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पोक्सो एक्ट के दुरुपयोग से सुप्रीम कोर्ट चिंतित

केंद्र सरकार से प्रभावी कदम उठाने को कहा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
January 17, 2026
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भारत के विभिन्न राज्यों की महत्वपूर्ण खबरें

हरित भारत मिशन का दस साल का हिसाब

राजेश दुबे

नई दिल्ली। पोक्सो कानून के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) में तथाकथित ‘रोमियो जूलियट’ प्रावधान जोड़ने पर विचार करे, ताकि किशोर उम्र में बने वास्तविक और आपसी सहमति वाले प्रेम संबंधों को अपराध की श्रेणी में आने से रोका जा सके। खासकर उन मामलों में जहां 16-17 साल की लड़की और 18-19 साल के लड़के के बीच सहमति से संबंध होते हैं।
वर्तमान कानून में 18 साल से कम उम्र की लड़की की सहमति को मान्यता नहीं मिलती, जिसके कारण ऐसे रिश्तों में भी लड़के पर बलात्कार या पोक्सो का केस दर्ज हो जाता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि पॉक्सो जैसे सख्त कानून का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल सामने आ रहा है और इसे रोकने के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाने होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति विधि मंत्रालय के सचिव को भेजी जाए, ताकि कानून में संभावित संशोधनों पर विचार किया जा सके।
पीठ ने कहा कि ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जिससे उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सके जो बदले की भावना से या दुर्भावनापूर्ण तरीके से पॉक्सो कानून का दुरुपयोग करते हैं। अदालत का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा बनाए रखते हुए किशोर प्रेम संबंधों में शामिल युवाओं को अनावश्यक रूप से अपराधी बनने से बचाना है। पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह कानून में संशोधन कर ऐसे प्रेम संबंधों को पोक्सो के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान जोड़े। यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के आरोपी को दी गई जमानत को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश की कुछ टिप्पणियों को गलत माना, लेकिन आरोपी को दी गई जमानत को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉक्सो मामलों में जमानत के स्तर पर हाई कोर्ट पीड़ित की उम्र का अनिवार्य मेडिकल एज-डिटरमिनेशन टेस्ट कराने का आदेश नहीं दे सकता। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्देश को खारिज कर दिया, जिसमें हर पोक्सो मामले में बेल के समय मेडिकल एज टेस्ट कराने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 के तहत जमानत सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ‘मिनी ट्रायल’ नहीं कर सकता।
पीड़ित की उम्र तय करना
बेल कोर्ट का विषय नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़ित की उम्र तय करना ट्रायल कोर्ट का विषय है, न कि बेल कोर्ट का। अगर उम्र को लेकर विवाद हो, तो बेल कोर्ट केवल प्रस्तुत दस्तावेजों को देख सकता है, उनकी सत्यता की जांच नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को दी गई जमानत बरकरार रखी, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के मेडिकल टेस्ट वाले निर्देश को रद कर दिया।
यह फैसला पोक्सो कानून में संतुलित सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, ताकि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित रहे और निर्दोष किशोरों को अनावश्यक रूप से अपराधी न बनाया जाए।

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