ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत के आयात बिल में सबसे बड़ा हिस्सा तेल का है, और भारत का सबसे कम खोजा गया हिस्सा उसके चारों तरफ़ फैला समुद्र है। इस हफ़्ते मंज़ूर हुई योजना इन्हीं दो बातों को जोड़ने की कोशिश करती है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘समुद्र मंथन’ यानी राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंज़ूरी दी है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस केंद्रीय क्षेत्र योजना पर 2030–31 तक 84,084 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
योजना तीन कामों पर टिकी है। पहला है भूकंपीय सर्वेक्षण — यानी समुद्र के नीचे का नक़्शा बनाना, ताकि कुआँ खोदने से पहले पता चले कि खोदना कहाँ है। दूसरा है गहरे पानी में खुदाई, जो सबसे महँगा और सबसे मुश्किल हिस्सा है। और तीसरा है साझा ढाँचा — प्लेटफ़ॉर्म, पाइपलाइन और सप्लाई बेस, जो सबके काम आते हैं। यह तीसरा हिस्सा भारत की ऐसी योजनाओं में अक्सर छूट जाता है, जबकि यही तय करता है कि पहली कंपनी के बाद दूसरी और तीसरी कंपनी उसी इलाक़े में आएगी या नहीं। सरकार का अनुमान है कि इससे 600 मिलियन मीट्रिक टन तेल के बराबर से ज़्यादा भंडार जुड़ेगा, घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और बड़े पैमाने पर रोज़गार बनेगा। यह योजना 2025 में लाल क़िले से कही गई “आधुनिक समुद्र मंथन” की बात को ज़मीन पर उतारती है।
पैसा जाएगा कहाँ: सर्वेक्षण, गहरे पानी की खुदाई और साझा ढाँचा — तीसरा हिस्सा ही तय करता है कि पहली कंपनी के पीछे दूसरी आती है या नहीं।
कोई देश तेल इसलिए नहीं मँगाता कि उसके पास तेल नहीं है। वह इसलिए मँगाता है कि उसने अभी अपने ही इलाक़े में ठीक से ढूँढा नहीं है।
एक नज़र में
• योजना: समुद्र मंथन — राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना
• ख़र्च: 84,084 करोड़ रुपये, 2030–31 तक
• मंत्रालय: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस
• तीन हिस्से: भूकंपीय सर्वेक्षण, गहरे पानी में खुदाई, साझा ढाँचा
• लक्ष्य: 600 मिलियन मीट्रिक टन तेल के बराबर से ज़्यादा भंडार जोड़ना
• मक़सद: घरेलू उत्पादन बढ़ाना, आयात पर निर्भरता घटाना, रोज़गार
• गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता: 30 जून तक 297.36 गीगावाट, 2030 का लक्ष्य 500 गीगावाट
इतनी बड़ी सरकारी योजना की ज़रूरत क्यों है, यह समझने के लिए खोज का गणित देखना पड़ता है। गहरे पानी का एक कुआँ करोड़ों डॉलर का होता है और उसमें कुछ न मिलने की आशंका काफ़ी रहती है। यही वजह है कि निजी पूँजी वहीं जाती है जहाँ कोई और पहले खोज कर चुका हो। भारत के जो अपतटीय क्षेत्र अभी उत्पादन दे रहे हैं, वे पुराने और अच्छी तरह जाने-पहचाने हैं, लेकिन गहरे और अति-गहरे पानी का बड़ा हिस्सा या तो बहुत कम सर्वे हुआ है या बिल्कुल नहीं। सर्वे पर लगाया गया सरकारी पैसा हर उस कंपनी का हिसाब बदल देता है जो बाद में आती है — क्योंकि सरकार किसी खोजी कंपनी को जो सबसे क़ीमती चीज़ दे सकती है, वह रियायत नहीं, जानकारी है।
दो बातें ईमानदारी से साथ रखनी चाहिए, और दोनों में से कोई भी रुकने की वजह नहीं है। पहली है समय। समुद्र में खोज दस साल की घड़ी पर चलती है, इसलिए 2026 में मंज़ूर हुई योजना का असली हिसाब 2030 के दशक में मिलने वाले उत्पादन से होगा — और यह बात पहले से साफ़ कह देना भी अच्छी नीति का हिस्सा है। दूसरी यह कि तेल-गैस और हरित ऊर्जा को अलग-अलग कमरों में नहीं, एक साथ सोचना होगा। भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता की तरफ़ बढ़ रहा है और 30 जून तक यह 297.36 गीगावाट थी। इन दोनों को जोड़कर देखने का सबसे सही तरीक़ा यह है कि घरेलू गैस वह पुल है जो सौर-पवन से भरे ग्रिड को चलने लायक़ बनाती है, क्योंकि गैस से बनने वाली बिजली को शाम के वक़्त तुरंत चालू किया जा सकता है। अगर समुद्र मंथन में गैस वाले हिस्से को तेल जितनी ही गंभीरता से लिया गया, तो यह योजना आयात बिल से ज़्यादा भारत के ऊर्जा बदलाव के काम आएगी — और दोनों ही कामयाबी कहलाएँगे।














