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शत्रु को पहचानो, लव जेहादियों से बेटियों को बचाओ: सुनील देवघर

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शत्रु को पहचानो, लव जेहादियों से बेटियों को बचाओ: सुनील देवघर

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 4, 2026
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शत्रु को पहचानो, लव जेहादियों से बेटियों को बचाओ: सुनील देवघर

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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में यहां लाला सीताराम गोयल की स्मृति में आयोजित व्याख्यानमाला 75.0 में देशभर के वरिष्ठ संघ नेताओं के महाकुंभ में विविध मुद्दों, उपलब्धियों, चुनौतियों पर गहन मंथन हुआ। 20 से अधिक वक्ताओं ने उपस्थित सभी लोगों को आठ घंटे तक प्रभावशाली शैली-शब्दावली व उदाहरणों से बांधे रखा। सौ साल पहले डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना क्यों की, सौ साल में कितनी कठिनाइयां झेलीं, कितने पड़ाव पार किए, संघ कैसे हिंदुत्व के लिए संजीवनी बना, संघ और हिंदुत्व के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती क्या है? इन मुद्दों पर वक्ताओं ने विस्तार से अपनी बात कही।
व्याख्यानमाला के मुख्य वक्ता भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार व पार्टी के आंध्र प्रदेश के सह प्रभारी सुनील विश्वनाथ देवघर ने संघ के सौ साल का संघर्षपूर्ण सफरनामा पेश करते हुए कहा कि बड़ी चुनौतियां आज भी सामने हैं। उन्होंने कहा, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ मिशन का वर्तमान संदर्भ में अर्थ है बेटियों को लव जेहादियों से बचाना, हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाने वालों की मंशा का भंडाफोड़ करना, सबक सिखाना। उन्होंने कहा कि हर हिन्दू महिला को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए, नहीं तो हिन्दू घटते जाएंगे। जो घटेगा वहीं कटेगा। उन्होंने बताया कि 1996 संघ प्रमुख सुदर्शन जी ने तीन बच्चों का आह्वान किया था, उस पर अमल होता तो आज हिंदू युवाओं की नई फोर्स तैयार हो जाती। भारत हिन्दू राष्ट्र था, हिंदू राष्ट्र है और हिन्दू राष्ट्र रहेगा, इस पर कोई कंप्रोमाइज नहीं हो सकता। हमें अपने शत्रु का बोध होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि सुनील विश्वनाथ देवघर को 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 25 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाले मुख्य रणनीतिकार के रूप में जाना जाता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में वह वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव मैनेजर रहे। पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के विस्तार में उनकी भूमिका बेहद खास मानी जाती है।
अपने संबोधन में देवघर ने पूर्वोत्तर राज्यों में संघ भाजपा को जन जन तक पहुंचाने में आई कठिनाइयों, उग्रवाद, भाषा, क्षेत्रीयता, भौगोलिक-सामाजिक विषमताओं, विविधताओं, संस्कृति आदि का उदाहरण देते हुए उल्लेख किया। उन्होंने मधुकर लिमये, फड़नीस, मुरलीधर, शशिकांत ,शुक्लेश्वर, ओमप्रकाश चतुर्वेदी व त्रिपुरा के चार संघ पदाधिकारियों का उल्लेख करते हुए संघ के विस्तार के लिए जान हथेली पर रखकर अभियान चलाने वालों के जुनून के उदाहरण प्रस्तुत किए। सुनील देवघर बोले, पूर्वोत्तर राज्यों में गारो, खासी, जयंतिया समेत 200 से अधिक जनजातियां और इतनी ही बोलियां हैं। संघ कार्यकर्ताओं को पहले वहां की भाषा, बोली सीखनी-समझनी पड़ी।

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