ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बनने की राह पर है। उसकी एयरलाइनों के ऑर्डर अब टुलूस और सिएटल की फैक्टि्रयों को चला रहे हैं पर अड़चन अब जहाज नहीं, उन्हें उड़ाने और ठीक करने वाले लोगों को लेकर है।
दुनिया के एविएशन का केंद्र पूरब की ओर खिसक रहा है, और भारत उसकी धुरी पर है। एयरबस और बोइंग जब अपनी फैक्टि्रयां संभाल रहे हैं, तब भारतीय एयरलाइनों के ऑर्डर, बड़े, महत्वाकांक्षी और कभी-कभी सतर्क, दुनिया की प्रोडक्शन की रफ्तार तय कर रहे हैं। भारत अब सिर्फ खरीदार नहीं, बल्कि वह बाजार बन गया है जिसे देखकर पूरी इंडस्ट्री अपना भविष्य तय करती है।
आंकड़े बताते हैं कि अगले दशक में 25,000 से 30,000 पायलट चाहिए। पर डीजीसीए ने 2020 से 2024 के बीच सिर्फ करीब 5,700 कमर्शियल पायलट लाइसेंस दिए।
उछाल और समझदारी
भरोसे का सबसे बड़ा सबूत आकासा एयर से आया। इस युवा लो-कॉस्ट एयरलाइन ने 226 बोइंग 737 मैक्स जहाजों का पक्क ा ऑर्डर दिया है, तथा 187 और छह साल में आने वाले हैं। इसके उलट टर्नअराउंड के बीच और अपनी माली हालत सुधारने पर टिकी टाटा की एंकर इंडिया एयरलाइन ने 600 जहाज़ों का बड़ा ऑर्डर टाल दिया। यह याद दिलाता है कि एविएशन में समझदारी और बहीखाते की सेहत भी उतनी ही जरूरी है। इन दोनों के बीच, भारतीय एयरलाइनें अकेले 2026 में करीब 55 जहाज बेड़े में जोड़ेंगी।
असली दिक्क त लोग
अड़चन अब मशीन नहीं, इसे चलाने वालों को लेकर है। संसद में दिए आंकड़े बताते हैं कि अगले दशक में 25,000 से 30,000 पायलट चाहिए। पर डीजीसीए ने 2020 से 2024 के बीच सिर्फ करीब 5,700 कमर्शियल पायलट लाइसेंस दिए। ऊपर से अनुभवी कप्तान बेहतर सैलरी के लिए विदेशी एयरलाइनों में जा रहे हैं। इतने बड़े बेड़े को सिर्फ पायलट ही नहीं, इंजीनियर, केबिन क्रू और मरम्मत का पूरा उद्योग चाहिए। एविएशन मंत्री खुद पायलट की कमी को बड़ी प्राथमिकता बता चुके हैं।

पूरा इकोसिस्टम बनाना होगा
कॉकपिट से बाहर भी बड़ा मौका है। भारत का एमआरओ (मरम्मत और ओवरहॉल) बाजार अभी करीब 90 करोड़ डॉलर का है, जो बढ़कर 4.3 अरब डॉलर तक पहुंचने वाला है, सालाना 14-15 फीसदी की रफ्तार से। सरकार जमीन के पट्टे बढ़ा रही है और नोएडा जैसे एमआरओ हब में निवेश ला रही है। उड़ान स्कीम पहले ही 625 रूट और 85 एयरपोर्ट चालू कर चुकी है। भीड़ घटाने के लिए 2030 तक छह ‘ट्विन-सिटी’ एयरपोर्ट की योजना है।
चुनौतियां भी हैं
जहाजों की डिलीवरी में देरी, इंजन की किल्लत, कड़ी प्रतिस्पर्धा में पतला मुनाफा और एअर इंडिया का ऑर्डर टालना। पर दिशा साफ है। बेंगलुरु के रनवे से लेकर यूरोप-अमेरिका की फैक्टि्रयों तक संदेश यही है, उड़ान का भविष्य अब भारत से होकर गुजरता है। बशर्ते देश उतनी तेजी से लोगों को ट्रेनिंग दे सके, जितनी उसकी महत्वाकांक्षा है।

भारत और आपके लिए क्या मायने?
बढ़ता एविएशन उड़ान को सस्ता बनाता है और छोटे शहरों को देश-दुनिया से जोड़ता है। बेड़े का विस्तार हज़ारों अच्छी नौकरियों— पायलट, इंजीनियर, केबिन क्रू, तकनीशियन का वादा करता है, बशर्ते ट्रेनिंग साथ चले। इससे एयरपोर्ट और एमआरओ हब भी बनेंगे, जो हुनर और पैसा देश में रखते हैं। यात्रियों के लिए इसका मतलब है ज़्यादा रूट और बेहतर कनेक्टिविटी; इकॉनमी के लिए टूरिज्म, व्यापार और तरक्क ी। पायलट की कमी याद दिलाती है , सिर्फ एयरपोर्ट ही काफी नहीं, लोगों में निवेश भी जरूरी है।
उड़ान भरता भारत
आकासा एअर: 226 बोइंग 737 का पक्क ा ऑर्डर (187 और कतार में)
एंकर इंडिया ने 600-विमान का ऑर्डर टाला
2026 में 55 जहाज भारतीय बेड़ों में; भारत तीसरे सबसे बड़े मार्केट की ओर
पायलट: दशक में 25,000-30,000 चाहिए
5,700 लाइसेंस (2020-24)
एमआरओ बाजार $90 करोड़ से ~$4.3 अरब की ओर।











