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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर का पतन…

सिर्फ दो साल में ही कैसे गंवा दी इंग्लैंड की सत्ता ?

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 4, 2026
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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर का पतन...

लंदन से दीपक द्विवेदी

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का इस्तीफा ब्रिटिश राजनीति की बड़ी घटना है। अभी दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं जब उन्होंने लेबर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं।

जिस पार्टी ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया, उसी पार्टी को अब उनके नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा। लेबर सांसदों को लगने लगा था कि स्टार्मर अगला चुनाव जिताने के लिए सही चेहरा नहीं हैं। स्टार्मर के इस्तीफे के पीछे कोई बड़ा घोटाला नहीं था। संसद में कोई बड़ी हार भी नहीं हुई थी। असली वजह थी पार्टी के भीतर उनका कमजोर होता नेतृत्व।

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लेबर पार्टी की लोकप्रियता लगातार गिर रही थी। दूसरी तरफ रिफॉर्म यूके तेजी से मजबूत हो रही थी। इससे लेबर सांसदों में बेचैनी बढ़ गई। उन्हें डर था कि अगर स्टार्मर प्रधानमंत्री बने रहे तो पार्टी अगला चुनाव हार सकती है।

इसी बीच एंडी बर्नहम की वेस्टमिंस्टर में वापसी ने हालात बदल दिए। मेकरफील्ड उपचुनाव में उनकी जीत के बाद लेबर सांसदों को स्टार्मर का एक मजबूत विकल्प मिल गया। इसके बाद 10 डाउनिंग स्ट्रीट पर दबाव और बढ़ गया।

स्टार्मर सत्ता में स्थिरता और बदलाव का वादा लेकर आए थे। उन्होंने कहा था कि वे देश को नई दिशा देंगे। कंजर्वेटिव सरकारों के लंबे उतार-चढ़ाव के बाद लोगों को उनसे उम्मीद थी।

शुरुआत में उनका शांत और गंभीर अंदाज लोगों को अच्छा लगा। वे एक अनुशासित और जिम्मेदार नेता के रूप में दिखे लेकिन सरकार चलाने के दौरान यही अंदाज उनकी कमजोरी बन गया।

लोगों को लगा कि स्टार्मर बहुत सावधान हैं। वे जनता से दूर दिखने लगे। उनका नेतृत्व प्रेरणादायक नहीं लग रहा था। जिन लोगों ने बदलाव की उम्मीद में वोट दिया था, उन्हें अपनी जिंदगी में कोई बड़ा फर्क दिखाई नहीं दिया।

अर्थव्यवस्था ने भी स्टार्मर की मुश्किलें बढ़ाईं ं। ब्रिटेन किसी बड़े आर्थिक संकट में नहीं था लेकिन आम लोगों की आर्थिक हालत पर दबाव बना हुआ था।

जीवन-यापन महंगा था। कारोबारियों का भरोसा कमजोर था। सरकारी खजाने पर दबाव था। विकास की बातें हो रही थीं लेकिन उसका असर आम परिवारों तक नहीं पहुंच रहा था।

स्टार्मर ने वादा किया था कि वे अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे। उन्होंने सार्वजनिक सेवाओं को सुधारने की भी बात कही थी लेकिन कई वोटरों को लगा कि देश अब भी वहीं अटका हुआ है।

इमिग्रेशन भी उनकी सरकार के लिए बड़ा मुद्दा बन गया। सरकारी आंकड़ों में नेट माइग्रेशन पहले से कम दिख रहा था लेकिन जनता की चिंता अलग थी।

लोग छोटी नावों से आने वाले अवैध प्रवासियों, असायलम होटलों और बॉर्डर कंट्रोल को लेकर परेशान थे। रिफॉर्म यूके ने इस मुद्दे को बहुत आक्रामक तरीके से उठाया। लेबर पार्टी लोगों को भरोसा नहीं दिला पाई कि उसने सीमाओं पर नियंत्रण वापस पा लिया है। इमिग्रेशन पर स्टार्मर की भाषा ने दोनों तरफ नाराजगी पैदा की। कुछ लेबर समर्थक नाराज हुए। वहीं सख्त कार्रवाई चाहने वाले वोटर भी संतुष्ट नहीं हुए। इस तरह स्टार्मर दो तरफा दबाव में फंस गए। रिफॉर्म यूके उन्हें सीमाओं पर कमजोर बता रही थी। वह कह रही थी कि स्टार्मर कामकाजी वर्ग की चिंताओं से कट गए हैं।

दूसरी ओर लेबर पार्टी के अंदर भी नाराजगी बढ़ रही थी। सेंटर-लेफ्ट और लेफ्ट के नेता उन्हें कमजोर और कम भावनात्मक नेता मानने लगे थे। आलोचकों का कहना था कि उनके पास देश के लिए कोई साफ और मजबूत मिशन नहीं दिख रहा।

एंडी बर्नहम के उभार ने यह स्थिति और गंभीर कर दी। ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर के रूप में उनकी छवि जनता से सीधे जुड़े नेता की रही है। वे क्षेत्रीय राजनीति को समझते हैं। वे आम लोगों की भाषा बोलते हैं। इसलिए कई लेबर सांसद उन्हें रिफॉर्म यूके का बेहतर जवाब मानने लगे।

स्टार्मर का इस्तीफा सिर्फ एक नेता की हार नहीं है। यह ब्रिटेन की राजनीतिक अस्थिरता को भी दिखाता है। देश में बार-बार प्रधानमंत्री बदल रहे हैं। जनता अधीर है। अर्थव्यवस्था पर दबाव है। इमिग्रेशन पर बहस और तेज हो गई है।

स्टार्मर का पतन यह बताता है कि आज के ब्रिटेन में भारी बहुमत भी सत्ता में बने रहने की गारंटी नहीं है। उनके इस्तीफे की सबसे बड़ी वजह थी लेबर पार्टी के भीतर विश्वास का खत्म होना, लेकिन इस विश्वास के टूटने के पीछे कई कारण थे। इनमें आर्थिक निराशा, इमिग्रेशन का दबाव और यह धारणा भी बढ़ गई थी कि बदलाव का वादा लोगों तक तेजी से नहीं पहुंचा।

स्टार्मर के जाने से भारत-ब्रिटेन संबंधों पर असर

कीर स्टार्मर के इस्तीफे से भारत-ब्रिटेन संबंधों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है किंतु लंदन में फैसले लेने की रफ्तार कुछ समय के लिए धीमी हो सकती है।

दोनों देशों के रिश्तों का सबसे बड़ा आधार भारत-ब्रिटेन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट है। यह समझौता पहले से मजबूत स्थिति में माना जा रहा है। ब्रिटेन सरकार के अनुसार यह एफटीए 15 जुलाई 2026 से लागू होगा।

इस समझौते से लंबे समय में दोनों देशों के व्यापार में हर साल 25.5 अरब पाउंड तक की बढ़ोतरी की उम्मीद है। इसका मकसद टैरिफ कम करना है। कस्टम प्रक्रिया को आसान बनाना और भारत-ब्रिटेन के कारोबारियों को ज्यादा सुविधा देना है।

भारत के लिए ब्रिटेन में नेतृत्व बदलाव तीन क्षेत्रों में अहम होगा। पहला, व्यापार समझौते को कैसे लागू किया जाता है। दूसरा, इमिग्रेशन नीति किस दिशा में जाती है। तीसरा, रणनीतिक सहयोग कितना मजबूत रहता है।

अगर एंडी बर्नहम या कोई और लेबर नेता प्रधानमंत्री बनता है, तो भारत यह देखेगा कि नई सरकार स्टार्मर की भारत-नीति को आगे बढ़ाती है या नहीं।

अगर ब्रिटेन इमिग्रेशन पर ज्यादा सख्त रुख अपनाता है तो भारतीय छात्रों, कामगारों और पेशेवरों पर असर पड़ सकता है। हालांकि व्यापार समझौते के तहत बिजनेस मोबिलिटी से जुड़े प्रावधान सुरक्षित रह सकते हैं।

रक्षा, टेक्नोलॉजी, क्लीन एनर्जी, हेल्थकेयर और शिक्षा के क्षेत्र में रिश्ते जारी रहने की उम्मीद है। इसकी वजह यह है कि ये संबंध किसी एक नेता पर निर्भर नहीं हैं। ये दोनों देशों के लंबे समय के राष्ट्रीय हितों से जुड़े हैं।

कुल मिलाकर स्टार्मर का जाना थोड़ी अनिश्चितता जरूर पैदा कर सकता है। लेकिन भारत-ब्रिटेन साझेदारी स्थिर रहने की संभावना है। यह रिश्ता आगे भी व्यावहारिक, व्यापार-केंद्रित और रणनीतिक बना रहेगा।

एफटीए से जुड़े आंकड़े ब्रिटेन सरकार के ट्रेड-डील सारांश पर आधारित हैं। वहीं रॉयटर्स के अनुसार कीर स्टार्मर के पद छोड़ने के बाद की प्रक्रिया को वास्तव में एक व्यवस्थित सत्ता हस्तांतरण (ऑर्डर्ली ट्रांसफर) के रूप में ही संभाला जा रहा है।

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