• Latest
  • Trending

अहम मोड़ पर प्लास्टिक उद्योग

May 22, 2026
भारत के सरकारी, कौशल, प्रवासी और जनकल्याण अपडेट

भारत के कौशल, प्रवासी, रक्षा, खाद्य और सरकारी योजनाओं से जुड़े प्रमुख अपडेट

September 24, 2026
भारत स्वास्थ्य, रेलवे, रक्षा और विकास अपडेट

भारत के स्वास्थ्य, रेलवे, रक्षा, आयुर्वेद और विकास से जुड़े प्रमुख अपडेट

September 24, 2026
infra

भारत का निर्यात, मैन्युफैक्चरिंग, एफटीए और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर: प्रमुख आर्थिक अपडेट

September 24, 2026
भारत मंडपम, नई दिल्ली में 9वें भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह का उद्घाटन करते उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन, 22 सितंबर 2026। श्रेय : पीआईबी।

भारत की सरकारी योजनाएं, उड़ान, जल सप्ताह और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: प्रमुख अपडेट

September 24, 2026
आयुर्वेद, कोयला, सेमीकंडक्टर, MMA और सिने हब

22 सितंबर 2026 की प्रमुख खबरें: आयुर्वेद, कोयला, सेमीकंडक्टर, MMA और सिने हब

September 23, 2026
EPF स्कीम 2026 नए नियम

22 सितंबर 2026 की प्रमुख खबरें: पीएफ सीमा, न्यूजीलैंड FTA, फिल्म पुरस्कार और CAG रिपोर्ट

September 22, 2026
daily-news

भारत की प्रमुख खबरें 22 सितंबर 2026: बुजुर्ग योजना, कोर सेक्टर, हाईवे और रक्षा

September 22, 2026
daily-news

भारत की प्रमुख खबरें 21 सितंबर 2026: तेजस उड़ान, ग्वालियर टेलीकॉम जोन, खेल और फिल्म पुरस्कार

September 21, 2026
ब्रिक्स ने पहलगाम आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की

ब्रिक्स 2026: भारत की कूटनीतिक विजय

September 21, 2026
केदारनाथ यात्रा 2026

केदारनाथ पर बढ़ता प्राकृतिक जोखिम

September 21, 2026
पीएम मोदी का ‘दिमागी नक्सल’ बयान: विपक्ष की प्रतिक्रिया और वैचारिक बहस

सेवा के 25 वर्ष सुशासन का संकल्प और राष्ट्र निर्माण की सतत यात्रा।

September 21, 2026
modi

पीएम मोदी के जन्मदिन पर शुरू हुआ ‘सेवा संकल्प अभियान’

September 21, 2026
Friday, September 25, 2026
Retail
संपर्क
डाउनलोड
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर
No Result
View All Result
Welcome To Blitz India Media
No Result
View All Result

अहम मोड़ पर प्लास्टिक उद्योग

by ब्लिट्ज़ इंडिया
May 22, 2026
in the blitz
0

पार्थ नादपारा

नई दिल्ली।भारत का प्लास्टिक उद्योग एक अहम मोड़ पर है। दशकों से, प्लास्टिक पैकेजिंग ने कंज्यूमर गुड्स, फूड डिलीवरी, रिटेल, हेल्थकेयर, ई-कॉमर्स और मॉडर्न लॉजिस्टिक्स के विकास को बढ़ावा दिया है।

इसने प्रोडक्ट्स को सस्ता, हल्का, सुरक्षित और एक विशाल देश में आसानी से डिस्ट्रीब्यूट करने लायक बनाया। लेकिन इसी सुविधा ने भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक को भी जन्म दिया है: सड़कों, नालियों, नदियों, लैंडफिल और ग्रामीण इलाकों में फैला हुआ प्लास्टिक कचरा।
अभी जो ग्रीन ट्रांजिशन चल रहा है, उसका मकसद प्लास्टिक को पूरी तरह से खत्म करना नहीं है। इसका मकसद प्लास्टिक को डिज़ाइन करने, इस्तेमाल करने, इकट्ठा करने, रीसायकल करने और उसे फिर से अर्थव्यवस्था में शामिल करने के तरीके को बदलना है।

YOU MAY ALSO LIKE

भारत के कौशल, प्रवासी, रक्षा, खाद्य और सरकारी योजनाओं से जुड़े प्रमुख अपडेट

भारत के स्वास्थ्य, रेलवे, रक्षा, आयुर्वेद और विकास से जुड़े प्रमुख अपडेट

नीति की दिशा साफ है: भारत ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाले मॉडल से हटकर एक सर्कुलर पैकेजिंग अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना चाहता है, जहाँ गैर-ज़रूरी प्लास्टिक को कम किया जाए, रीसायकल हो सकने वाली पैकेजिंग को बढ़ावा दिया जाए, प्रोड्यूसर्स को इस्तेमाल के बाद बचे कचरे के लिए जिम्मेदार बनाया जाए, और रीसाइक्लिंग एक औपचारिक औद्योगिक गतिविधि बन जाए।

इस चुनौती का पैमाना काफी बड़ा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों द्वारा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जमा किए गए डेटा के आधार पर, भारत में 2020-21 में 41.26 लाख टन, 2021-22 में 39.01 लाख टन और 2022-23 में 41.36 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ।

ईपीआर: सुधार की रीढ़

सबसे महत्वपूर्ण रेगुलेटरी बदलाव प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए ‘एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (ईपीआर) की शुरुआत है। इस सिस्टम के तहत, प्रोड्यूसर्स, इंपोर्टर्स और ब्रांड मालिकों को उस प्लास्टिक पैकेजिंग की जिम्मेदारी लेनी होती है जिसे वे बाजार में लाते हैं।

इसमें कचरा इकट्ठा करना, रीसायकल करना, दोबारा इस्तेमाल करना, रीसायकल की गई सामग्री का उपयोग करना और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से उसका निपटान करना शामिल है।

फरवरी 2022 में अधिसूचित प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए ईपीआर दिशानिर्देशों ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से एक अनुपालन ढांचा तैयार किया है।

सरकार ने कहा है कि ईपीआर ढांचे को न केवल प्लास्टिक कचरा प्रबंधन में सुधार के लिए डिजाइन किया गया है, बल्कि ईपीआर प्रमाणपत्रों के माध्यम से रीसायकल करने वालों के लिए बाजार प्रोत्साहन बनाने के लिए भी डिजाइन किया गया है। इन प्रमाणपत्रों से रीसाइक्लिंग क्षमता में औपचारिकीकरण, प्रौद्योगिकी उन्नयन और निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को भारत द्वारा 1 जुलाई, 2022 से कुछ खास सिंगल-यूज प्लास्टिक चीजों पर लगाए गए बैन से भी सपोर्ट मिला है।

इनमें ऐसी चीजें शामिल थीं जिनकी उपयोगिता कम थी और जिनसे कचरा फैलने की संभावना ज्यादा थी। हालांकि, यह बैन समस्या के सिर्फ एक हिस्से को ही हल करता है। ज्यादातर प्लास्टिक पैकेजिंग अभी भी लीगल है, क्योंकि यह कंज्यूमर और इंडस्टि्रयल सप्लाई चेन में एक जरूरी काम करती है। इसलिए, सबसे बड़ा काम पैकेजिंग को दोबारा इस्तेमाल लायक, रीसायकल करने लायक, ट्रैक करने लायक और आर्थिक रूप से रिकवर करने लायक बनाना है।

पैकेजिंग डिजाइन पर फोकस

सुधार का अगला चरण पैकेजिंग डिजाइन में है। भारत का बदलाव तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक पैकेजिंग जटिल, कई परतों वाली और रीसायकल करने में मुश्किल बनी रहेगी। सैशे, लैमिनेटेड पाउच, लचीली फिल्में और मिश्रित-सामग्री वाली पैकेजिंग को इकट्ठा करना और प्रोसेस करना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि अक्सर इनकी दोबारा बेचने की कीमत कम होती है। इनकी रिकवरी बहुत हद तक ईपीआर पेमेंट, एकत्रीकरण सिस्टम और स्थानीय कचरा-प्रबंधन इंफ़्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करती है।

यहीं पर इंडिया प्लास्टिक्स पैक्ट जैसे इंडस्ट्री प्लेटफॉर्म, जिन्हें कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया ने मिलकर शुरू किया है, महत्वपूर्ण हो जाते हैं। 2030 के लिए उनका रोडमैप अनावश्यक और समस्या पैदा करने वाली प्लास्टिक पैकेजिंग को खत्म करने, प्लास्टिक पैकेजिंग को दोबारा इस्तेमाल लायक या रीसायकल करने लायक बनाने, यह पक्क ा करने कि 50 प्रतिशत प्लास्टिक पैकेजिंग को असरदार तरीके से रीसायकल किया जाए, और 2030 तक प्लास्टिक पैकेजिंग में औसतन 25 प्रतिशत रीसायकल की गई सामग्री का इस्तेमाल करने का लक्ष्य रखता है।

ये लक्ष्य इंडस्ट्री की सोच में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हैं। पहले, कचरा-प्रबंधन को एक ‘एंड-ऑफ-पाइप’ समस्या माना जाता था—यानी ऐसी चीज जिसे उत्पाद बिकने के बाद निपटाया जाए। नया नजरिया डिजाइन टेबल से ही शुरू होता है।

कंपनियों पर यह सवाल पूछने का दबाव डाला जा रहा है कि क्या कोई पैकेज जरूरी है? क्या इसे कम परतों के साथ बनाया जा सकता है? क्या इसे इकट्ठा किया जा सकता है? क्या इसे रीसायकल किया जा सकता है? और क्या रीसायकल की गई सामग्री को सुरक्षित रूप से दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है?

100 अरब डॉलर का अवसर

एफआईसीसीआई और एक्सेंचर ने टिकाऊ प्लास्टिक पैकेजिंग को एक बड़े आर्थिक अवसर के रूप में पेश किया है। उनकी रिपोर्ट, ‘भारत में टिकाऊ प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए रणनीतियाँ – 2030 तक 100 अरब डॉलर का अवसर’, इस बात पर जोर देती है कि भारत बड़ी मात्रा में प्लास्टिक पैकेजिंग का इस्तेमाल करता है, लेकिन खराब एकत्रीकरण, कम रीसायकलिंग क्षमता और ‘सर्कुलरिटी’ (चक्रीयता) के लिए कमज़ोर डिज़ाइन के कारण वह सामग्री का एक बड़ा मूल्य खो देता है।

इस रिपोर्ट का व्यापक संदेश महत्वपूर्ण है: स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) केवल नियमों का पालन करने का बोझ नहीं है। यह विनिर्माण, नवाचार और निवेश का एक अवसर बन सकती है।

यदि भारत पैकेजिंग डिज़ाइन में सुधार कर पाता है, एकत्रीकरण सिस्टम बनाता है, रीसायकलिंग क्षमता का विस्तार करता है, और रीसायकल किए गए प्लास्टिक के लिए भरोसेमंद बाजार तैयार करता है, तो प्लास्टिक मूल्य श्रृंखला नए रोज़गार पैदा कर सकती है, ‘वर्जिन’ (नई) सामग्री पर आयात निर्भरता को कम कर सकती है, और हरित विनिर्माण को बढ़ावा दे सकती है।

कंपनियों के लिए, इस बदलाव के लिए अनुसंधान, सामग्री विज्ञान, आपूर्ति-श्रृंखला के पुनर्गठन और उपभोक्ता संचार में निवेश की आवश्यकता होगी। फूड-ग्रेड पैकेजिंग, दवाइयों की पैकेजिंग और उच्च-प्रदर्शन वाली औद्योगिक पैकेजिंग के लिए गुणवत्ता संबंधी नियम अधिक सख्त होते हैं, जिससे रीसायकल की गई सामग्री का उपयोग करना और भी जटिल हो जाता है। लेकिन कई कैटेगरी — घरेलू सामान, पर्सनल केयर, नॉन-फूड पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और सेकेंडरी पैकेजिंग — तेजी से आगे बढ़ सकती हैं।

नीति आयोग का सर्कुलर इकॉनमी पर जोर

नीति आयोग का सस्टेनेबल शहरी प्लास्टिक कचरा मैनेजमेंट पर काम, प्लास्टिक ट्रांजिशन को बड़े सर्कुलर इकॉनमी फ्रेमवर्क के दायरे में रखता है। यूएनडीपी के साथ मिलकर तैयार की गई इसकी हैंडबुक, शहरी प्लास्टिक कचरा मैनेजमेंट के ज़रूरी हिस्सों के तौर पर टेक्निकल मॉडल, मटीरियल रिकवरी सुविधाओं, व्यवहार में बदलाव, डिजिटलीकरण और अच्छे शासन पर जोर देती है।

India’s Plastic Industry Shifts to Circular Economy

यह बहुत जरूरी है क्योंकि प्लास्टिक कचरा िसर्फ एक इंडस्टि्रयल मुद्दा नहीं है; यह म्युनिसिपल शासन के लिए भी एक चुनौती है। सबसे अच्छा पैकेजिंग डिजाइन भी फेल हो जाएगा अगर कचरे को उसके स्रोत पर अलग न किया जाए, नियमित रूप से इकट्ठा न किया जाए, ठीक से छांटा न जाए और अधिकृत प्रोसेसर्स तक न पहुंचाया जाए। भारत के शहरों को ज्यादा मजबूत मटीरियल रिकवरी सुविधाओं, विकेंद्रीकृत एकत्रीकरण केंद्रों, डिजिटल ट्रैकिंग और अनौपचारिक कचरा कर्मचारियों के बेहतर एकीकरण की ज़रूरत है।

नई जरूरतें उत्पादों की पैकेजिंग के लिए ऐसी सामग्री के चुनाव को निर्धारित कर रही हैं जो टिकाऊ, रिसायकल और दोबारा इस्तेमाल करने योग्य हो।

सर्कुलर इकॉनमी के तरीके में सिर्फ रीसाइक्लिंग से आगे बढ़ना भी शामिल है। दोबारा इस्तेमाल के मॉडल, रीफिल सिस्टम, जमा-वापसी के तरीके, वजन कम करना, जहाे सही हो वहां खाद बनने वाले विकल्प, और बेहतर उपभोक्ता व्यवहार — ये सभी समाधान का हिस्सा बनने चाहिए। सिर्फ रीसाइक्लिंग पर आधारित एक संकीर्ण रणनीति काफी नहीं होगी।

ग्रामीण भारत में प्लास्टिक विवाद की चर्चा में प्रवेश

प्लास्टिक कचरे को अक्सर शहरी समस्या के रूप में देखा जाता है, लेकिन ग्रामीण भारत नीतिगत चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण चरण II के तहत, प्लास्टिक कचरा प्रबंधन को ठोस कचरा प्रबंधन के एक घटक के रूप में शामिल किया गया है।

संसदीय और सरकारी दस्तावेजों में ब्लॉक स्तर पर प्लास्टिक कचरा प्रबंधन इकाइयों के लिए समर्थन का उल्लेख किया गया है, जिसमें गांवों में गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे के प्रबंधन में सहायता के लिए निधि प्रावधान शामिल हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों पर यह ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। पैकेटबंद उपभोक्ता वस्तुएं ग्रामीण बाजारों में व्यापक रूप से प्रवेश कर चुकी हैं, लेकिन संग्रहण और प्रसंस्करण प्रणालियां शहरों की तुलना में कमजोर बनी हुई हैं।

कम मूल्य वाली पैकेजिंग के पुनर्चक्रण के लिए अक्सर प्रोत्साहन कम होता है। यदि ग्रामीण प्लास्टिक कचरा प्रबंधन को मजबूत नहीं किया गया, तो भारत की चक्रीय पैकेजिंग की महत्वाकांक्षाएं अधूरी रह जाएंगी।

भारत ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाले मॉडल से हटकर एक ‘सर्कुलर पैकेजिंग इकॉनमी’ की ओर बढ़ना चाहता है, जहां गैर-जरूरी प्लास्टिक को कम किया जाए, रीसायकल होने वाली पैकेजिंग को बढ़ावा दिया जाए, प्रोड्यूसर्स को इस्तेमाल के बाद बचे कचरे के लिए जिम्मेदार बनाया जाए, और रीसाइक्लिंग को एक औपचारिक औद्योगिक गतिविधि बन जाए।

विकल्पों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है

सरकार ने प्रतिबंधित एकल-उपयोग प्लास्टिक के विकल्पों को भी प्रोत्साहित किया है, जिनमें गन्ने की खोई, समुद्री शैवाल, चावल और गेहूं की भूसी, पौधों के अवशेष, केले के पत्ते, सुपारी के पत्ते, जूट और कपड़े से बने उत्पाद शामिल हैं। स्टार्टअप और छोटे उद्यम बायोडिग्रेडेबल, कम्पोस्टेबल और बायो-आधारित उत्पादों के साथ इस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं।

हालांकि, विकल्पों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कागज की पैकेजिंग से पानी और ऊर्जा का उपयोग बढ़ सकता है। कम्पोस्टेबल प्लास्टिक के लिए उचित प्रमाणन और औद्योगिक कम्पोस्टिंग की स्थिति आवश्यक है।

जैविक सामग्री हमेशा जैव-अपघटनीय नहीं होती। कपड़ा और जूट कई मामलों में उपयोगी हैं, लेकिन सभी अनुप्रयोगों को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते। असली परीक्षा जीवन-चक्र प्रदर्शन, सामर्थ्य, विस्तारशीलता और प्रसंस्करण अवसंरचना की उपलब्धता है।

इसलिए, भारत का हरित पैकेजिंग परिवर्तन केवल प्लास्टिक बनाम कागज की बहस बनकर नहीं रह जाना चाहिए। सही दृष्टिकोण सामग्री-तटस्थ लेकिन स्थिरता-केंद्रित होना चाहिए: अनावश्यक चीजों को कम करें, सही उद्देश्य के लिए सही सामग्री का उपयोग करें, और सुनिश्चित करें कि प्रत्येक सामग्री का एक व्यवहार्य जीवन-समाप्ति मार्ग हो।

भारत ने पहले ही अपने सतत पैकेजिंग ढांचे की पहली परत तैयार कर ली है: प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध, ईपीआर दायित्व, सीपीसीबी का ऑनलाइन पोर्टल, सीआईआई का स्वैच्छिक उद्योग रोडमैप, फिक्क ी की चक्रीय अर्थव्यवस्था संबंधी सिफारिशें और नीति आयोग का शहरी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन मार्गदर्शन।

अगला चरण क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। ईपीआर अनुपालन विश्वसनीय और पता लगाने योग्य होना चाहिए। पुनर्चक्रण संबंधी दावों का सत्यापन होना चाहिए। स्थानीय निकायों को अपशिष्ट पृथक्क रण में सुधार करना चाहिए।

कंपनियों को केवल प्रमाणपत्र खरीदने के बजाय पैकेजिंग को फिर से डिजाइन करना चाहिए। पुनर्चक्रणकर्ताओं को स्वच्छ कच्चा माल, वित्त और प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है। अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को नजरअंदाज़ करने के बजाय, उन्हें औपचारिक व्यवस्थाओं में शामिल किया जाना चाहिए।
भारत का प्लास्टिक उद्योग लंबे समय से कम लागत वाले नवाचार और बड़े बाजार तक पहुंच का प्रतीक रहा है। अब इसका ‘ग्रीन ट्रांजिशन’ (हरित बदलाव) इसे ‘सर्कुलर मैन्युफैक्चरिंग’ का प्रतीक बना सकता है।

यदि नीतिगत अनुशासन, औद्योगिक निवेश और नागरिकों की भागीदारी—ये तीनों एक साथ आ जाएं, तो ‘सस्टेनेबल पैकेजिंग’ भारत के पर्यावरणीय और औद्योगिक बदलाव का एक सबसे मजबूत स्तंभ बन सकती है।

Beyond kabadiwalas

नई सोच की जरूरत

भारत अपनी प्लास्टिक कचरे की समस्या का एक बड़ा हिस्सा हल कर सकता है, लेकिन तभी जब रीसाइक्लिंग एक औपचारिक, ट्रैक करने योग्य और व्यावसायिक रूप से फायदेमंद अर्थव्यवस्था बन जाए।

देश में पहले से ही एक बड़ा अनौपचारिक रीसाइक्लिंग नेटवर्क मौजूद है, जिसे कचरा बीनने वालों, कबाड़ी वालों, एग्रीगेटर्स और छोटे प्रोसेसर्स का सहयोग मिलता है। यह सिस्टम कीमती चीजों को कुशलता से इकट्ठा करता है, लेकिन अक्सर यह बिना उचित सुरक्षा, टेक्नोलॉजी, क्वालिटी कंट्रोल या सामाजिक सुरक्षा के काम करता है।

नया ईपीआर फ्रेमवर्क इस पूरे सिस्टम को बदलने का एक मौका देता है। प्रोड्यूसर्स, इंपोर्टर्स और ब्रांड मालिकों को उस प्लास्टिक के लिए जिम्मेदार बनाकर, जिसे वे बाज़ार में लाते हैं, ईपीआर प्लास्टिक इकट्ठा करने और रीसाइक्लिंग के लिए लगातार मांग पैदा कर सकता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2022 में ईपीआर गाइडलाइंस लागू होने के बाद से बड़ी मात्रा में प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे की रीसाइक्लिंग की गई है।
लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग करने की प्रक्रिया कमजोर है, लचीले और कई परतों वाले प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग से मिलने वाला मूल्य कम होता है, और रीसाइकिल किया हुआ प्लास्टिक अक्सर नए (वर्जिन) मटीरियल से मुकाबला करने में पीछे रह जाता है।

कई रीसाइकलर्स के पास आधुनिक टेक्नोलॉजी और साफ-सुथरा कच्चा माल भी उपलब्ध नहीं है।

आगे का रास्ता साफ है: कचरे को अलग करने की प्रक्रिया में सुधार करें, मटीरियल इकट्ठा करने वाली सुविधाओं को मजबूत बनाएं, अधिकृत रीसाइकलर्स को सहयोग दें, रीसाइकिल किए हुए प्लास्टिक के लिए भरोसेमंद बाज़ार तैयार करें, और अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को सम्मान के साथ इस प्रक्रिया में शामिल करें।

केवल रीसाइक्लिंग से ही यह समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी, लेकिन एक मजबूत रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था भारत के ‘सर्कुलर प्लास्टिक भविष्य’ की रीढ़ बन सकती है।

ShareTweetSend

POPULAR NEWS

  • India shows way out to UN military observer group

    संरा के सैन्य पर्यवेक्षक समूह को भारत ने दिखाया बाहर का रास्ता

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • प्रोपर्टी पर जिसका 12 साल से कब्जा, वही होगा मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • 12 साल से है जमीन पर कब्जा तो वही होगा असली मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • गंगाजल खराब नहीं होता, लेकिन क्यों ?

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • पृथ्वी का आखिरी देश जहां सूरज केवल 40 मिनट के लिए ही डूबता है

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
Welcome To Blitz India Media

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation

Navigate Site

  • About
  • Our Team
  • Contact

Follow Us

No Result
View All Result
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation