्ञान आकलन, इलाज प्रबंधन, प्रयोगशाला समन्वय, वाहक निगरानी
• निगरानी: एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) के तहत लगातार, एनसीडीसी और राज्य इकाइयों के साथ
• वाहक: बालू मक्खी ज्ञात वाहक; मच्छर, किलनी और माइट की भूमिका जांच के अधीन
• किसे होता है: ज़्यादातर छोटे बच्चों को; बीमारी दिमाग़ी बुखार की तरह बढ़ती है
वाहक का पता लगना क्यों इतना ज़रूरी है, यह समझ लीजिए। अगर सिर्फ़ बालू मक्खी ज़िम्मेदार है, तो बचाव का पूरा काम घर की बनावट पर आ जाता है — मिट्टी और चूने की दीवारों की दरारें, पशुओं के बाड़े, घर के भीतर के नम और अंधेरे कोने, और इन्हीं जगहों पर दवा का छिड़काव। लेकिन अगर कोई और कीट भी इसमें शामिल निकला, तो छिड़काव की जगह भी बदलेगी, समय भी बदलेगा और घर वालों को दी जाने वाली सलाह भी। स्वास्थ्य विभाग हर जगह हर चीज़ के लिए दवा नहीं छिड़क सकता — सही जगह तय करना ही पूरे मौसम की मेहनत को काम का बनाता है। यही सवाल बंद करने के लिए यह बहु-संस्थागत जांच चल रही है, और यह आसान सवाल नहीं है, इसीलिए इसका जवाब अंदाज़े से नहीं दिया गया।
अब वह हिस्सा जो आप इसी हफ़्ते कर सकते हैं, और जिसके लिए वाहक का पता होना ज़रूरी नहीं। यह बीमारी रफ़्तार की बीमारी है। छोटे बच्चे को अचानक तेज़ बुखार आए और उसके बाद वह सुस्त पड़ने लगे, उल्टी करे, झटका आए या असामान्य रूप से चिड़चिड़ा हो जाए — तो उसे कुछ घंटों के भीतर अस्पताल पहुंचाना है, रात भर देखना नहीं है। जिन ज़िलों में निगरानी चल रही है, वहां दीवारों की दरारें भरना और पशुओं के बाड़े की सफ़ाई करना वैसे भी फ़ायदे का काम है, क्योंकि इससे एक साथ कई कीटों के छिपने की जगहें कम होती हैं। एक मौसम में 22 मौतें बड़ा आंकड़ा है, और जवाब भी उसी हिसाब से आया है — केंद्र की संयुक्त टीम, बड़ी वैज्ञानिक जांच और लगातार निगरानी। यह काम आया या नहीं, इसका हिसाब अगले मॉनसून में उन्हीं ज़िलों में उसी कॉलम में दर्ज होगा।














