ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सरकार ने पीएम-किसान योजना को पांच साल और बढ़ा दिया है — 2026-27 से 2030-31 तक, और इसके लिए ₹3.15 लाख करोड़ रखे गए हैं। रकम वही है, साल के ₹6,000, तीन किस्तों में। सवाल यह है कि इतनी छोटी रकम से होता क्या है।
सीधी बात यह है कि ₹6,000 सालाना का मतलब है महीने के करीब ₹500। कोई भी यह नहीं कहता कि इससे घर चल जाएगा। इस पैसे की ताक़त रकम में नहीं, समय में है। खेती में ख़र्च पहले होता है और कमाई बाद में — बीज, खाद, डीज़ल और मज़दूरी बुवाई के वक़्त देनी पड़ती है, और फ़सल का पैसा कटाई के बाद आता है। बीच के इन हफ़्तों में किसान अक्सर गांव के साहूकार से उधार लेता है, और उस उधार का ब्याज सीज़न की आधी कमाई खा जाता है। तय तारीख़ पर आने वाली किस्त फ़सल की कमाई की जगह नहीं लेती। वह यह बदल देती है कि उधार किससे लेना पड़ेगा।
अब तक 23 किस्तें: योजना शुरू होने से अब तक ₹4.47 लाख करोड़ किसानों के खातों में भेजे जा चुके हैं। नीति आयोग के मूल्यांकन दफ़्तर ने पाया कि 92 फ़ीसदी से ज़्यादा लाभार्थियों ने यह पैसा खेती में ही लगाया।
छोटी रकम जो तय दिन आ जाए, वह काम कर जाती है जो बड़ी रकम बेवक़्त आकर नहीं कर पाती।
एक नज़र में
• मंज़ूरी: 31 जुलाई 2026 को केंद्रीय कैबिनेट ने दी
• अवधि: 2026-27 से 2030-31 तक
• कुल रकम: ₹3.15 लाख करोड़
• किसान को: साल के ₹6,000, तीन बराबर किस्तों में, सीधे बैंक खाते में
• अब तक भेजा गया: 23 किस्तों में ₹4.47 लाख करोड़ से ज़्यादा
• महिला किसानों को: ₹1.06 लाख करोड़ से ज़्यादा — हर चौथा लाभार्थी महिला है
• नीति आयोग का आकलन: 92% से ज़्यादा ने कहा, पैसा खेती और खेती के निवेश में लगा
नीति आयोग के मूल्यांकन दफ़्तर की यह बात सबसे काम की है — 92 फ़ीसदी से ज़्यादा किसानों ने बताया कि यह पैसा खेती में और खेती के लिए किए जाने वाले ख़र्च में ही लगा। नक़द मदद देने वाली योजनाओं पर हमेशा यही सवाल उठता है कि पैसा कहीं और तो नहीं चला जाएगा। यहां का जवाब अलग है, और उसकी बड़ी वजह वक़्त है। किस्त उस मौसम में पहुंचती है जब किसान वैसे भी खाद की दुकान पर खड़ा होता है। जब पैसा सही मौक़े पर आए, तो उसे सही जगह ख़र्च करने के लिए किसी को समझाना नहीं पड़ता।
दूसरी बड़ी बात महिलाओं की है। ₹1.06 लाख करोड़ से ज़्यादा महिला किसानों के खातों में गया है और हर चौथा लाभार्थी महिला है। इसकी वजह यह है कि पात्रता ज़मीन के काग़ज़ से तय होती है — यानी यह आंकड़ा असल में बताता है कि देश में कितनी खेती की ज़मीन महिलाओं के नाम दर्ज है। यह ऐसा आंकड़ा है जो और किसी तरीक़े से आसानी से नहीं दिखता। आगे की गुंजाइश भी साफ़ है। योजना ज़मीन वाले किसान परिवारों तक पहुंचती है, इसलिए बटाईदार और खेतिहर मज़दूर इसके दायरे से बाहर रह जाते हैं — जबकि बुवाई के वक़्त पैसे की तंगी उन पर भी उतनी ही होती है। रास्ता यह नहीं कि पीएम-किसान को ही खींचकर बड़ा कर दिया जाए, बल्कि यह कि उनके लिए उनके हिसाब का अलग इंतज़ाम बने। और नीति आयोग की यह जांच हर साल छपती रहे, क्योंकि पांच साल का ऐसा रिकॉर्ड उन बहसों को ख़त्म कर देगा जो दस साल की बयानबाज़ी से नहीं ख़त्म हुईं।












