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अजब-गजब: भारत का अनोखा गांव, जहां लड़की नहीं छोड़ती मायका

शादी के बाद लड़का जाता है ससुराल

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 2, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। भारत के मेघालय राज्य के खासी जनजाति से एक अजब-गजब परंपरा जुड़ी हुई है और इसे देश की सबसे अनोखी सामाजिक व्यवस्थाओं में गिना जाता है। यहां आम भारतीय समाज की तरह पितृसत्तात्मक नहीं, बल्कि मातृसत्तात्मक व्यवस्था चलती है। इसका मतलब है कि परिवार, संपत्ति और वंश की पहचान पुरुष से नहीं, बल्कि महिला से होती है।
खासी समाज में शादी के बाद लड़की ससुराल नहीं जाती, बल्कि दूल्हा अपनी पत्नी के घर आकर रहता है। लड़की अपना मायका कभी नहीं छोड़ती। यहां विदाई बेटी की नहीं, बल्कि बेटे की होती है। यही वजह है कि इस परंपरा को लोग हैरानी से देखते हैं।
इस व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि घर और संपत्ति का अधिकार सबसे छोटी बेटी को मिलता है, जिसे खासी भाषा में का खाद्दूह कहा जाता है। वही घर की मुखिया बनती है और माता-पिता की देखभाल करती है। परिवार की जमीन, मकान और जिम्मेदारियां उसी को सौंपी जाती हैं।
संपत्ति और वंश की चाबी महिलाओं के पास
खासी समुदाय में बच्चे भी अपने पिता का नहीं, बल्कि मां का सरनेम अपनाते हैं। इससे परिवार की पहचान मां के नाम से चलती है। शादी के बाद पुरुष पत्नी के परिवार का हिस्सा बन जाता है और घर की जिम्मेदारियों में सहयोग करता है। हालांकि पुरुष काम करते हैं और समाज में भूमिका निभाते हैं, लेकिन संपत्ति और वंश की चाबी महिलाओं के पास रहती है।
महिलाओं को सुरक्षित और मजबूत बनाना
यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसका उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित और मजबूत बनाना है। पुराने समय में युद्ध और कठिन हालात में पुरुषों की मृत्यु अधिक होती थी, इसलिए वंश को बचाने के लिए महिलाओं को केंद्र में रखा गया। इससे परिवार की स्थिरता बनी रहती थी।
महिलाएं निभाती हैं ये जिम्मेदारियां
आज भी मेघालय के खासी समाज में महिलाएं फैसले लेने में आगे रहती हैं। वे संपत्ति संभालती हैं, बच्चों का भविष्य तय करती हैं और परिवार की रीढ़ मानी जाती हैं। यही वजह है कि इसे महिला सशक्तिकरण का अनोखा उदाहरण कहा जाता है।
खासी समुदाय की परंपरा
कई लोग इसे “ऐसा गांव जहां बेटी नहीं, बेटे की विदाई होती है” कहकर बताते हैं, लेकिन असल में यह किसी एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे खासी समुदाय की परंपरा है। कुछ हद तक गारो जनजाति में भी ऐसी व्यवस्था देखने को मिलती है।
ज्यादातर जगह पितृसत्तात्मक समाज
भारत जैसे देश में जहां ज्यादातर जगह पितृसत्तात्मक समाज है, वहां खासी जनजाति की यह मातृसत्तात्मक परंपरा अलग पहचान बनाती है और दिखाती है कि समाज में महिलाओं को सम्मान और अधिकार देकर भी संतुलन बनाया जा सकता है।

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