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मर्जी के बिना मां बनने के लिए बाध्य नहीं कर सकते : शीर्ष कोर्ट

- गर्भवती नाबालिग के 30 हफ्ते के गर्भ को गिराने की अनुमति

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 14, 2026
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राजेश दुबे
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला को, विशेष रूप से किसी बालिग को, उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। यह टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने एक नाबालिग को 30 हफ्ते का गर्भ गिराने की अनुमति दे दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल बयां की पीठ ने कहा, गर्भवती नाबालिग की प्रजनन स्वायत्तता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, खासकर तब, जब उसने स्पष्ट और लगातार गर्भ जारी रखने से इन्कार किया हो। अदालत ने कहा, इस मामले में मूल प्रश्न यही है कि संबंध सहमति से था या यौन उत्पीड़न का परिणाम। बात यह है कि नाबालिग मां नहीं बनना चाहती।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि नाबालिग को जिस गर्भावस्था का सामना करना पड़ रहा है, वह प्रथम दृष्टया वैध है क्योंकि वह स्वयं नाबालिग है और यह स्थिति एक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति से उत्पन्न हुई । अदालत ने कहा, यदि मां के हित को महत्व दिया जाए तो उसकी प्रजनन स्वायत्तता को पर्याप्त महत्व देना होगा। न्यायालय किसी महिला, विशेष तौर पर किसी नाबालिग को, उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ पूरा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया कि वह सभी आवश्यक चिकित्सकीय रक्षा मानकों का पालन करते हुए गर्भावस्था का समापन करे। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नाबालिग की स्पष्ट अनिच्छा ही निर्णायक आधार है। नैतिकता और कानूनी पहलुओं से जुड़े उन कठिन प्रश्नों पर ध्यान दिलवाया, जिनसे न्यायालय को निपटना था। यदि न्यायालय चिकित्सीय गर्भपात के मामले पर विचार नहीं करता, तो लोग झोलाछाप डॉक्टरों और अवैध चिकित्सा केंद्रों के पास जाएंगे, जो महिला के लिए सुरक्षित नहीं होगा।

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