ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।हर साल अक्टूबर-नवंबर में उत्तर भारत की हवा जिस चीज़ से भारी होती है, वह खेत में पड़ी धान की पराली है। और हर साल भारत जिस चीज़ का आयात बिल चुकाता है, वह सड़क बनाने का बिटुमिन (कोलतार) है। सीएसआईआर की तीन प्रयोगशालाएँ बरसों से कह रही थीं कि ये दोनों एक ही समस्या हैं। 5 अगस्त 2026 को देहरादून में उन्होंने यह बात कहकर नहीं, दिखाकर बताई।
सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (सीएसआईआर-आईआईपी), देहरादून ने सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) और सीएसआईआर-उन्नत सामग्री एवं प्रक्रिया अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एएमपीआरआई) के साथ मिलकर बायो-बाइंडर तकनीक का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में तीनों प्रयोगशालाओं के निदेशक मौजूद थे — डॉ. हरेंद्र सिंह बिष्ट (आईआईपी), डॉ. सी. रवि शेखर (सीआरआरआई) और डॉ. थल्लाडा भास्कर (एएमपीआरआई) — और वे उद्योग साझेदार भी, जिन्हें आगे चलकर यह तकनीक बड़े पैमाने पर लगानी है।
होता क्या है
प्रक्रिया का नाम है पायरोलिसिस (pyrolysis) — बायोमास को ऑक्सीजन के बिना गरम किया जाता है। डॉ. रवि शेखर के अनुसार इससे चार चीज़ें निकलती हैं : बायो-ऑयल, बायो-बाइंडर, बायोचार और बायोगैस। इनमें जो भारी कार्बनिक हिस्सा है, वही बायो-बाइंडर बनता है, और वह लचीली सड़क (flexible pavement) में पेट्रोलियम से बने पारंपरिक बिटुमिन की जगह ले सकता है या उसके साथ मिलाया जा सकता है। कच्चा माल मुख्यतः धान की पराली और दूसरा कृषि अवशेष है।
डॉ. भास्कर ने जो बात जोड़ी, वह इस काम को प्रयोगशाला से बाहर ले जाती है। उनका कहना था कि प्रयोगशाला में शोध कर लेना अपेक्षाकृत आसान है; असली चुनौती ऐसे उत्पाद खोजने की है जिनकी बाज़ार में माँग हो, जो आयात की जगह लें और जो पैसा भी दें। इसलिए पूरी प्रक्रिया को शून्य-अपशिष्ट जैव-रिफ़ाइनरी की तरह बनाया गया है, जिसमें हर धारा किसी काम आए। जो जलीय हिस्सा आम तौर पर फेंक दिया जाता, उससे एक पेटेंटशुदा जैविक कीटनाशक बनाया गया है, और भंडारण तथा ढुलाई आसान करने के लिए उसे पाउडर का रूप भी दे दिया गया है। राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में उसका परीक्षण हो चुका है।
प्रयोगशाला से राजमार्ग तक : काम कहाँ तक पहुँचा है
| मानदंड / विवरण | जानकारी |
|---|---|
| शिलांग के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-40 पर परीक्षण खंड | 100 मीटर |
| उस खंड का दीर्घकालिक मूल्यांकन | पूरा |
| आंध्र प्रदेश सरकार का मूल्यांकन कार्यक्रम | 5 किलोमीटर |
| सीएसआईआर-सीआरआरआई में राष्ट्रीय बायो-बाइंडर परीक्षण प्रयोगशाला | मार्च 2027 तक |
| मानक तय करने का काम किनके साथ | मोर्थ, एनएचएआई, आईआरसी |
स्रोत : पत्र सूचना कार्यालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार, 5 अगस्त 2026 की विज्ञप्ति (Release ID 2294669)।
सड़क पर क्या हुआ
दावे के पीछे एक असली सड़क है। सीएसआईआर-सीआरआरआई ने शिलांग के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-40 पर बने 100 मीटर के बायो-बाइंडर परीक्षण खंड का दीर्घकालिक मूल्यांकन पूरा कर लिया है — और वह इलाक़ा पहाड़ी भी है और बरसात वाला भी, यानी परीक्षा कड़ी थी। इसी के आधार पर आंध्र प्रदेश सरकार ने पाँच किलोमीटर का मूल्यांकन कार्यक्रम शुरू किया है।
इसके आगे का काम काग़ज़ का है, पर उसके बिना कोई अभियंता टेंडर में यह सामग्री लिख ही नहीं सकता। सीएसआईआर-सीआरआरआई सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (मोर्थ), भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और भारतीय सड़क कांग्रेस (आईआरसी) के साथ मिलकर मानक तकनीकी विनिर्देश और अमल के दिशानिर्देश तैयार कर रहा है। मंत्रालय ने सीएसआईआर-सीआरआरआई में एक राष्ट्रीय बायो-बाइंडर परीक्षण प्रयोगशाला को मंज़ूरी दे दी है, जो मार्च 2027 तक चालू होने की उम्मीद है और व्यावसायिक रूप से बने बायो-बाइंडर की जाँच, सत्यापन, प्रमाणन और गुणवत्ता आश्वासन का काम करेगी।
दो बातें जो अभी बाक़ी हैं
डेस्क वही लिखता है जो दस्तावेज़ में है। विज्ञप्ति में 100 मीटर के एक खंड का पूरा हुआ मूल्यांकन दर्ज है और पाँच किलोमीटर का कार्यक्रम शुरू हुआ बताया गया है — राजमार्ग के पैमाने पर पूरे मौसम-चक्र का कोई प्रकाशित टिकाऊपन आँकड़ा साथ नहीं है। और आयातित बिटुमिन के मुक़ाबले प्रति टन क़ीमत भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है। इनसे विज्ञान कमज़ोर नहीं होता; ये बस वे बातें हैं जो अभी सिद्ध होनी हैं।
ब्लिट्ज़ की राय
परीक्षण प्रयोगशाला मार्च 2027 में आएगी, पर मानक उसका इंतज़ार न करें। अगर भारतीय सड़क कांग्रेस एक अंतरिम विनिर्देश जारी कर दे, तो राज्यों के लोक निर्माण विभाग इसी निर्माण मौसम में छोटे ठेकों में बायो-बाइंडर लिख सकते हैं। और चूँकि कच्चा माल पराली ही है, इस काम को पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के फ़सल-अवशेष प्रबंधन कार्यक्रम से जोड़ देना चाहिए — ताकि किसान को दो योजनाएँ नहीं, एक ख़रीदार दिखे।













