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अब खाड़ी नहीं, अमेरिका से आता है ज़्यादा पैसा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 5, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।इस वित्त वर्ष भारत को विदेश से 137 से 140 अरब डॉलर आने का अनुमान है — अब तक का सबसे ज़्यादा। पर इस रिकॉर्ड के भीतर एक बड़ा बदलाव छिपा है, और वह हर उस परिवार से जुड़ा है जिसका कोई सदस्य विदेश में है।

दरअसल अब भारत आने वाले पैसे का आधे से ज़्यादा हिस्सा अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे विकसित देशों से आता है — अकेले अमेरिका से 27.7 फ़ीसदी। रिज़र्व बैंक के छठे सर्वे के मुताबिक़ पहली बार इन देशों ने खाड़ी के छह देशों को पीछे छोड़ दिया है। सालों तक विदेश से आने वाले पैसे का मतलब खाड़ी था — यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, क़तर, ओमान और बहरीन, जहां आज भी क़रीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं। वह पैसा आज भी आ रहा है। बात यह है कि दूसरी तरफ़ का पैसा उससे तेज़ बढ़ा है।

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दो तरह का प्रवास, दो तरह का पैसा: खाड़ी जाने वाला ज़्यादातर मज़दूर और तकनीशियन होता है, अमेरिका और ब्रिटेन जाने वाला ज़्यादातर पढ़ा-लिखा पेशेवर। इसीलिए प्रति व्यक्ति भेजी जाने वाली रकम अब बढ़ रही है।

कम लोग, ज़्यादा पैसा। यह अच्छी ख़बर भी है और चेतावनी भी — क्योंकि गांव में पैसा उन्हीं घरों में पहुंचता है जिनका बेटा या बेटी बाहर है।

एक नज़र में

• अनुमान (वित्त वर्ष 2025-26): 137 से 140 अरब डॉलर — रिकॉर्ड
• अमेरिका का हिस्सा: कुल का 27.7 फ़ीसदी — सबसे बड़ा स्रोत
• पहली बार: विकसित देशों से आने वाला पैसा खाड़ी से ज़्यादा (रिज़र्व बैंक का छठा सर्वे)
• खाड़ी के छह देशों में भारतीय: क़रीब 90 लाख
• मार्च 2026: खाड़ी से भेजे पैसे में 30–35% का उछाल, हालात बिगड़ने की आशंका में
• असर: प्रति प्रवासी औसत रकम बढ़ रही है, क्योंकि पेशेवर ज़्यादा भेजते हैं

यह बदलाव क्यों हो रहा है, यह समझना आसान है। खाड़ी जाने वाला ज़्यादातर भारतीय मज़दूर, ड्राइवर, मिस्त्री या तकनीशियन होता है — उसकी तनख़्वाह सीमित होती है, इसलिए वह जो भेजता है वह भी सीमित होता है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया जाने वाला ज़्यादातर इंजीनियर, डॉक्टर, नर्स या आईटी पेशेवर होता है, और वह एक बार में कई गुना ज़्यादा भेजता है। यानी विदेश जाने वाले भारतीयों की गिनती उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ी जितनी तेज़ी से उनकी कमाई बढ़ी। मार्च 2026 का उछाल इसी तस्वीर का दूसरा पहलू है — खाड़ी में हालात बिगड़ते देख लोगों ने एहतियातन पैसा जल्दी घर भेज दिया, और एक ही महीने में 30 से 35 फ़ीसदी की बढ़त दिख गई।

इसका असर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब और केरल जैसे राज्यों पर सबसे ज़्यादा पड़ता है, जहां से सबसे ज़्यादा लोग बाहर जाते हैं। सबसे काम की बात यह है कि विदेश से आने वाला यह पैसा किसी सरकारी योजना का मोहताज नहीं है — यह सीधे घर पहुंचता है, और गांव में मकान, इलाज, बच्चों की पढ़ाई और छोटे कारोबार में लगता है। आगे का रास्ता दो तरफ़ जाता है। एक, खाड़ी जाने वाले कामगारों की तालीम और हुनर बेहतर हो, ताकि वे भी ज़्यादा कमाएं — इसके लिए सरकार के कौशल विकास और प्री-डिपार्चर ट्रेनिंग कार्यक्रम पहले से चल रहे हैं। दो, पैसा भेजने की लागत कम हो, क्योंकि हर भेजी गई रकम पर लगने वाला शुल्क सीधे उस परिवार की जेब से जाता है जिसके लिए यह पैसा भेजा गया है। यूपीआई का अंतरराष्ट्रीय विस्तार इसी दिशा में उठाया गया क़दम है, और उसका फ़ायदा उसी घर तक पहुंचेगा जहां हर सौ रुपये मायने रखते हैं।

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