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यूनुस का उदारवाद बेनकाब!

by ब्लिट्ज़ इंडिया
January 10, 2026
in the blitz
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दीपक द्विवेदी
तो क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय एवं मानवाधिकार संगठनों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे बांग्लादेश में हस्तक्षेप करें और हिंदुओं की सुरक्षा के लिए सरकार पर दबाव बनाएं?

गत कुछ दिनों में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा और बर्बरता की जो घटनाएं हुई हैं वे मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के शासन में 2024 से निरंतर जारी हिंसा का ही चरम हैं। एक हिंदू विधवा महिला के साथ सामूहिक दुराचार के बाद पेड़ पर लटकाकर उसकी पिटाई और फिर उसका वीडियो वायरल किया जाना मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है। इसके अतिरिक्त चौबीस घंटों के अंतराल में दो हिंदुओं की हत्या कर दी गई जिसमें एक पत्रकार भी शामिल था। इसके पू्र्व भी अनेक हिंदू चरमपंथी हिंसा का शिकार हो चुके हैं। किसी भी सभ्य, लोकतांत्रिक और सांविधानिक देश में ऐसे अपराध न केवल कानून-व्यवस्था की विफलता को दर्शाते हैं बल्कि मानवीय मूल्यों पर भी गहरा आघात करते हैं। वह भी एक ऐसी अंतरिम सरकार के दौर में जिसका मुखिया नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त मोहम्मद यूनुस हैं। इसमें अब कोई संदेह नहीं कि यूनुस सरकार बांग्लादेश में शांति बहाल करने एवं अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूर्णरूपेण विफल रही है। उनकी यह विफलता अब सवालों के घेरे में है और यह प्रश्न खड़ा हो रहा है कि क्या ऐसा व्यक्ति नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार बना रह सकता है जिसके कार्यकाल में अल्पसंख्यक हिंदुओं को धर्म के नाम और हिंदू पहचान होने के कारण बेरहमी से मारा जा रहा है।

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हाल-फिलहाल बांग्लादेश में जिस प्रकार की लक्षित हिंसा देखने को मिल रही है वह सामान्य कानून-व्यवस्था की विफलता से कहीं अधिक गहरी और चिंताजनक समस्या की ओर संकेत कर रही है। जो स्थिति प्रारंभ में आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से उपजे असंतोष के रूप में सामने आई थी वह अब धीरे-धीरे पहचान आधारित घृणा, संस्थागत निष्कि्रयता और सामाजिक विश्वास के क्षरण में बदलती दिखाई दे रही है। बांग्लादेश के विभिन्न जिलों से सामने आ रही हत्याओं, हमलों और धमकियों की घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि हिंसा अब अराजक या आकस्मिक नहीं रही, बल्कि वह चयनित, सुनियोजित और विशेष समुदायों व व्यक्तियों को निशाना बनाकर की जा रही है। पिछले एक वर्ष में अनेक मोर्चों पर शासन की विफलताओं के खिलाफ हुए आंदोलन समय के साथ अपना केंद्रीकृत नेतृत्व और स्पष्ट दिशा खोते चले गए। इसी शून्य का लाभ उठाकर चरमपंथी प्रवृत्तियों, आपराधिक गिरोहों और अवसरवादी तत्वों को खुला मैदान मिल गया। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह अराजकता अब उन लोगों पर हमलों के रूप में सामने आ रही है, जिन्हें उनके कर्मों के कारण नहीं बल्कि उनकी पहचान के कारण निशाना बनाया जा रहा है। विशेषकर धार्मिक अल्पसंख्यकों, छोटे व्यापारियों और उन व्यक्तियों को, जिन्हें सामाजिक या राजनीतिक रूप से कमजोर समझा जाता है। ये कृत्य अचानक उपजे क्रोध का परिणाम नहीं बल्कि पहले से सोचे-समझे और योजनाबद्ध अपराध थे। एक घटना में एक व्यापारी की बेरहमी से हत्या कर दी गई जबकि कुछ ही समय पहले पास के जिले में एक अन्य व्यवसायी को इसी तरह गोली मार दी गई थी। एक अन्य मामले में एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता को पहले सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, फिर उसकी हत्या कर दी गई और इस पूरी घटना को रिकॉर्ड कर प्रसारित किया गया। यह न केवल क्रूरता को दर्शाता है, बल्कि समाज में भय फैलाने और हिंसा को सामान्य बनाने की सोची-समझी कोशिश भी प्रतीत होती है। ये घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि उस व्यापक पैटर्न का हिस्सा हैं जो तब उभरता है जब राज्य की सत्ता कमजोर पड़ जाती है और जवाबदेही की व्यवस्थाएं ढहने लगती हैं।

होना तो यह चाहिए कि मानवाधिकारों का घनघोर उल्लंघन करने वाली इन घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए यूनुस सरकार को ठोस कदम उठाकर हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और दोषियों को शीघ्र कठोर दंड देकर पीड़ितों को न्याय व पुनर्वास प्रदान करना चाहिए। मोहम्मद यूनुस और उनसे जुड़े उदारवादी-प्रगतिशील तबकों ने वर्षों तक सामाजिक न्याय तथा मानवाधिकारों की बात की है किंतु जब वास्तविक परीक्षा सामने आई है तो सारे नकाब उतरते दिख रहे हैं। अल्पसंख्यकों की हत्या पर भारत सरकार के बार-बार आगाह करने के बावजूद बांग्लादेश सरकार ने सिर्फ आश्वासन ही दिया है जो उसके दावों की पोल खोलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यूनुस सरकार कट्टरपंथियों की कठपुतली बनकर रह गई है। यदि बांग्लादेश अराजकता के दौर में बना रहा तो इस बात का डर है कि वह अस्थिरता की लंबी अवधि में चला जाए। कहा जा रहा है कि फरवरी में चुनाव होने तक ऐसी घटनाएं वहां और बढ़ेंगी, तो क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय एवं मानवाधिकार संगठनों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे बांग्लादेश में हस्तक्षेप करें और हिंदुओं की सुरक्षा के लिए सरकार पर दबाव बनाएं? क्षेत्रीय शांति व स्थिरता के लिए बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा अनिवार्य है। बांग्लादेशी समाज को भी अपनी सरकार तक यह संदेश पहुंचाना चाहिए कि वह नफरत, हिंसा और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर अंकुश लगाए।

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