दीपक द्विवेदी
नई दिल्ली।नीट-यूजी परीक्षा में कथित पेपर लीक और विसंगतियों के खिलाफ देश भर के छात्रों का आंदोलन आज एक राष्ट्रीय बहस बन चुका है। सड़कों पर उतरते छात्र, गूंजते नारे और प्रशासनिक तंत्र से उठता विश्वास—यह दृश्य भारत की शिक्षा व्यवस्था की एक गहरी बीमारी को रेखांकित करता है। लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। जब दांव पर करोड़ों युवाओं का भविष्य हो, तो आक्रोश का फूटना स्वाभाविक है। यह विश्लेषण करना भी जरूरी है कि छात्रों का यह उग्र रुख किस हद तक न्यायसंगत है और कहां जाकर यह अपनी दिशा खोने के जोखिम से घिरता जा रहा है। इस आंदोलन के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यह है कि साल भर, दिन-रात कमरे में बंद रहकर, लाखों रुपये कोचिंग और फॉर्म पर खर्च करने वाले छात्रों के लिए परीक्षा की पवित्रता सर्वोपरि है। जब पेपर लीक या धांधली की खबरें सबूतों के साथ सामने आती हैं तो केवल एक परीक्षा की विश्वसनीयता नहीं टूटती, बल्कि एक पूरी पीढ़ी का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है। छात्रों का यह आंदोलन इसलिए सही है क्योंकि इसने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) और सरकार की जवाबदेही तय करने पर मजबूर किया है। अगर छात्र सड़कों पर न उतरते, सोशल मीडिया पर मुहिम न चलाते और विपक्ष तथा न्यायपालिका का ध्यान इस ओर न खींचते, तो शायद यह संवेदनशील मामला भी ‘छिटपुट घटना’ बनकर रह जाता। इस लिहाज से यह आंदोलन व्यवस्था को सुधारने और भविष्य की परीक्षाओं को फुलप्रूफ बनाने के लिए एक बेहद जरूरी और सकारात्मक दबाव है। छात्र केवल अपनी मेहनत का सही मूल्यांकन और एक पारदर्शी प्रक्रिया मांग रहे हैं।
परीक्षा प्रणाली के इस ‘चीरहरण’ को रोकने के लिए आंदोलनों की तात्कालिक ऊर्जा को एक दीर्घकालिक और रचनात्मक सुधार के दबाव में बदलना होगा।
दूसरी ओर, इस आंदोलन के कुछ पहलुओं और इसके तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं जो हर प्रकार से औचित्यपूर्ण हैं। आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी तब उजागर होती है जब इसमें राजनीतिक हित साधने वाले तत्व प्रवेश कर जाते हैं एवं अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं तो मूल मुद्दा भटक जाता है। तब यह केवल सत्ता-पक्ष बनाम विपक्ष की जंग बनकर रह जाता है। पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे की आड़ में प्रधानमंत्री आवास के बाहर हिंसक प्रदर्शन करना, भीड़ को उकसाना और भारत की तुलना श्रीलंका, बांग्लादेश या नेपाल से करना एक गैर-जिम्मेदाराना और अलोकतांत्रिक कृत्य है। इसमें शामिल पार्टियों को यह समझना होगा कि उनका यह कदम संवैधानिक गरिमा, कानून के शासन और परिपक्व लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास को दर्शाता है।
इसके अलावा, आंदोलन के नाम पर कुछ जगहों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, रेलवे या सड़कों को अवरुद्ध करना और हिंसक प्रदर्शन करना किसी भी स्थिति में सही नहीं माना जा सकता। कानून हाथ में लेने से छात्रों की नैतिक ताकत कमजोर होती है। यदि देखा जाए तो यह आंदोलन न तो पूरी तरह सही है और न ही पूरी तरह गलत। छात्रों का अपनी पीड़ा को व्यक्त करना और तंत्र को कटघरे में खड़ा करना शत-प्रतिशत सही है। परीक्षा नियामक संस्थाओं की ढिलाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं का यह उग्र रूप एक जीवित लोकतंत्र की पहचान है लेकिन बिना सोचे-समझे पूरी व्यवस्था को ठप कर देना, अदालती प्रक्रियाओं का सम्मान न करना और केवल जिद पर अड़े रहना इस आंदोलन के नकारात्मक पहलू हैं। इस जटिल समस्या का समाधान सड़कों पर पत्थरबाजी या अंतहीन धरनों से नहीं बल्कि एक संतुलित और संस्थागत दृष्टिकोण से ही संभव है। सुप्रीम कोर्ट और उच्च स्तरीय जांच समितियों को गहन अध्ययन करना चाहिए कि और ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाएं जिससे परीक्षा में धांधली करने की गुंजाइश ही न रहे।
वस्तुतः नीट-यूजी परीक्षा का यह छात्र आंदोलन भारत के नीति-निर्माताओं के लिए एक अंतिम चेतावनी (वेक-अप कॉल) जैसा है। युवाओं के इस गुस्से को केवल एक ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की समस्या मानकर नहीं चलना चाहिए। सरकार को प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ संवेदनशीलता से संवाद करना चाहिए, जांच में पूरी पारदर्शिता बरतनी होगी और दोषियों को ऐसी सख्त सजा देनी होगी जो एक मिसाल बन सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट कहा है कि नीट पेपर लीक पर सरकार छात्रों के साथ है और पेपर लीक करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी। छात्रों को भी यह समझना होगा कि उनकी ताकत उनकी एकजुटता और उनके मुद्दों की सत्यता में है, न कि आक्रामकता या तोड़फोड़ में। परीक्षा प्रणाली के इस ‘चीरहरण’ को रोकने के लिए आंदोलनों की तात्कालिक ऊर्जा को एक दीर्घकालिक और रचनात्मक सुधार के दबाव में बदलना होगा। जब तक पूरी चयन प्रक्रिया तकनीक से लैस, पारदर्शी और मानवीय त्रुटियों या भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं होगी, तब तक सड़कों पर ऐसे मार्च होते रहेंगे। साथ ही न्याय की मांग का स्वागत होना चाहिए, बशर्ते वह न्याय के सिद्धांतों के दायरे में रहकर ही की जाए।












