वाशिंगटन। अमेरिका ने बड़ी आईटी कंपनियों पर बड़ा कदम उठाते हुए आठ कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम से निलंबित कर दिया है। उसका कहना है कि अब इन कंपनियों से जुड़े नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ेगी। अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने इसकी घोषणा की। इस दौरान उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी मौजूद थे।
किन कंपनियों पर हुई कार्रवाई?
सोंडरलिंग ने कहा कि दुनिया की कुछ बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम से निलंबित किया जा रहा है। इनमें कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिकी श्रम विभाग ने माइक्रोसॉफ्ट और एडोब को भी इस कार्यक्रम से निलंबित किया है। इस फैसले के तहत इन कंपनियों से जुड़े किसी नए स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम आवेदन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। पहले से लंबित आवेदनों पर भी प्रक्रिया रोक दी जाएगी।
अमेरिकी श्रम मंत्री ने इन कंपनियों के पुराने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2009 से अब तक सिर्फ इन कंपनियों ने करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए हैं। उन्होंने कहा कि इन कंपनियों के कर्मचारियों के लिए 2.30 लाख से ज्यादा एच-1बी वीजा मंजूर किए गए हैं।
इसके अलावा एक लाख से ज्यादा स्थायी श्रम प्रमाणन भी जारी किए गए हैं। सोंडरलिंग ने दावा किया कि इससे अमेरिकी कर्मचारियों के लिए उपलब्ध सैकड़ों हजारों नौकरियां प्रभावित हुईं।
माइक्रोसॉफ्ट पर जेडी वेंस ने लगाया आरोप
इस कार्रवाई को लेकर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर भी निशाना साधा। उन्होंने कंपनी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया और एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिका आने वाले विदेशी कर्मचारियों को लेकर सवाल उठाए। व्हाइट हाउस में फैसले की घोषणा के दौरान वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट में कर्मचारियों की छंटनी और विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति के बीच संबंध होने का दावा किया। वेंस ने कहा कि पिछले साल कंपनी ने करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला, जबकि इसी दौरान उसे 6,300 एच-1बी वीजा मिले। वेंस ने कहा कि अमेरिका में कोई दूसरी कंपनी इस व्यवस्था का माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा दुरुपयोग नहीं कर रही है।














