डा. सीमा द्विवेदी
सिगरेट कुछ मिनटों में जलकर खत्म हो जाती है लेकिन उसका नुकसान शरीर में लंबे समय तक बना रहता है। हर कश के साथ भीतर पहुंचने वाला धुआं फेफड़ों के अलावा दिल, रक्त वाहिकाओं और दूसरे अंगों को भी प्रभावित करता है। निकोटीन की लत इस नुकसान को जानते हुए भी सिगरेट से दूर होना मुश्किल बना देती है।
भारत में इस समस्या का दायरा बड़ा है। वर्ष 2016–17 में हुए दूसरे वैश्विक वयस्क तंबाकू सर्वेक्षण, यानी गैट्स-2, के अनुसार देश में करीब 9.95 करोड़ वयस्क धूम्रपान करते थे। इनमें 3.75 करोड़ सिगरेट पीने वाले थे। रोज सिगरेट पीने वाला व्यक्ति औसतन 6-8 सिगरेट पीता था। करीब दो-तिहाई सिगरेट पीने वाले पूरा पैकेट खरीदने के बजाय खुली सिगरेट खरीदते थे। ये आंकड़े उस दौर की तस्वीर सामने रखते हैं लेकिन धूम्रपान के नुकसान पर दशकों से जुटते वैज्ञानिक प्रमाण एक स्पष्ट चेतावनी देते हैं- सिगरेट की कोई सुरक्षित मात्रा नहीं है।
सिगरेट का नुकसान फेफड़ों तक सीमित नहीं है। कैंसर, दिल और सांस की बीमारियों से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक इसका असर पड़ता है। शोध बताते हैं कि थोड़ी सिगरेट पीना भी सुरक्षित नहीं, लेकिन इसे छोड़ने से जीवन के कई साल बचाए जा सकते हैं
मौतों का बड़ा कारण
वर्ष 2021 में चिकित्सा पत्रिका ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज’ अध्ययन ने अनुमान लगाया कि 2019 में दुनिया भर में धूम्रपान से लगभग 76.9 लाख मौतें हुईं ं। पुरुषों में मृत्यु का जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में धूम्रपान सबसे ऊपर था। पुरुषों की कुल मौतों का 20.2 प्रतिशत हिस्सा इससे जुड़ा था।
भारत में भी इसका बोझ बढ़ा। इसी अध्ययन के अनुसार देश में धूम्रपान से होने वाली मौतों की अनुमानित संख्या 1990 के छह लाख से बढ़कर 2019 में दस लाख हो गई। ऐसी मौतों की संख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी वाले तीन देशों में भारत भी शामिल था।
इससे पहले, प्रभात झा और उनके सहयोगियों का भारत पर आधारित अध्ययन 2008 में ‘द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ था। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया था कि 2010 में देश में धूम्रपान से करीब 9.3 लाख वयस्कों की मौत होगी- यानी हर दिन 2,500 से अधिक।
फेफड़ों से आगे फैलता नुकसान
सिगरेट और गंभीर बीमारियों के बीच संबंध नया नहीं है। वर्ष 1964 में अमेरिका के सर्जन जनरल की सलाहकार समिति ने पुरुषों में सिगरेट पीने और फेफड़ों के कैंसर के बीच कारणात्मक संबंध स्थापित किया था। इसके बाद के शोधों ने दिखाया कि इसका नुकसान शरीर के लगभग हर अंग तक पहुंच सकता है।
सर्जन जनरल की 2014 की रिपोर्ट में धूम्रपान से जुड़ी बीमारियों और समस्याओं की सूची में मधुमेह, लिवर तथा बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर, टीबी, स्तंभन दोष, रूमेटॉयड आर्थराइटिस और रोगों से लड़ने की क्षमता में कमी को भी शामिल किया गया।
अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी ने तंबाकू के धूम्रपान को ‘ग्रुप-1’ में रखा है। इसका अर्थ है कि इंसानों में इससे कैंसर होने के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। धूम्रपान से होने वाले कैंसरों में फेफड़े, मुंह, गले, स्वरयंत्र, भोजन की नली, पेट, अग्न्याशय, आंत, लिवर, गुर्दे, मूत्राशय और गर्भाशय के मुंह का कैंसर शामिल है। मायलॉइड ल्यूकीमिया नाम का रक्त कैंसर भी इस सूची में है।
सर्जन जनरल की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार, सिगरेट के धुएं के साथ शरीर में सात हजार से अधिक रसायन पहुंचते हैं। इनमें सैकड़ों खतरनाक हैं और कम-से-कम 69 कैंसर पैदा करने के लिए जाने जाते हैं। यह धुआं कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाने, सूजन बढ़ाने और हानिकारक रासायनिक प्रक्रियाओं के जरिये बीमारी पैदा कर सकता है।
‘कम’ या ‘लाइट’ सिगरेट भी सुरक्षित नहीं
कम सिगरेट पीने को सुरक्षित मानना वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुरूप नहीं है। सर्जन जनरल की 2010 की रिपोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष था कि तंबाकू के धुएं के संपर्क का कोई भी स्तर पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं है। भारत में प्रभात झा के अध्ययन में भी रोज थोड़ी मात्रा में तंबाकू पीने का संबंध मृत्यु का जोखिम बढ़ने से पाया गया।
फिल्टर, कम टार या ‘लाइट’ सिगरेट भी सुरक्षा की गारंटी नहीं हैं। वर्ष 2010 की रिपोर्ट के अनुसार, सिगरेट की बनावट में इन बदलावों से पीने वालों में बीमारियों का कुल जोखिम कम नहीं हुआ।
जीवन के कई साल छीनती आदत
ब्रिटेन में रिचर्ड डॉल, रिचर्ड पीटो और उनके सहयोगियों ने 34,439 पुरुष डॉक्टरों के स्वास्थ्य और धूम्रपान की आदतों का 50 वर्षों तक अध्ययन किया। इसमें 1900 से 1930 के बीच जन्मे और लगातार केवल सिगरेट पीने वाले पुरुषों की मृत्यु, जीवन भर धूम्रपान न करने वालों की तुलना में औसतन लगभग दस वर्ष पहले हुई।
भारत में प्रभात झा के अध्ययन में भी जीवन की अवधि के मध्य मान, यानी मीडियन, में धूम्रपान करने वाली महिलाओं के लिए आठ वर्ष और पुरुषों के लिए छह वर्ष की कमी पाई गई।
धूम्रपान का असर मृत्यु से बहुत पहले सामान्य स्वास्थ्य पर दिखने लगता है। सर्जन जनरल की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, धूम्रपान करने वालों का स्वास्थ्य कम उम्र से ही अपेक्षाकृत खराब रहने लगता है और यह असर वयस्क जीवन में बना रहता है।
रिपोर्ट ने धूम्रपान को उम्र के साथ होने वाली आंख की बीमारी ‘मैक्युलर डिजनरेशन’ का भी कारण बताया जिसमें सामने की चीजों को साफ देखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। गर्भाशय के बाहर गर्भ ठहरने, यानी एक्टोपिक प्रेग्नेंसी के साथ भी इसका कारणात्मक संबंध बताया गया है। यह स्थिति गर्भवती महिला के लिए जानलेवा हो सकती है।
चेतावनी पर भारी पड़ती लत
नुकसान की जानकारी होने के बावजूद सिगरेट छोड़ना मुश्किल क्यों होता है? इसका एक बड़ा कारण निकोटीन है।
सर्जन जनरल की 1988 की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया था कि तंबाकू में मौजूद निकोटीन लत पैदा करता है। रिपोर्ट के अनुसार, तंबाकू की लत को संचालित करने वाली प्रक्रियाएं हेरोइन और कोकीन जैसे पदार्थों की लत की प्रक्रियाओं से मिलती-जुलती हैं।
भारतीय आंकड़े इस निर्भरता की तस्वीर दिखाते हैं। गैट्स-2 के अनुसार, किसी भी रूप में रोज तंबाकू इस्तेमाल करने वाले 58.5 प्रतिशत लोग जागने के आधे घंटे के भीतर उसका सेवन कर लेते थे।
पिछले एक वर्ष में सिगरेट छोड़ने की कोशिश करने वालों में 47.4 प्रतिशत एक महीने तक भी उससे दूर नहीं रह पाए। सर्वेक्षण में 83 प्रतिशत सिगरेट पीने वालों ने पैकेट पर स्वास्थ्य चेतावनी देखने की बात कही। फिर भी, बीड़ी पीने वालों सहित सभी धूम्रपान करने वालों में 47.9 प्रतिशत का मानना था कि इससे उनके शरीर को नुकसान नहीं हुआ है।
तनाव में राहत का भ्रम
धूम्रपान और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध भी महत्वपूर्ण है। ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियंस और रॉयल कॉलेज ऑफ साइकायट्रिस्ट्स की 2013 की संयुक्त रिपोर्ट में मानसिक बीमारियों वाले लोगों में धूम्रपान लगभग दोगुना पाया गया। धूम्रपान का संबंध अवसाद और चिंता संबंधी बीमारियां शुरू होने के अधिक जोखिम से भी मिला।
रिपोर्ट के अनुसार, निकोटीन न मिलने पर होने वाली बेचैनी और दूसरे लक्षण कभी-कभी मानसिक बीमारी के लक्षणों जैसे लग सकते हैं। सिगरेट पीने से इस तलब में राहत मिलने पर व्यक्ति को महसूस हो सकता है कि उसका तनाव या मानसिक परेशानी कम हो रही है।
इसके विपरीत, बीएमजे में 2014 में प्रकाशित शोध-समीक्षा में सिगरेट छोड़ने का संबंध अवसाद, चिंता और तनाव में कमी तथा मनोदशा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार से पाया गया।
भारत में टीबी से गहरा संबंध
भा रत के संदर्भ में धूम्रपान और टीबी का संबंध विशेष चिंता पैदा करता है। प्रभात झा के अध्ययन में धूम्रपान करने वालों के बीच अतिरिक्त मौतों के प्रमुख कारण टीबी, सांस और रक्त वाहिकाओं की बीमारियां तथा कैंसर थे।
अध्ययन में 30 से 69 वर्ष की आयु के धूम्रपान करने वाले पुरुषों में टीबी से मृत्यु का जोखिम, धूम्रपान न करने वाले पुरुषों के मुकाबले 2.3 गुना पाया गया। महिलाओं में यह जोखिम तीन गुना था।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की 2004 की तंबाकू नियंत्रण रिपोर्ट में भारतीय अध्ययनों के आधार पर बताया गया था कि लगातार सिगरेट या बीड़ी पीने वाले करीब हर चार में से एक व्यक्ति की मृत्यु तंबाकू के कारण 70 वर्ष की आयु से पहले हो जाती है। इस तरह समय से पहले मरने वाले लोग जीवन के लगभग 20 वर्ष खो देते हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय की 2022 की रिपोर्ट में उल्लिखित मुंबई और तिरुवनंतपुरम के दीर्घकालिक अध्ययनों में भी धूम्रपान करने वालों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम, धूम्रपान न करने वालों से 31 से 55 प्रतिशत अधिक पाया गया।

हर कश में नुकसान
1 सिगरेट = एक अकेली सिगरेट पीने से औसतन 20 मिनट की जिंदगी कम हो जाती है।
लिंग के आधार पर अंतर: पुरुषों में प्रति सिगरेट औसतन 17 मिनट और महिलाओं में औसतन 22 मिनट की जीवन प्रत्याशा घटती है।
1 पैकेट (20 सिगरेट) = लगभग 7 घंटे कम: यदि कोई व्यक्ति रोजाना एक पैकेट धूम्रपान करता है तो वह हर दिन अपने जीवन के लगभग 7 घंटे खो रहा है
धूम्रपान छोड़ने पर लौट सकते हैं जीवन के साल
म्रपान के नुकसान गंभीर हैं लेकिन इसे छोड़ने के लाभ भी स्पष्ट हैं। ब्रिटिश डॉक्टरों के अध्ययन में लगातार सिगरेट पीते रहने की तुलना में 60 वर्ष की उम्र में छोड़ने पर जीवन प्रत्याशा लगभग तीन वर्ष बढ़ी। 50 वर्ष में छोड़ने पर छह वर्ष, 40 वर्ष में नौ वर्ष और 30 वर्ष में छोड़ने पर लगभग दस वर्ष का लाभ मिला।
भारत में बड़ी संख्या में लोग इस आदत से बाहर निकलना भी चाहते हैं। गैट्स-2 के अनुसार, 55.4 प्रतिशत धूम्रपान करने वाले इसे छोड़ने में रुचि रखते थे या छोड़ने की योजना बना रहे थे। हालांकि, पिछले एक वर्ष में धूम्रपान छोड़ने की कोशिश करने वालों में 71.7 प्रतिशत ने किसी औपचारिक तरीके का इस्तेमाल नहीं किया था।
वैज्ञानिक प्रमाणों का संदेश स्पष्ट है: हर सिगरेट नुकसान बढ़ाती है जबकि इसे छोड़ने का फैसला जीवन बचाने की दिशा में कदम है। जितनी जल्दी सिगरेट छूटे, उतने अधिक वर्षों का लाभ मिल सकता है। लेकिन सिगरेट का धुआं केवल पीने वाले तक सीमित नहीं रहता। उसकी कीमत आसपास मौजूद लोगों को भी चुकानी पड़ सकती है।
अगली कड़ी: परिवार की सांसों में घुलता धुआं।
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नवीनतम शोध और डेटा विश्लेषण के अनुसार, धूम्रपान (स्मोकिंग) का हर एक कश जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेंटेंसी) को काफी तेजी से कम करता है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) के हालिया वैश्विक अध्ययन (जो तंबाकू नियंत्रण और सार्वजनिक स्वास्थ्य डेटा पर आधारित है) के अनुसार, पहले के 11 मिनट के अनुमान की तुलना में अब यह नुकसान लगभग दोगुना हो चुका है।














