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लक्ष्य सौ, असली आँकड़ा चार

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 29, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।देश को 2047 तक सौ गीगावाट परमाणु बिजली चाहिए। आज 8.78 गीगावाट है। इस कार्यक्रम में असली आँकड़ा सौ नहीं है — असली आँकड़ा चार है।

पत्र सूचना कार्यालय की शोध इकाई ने 28 अगस्त 2026 को सुबह 10.29 बजे “भारत में परमाणु ऊर्जा प्रौद्योगिकी” शीर्षक से विवरण जारी किया, जिसकी संख्या 159731 है। इसमें परमाणु ऊर्जा विभाग, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC), न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन (NPCIL), इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) और न्यूक्लियर फ्यूल कॉम्प्लेक्स के आँकड़े एक जगह हैं। यही वजह है कि इस पर हिसाब लगाना बनता है।

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2047 के लक्ष्य का हिसाब

देश में 24 परमाणु रिएक्टर चालू हैं, कुल क्षमता 8.78 गीगावाट। नौ इकाइयाँ निर्माणाधीन हैं, कुल 7.5 गीगावाट। दस स्वदेशी दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR) फ्लीट मोड में मंजूर हो चुके हैं, और दो 500 मेगावाट के फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की पूर्व-परियोजना गतिविधि को मंजूरी मिली है। लक्ष्य है 2047 तक 100 गीगावाट।

ब्लिट्ज़ ने भाग लगाया। लक्ष्य पूरे सौ का है, इसलिए आज की क्षमता ठीक 8.78 प्रतिशत बैठती है। निर्माणाधीन नौ इकाइयाँ भी चालू हो जाएँ तो 16.28 गीगावाट, यानी 16.28 प्रतिशत। बाकी 83.72 गीगावाट इक्कीस साल में जोड़ने होंगे — हर साल 3.99 गीगावाट। आज जो पूरा बेड़ा खड़ा है, उसका 45.4 प्रतिशत हर साल जोड़ना पड़ेगा, इक्कीस साल तक। सौ सुर्खी है। चार काम है।

इकाइयाँ बड़ी हो रही हैं

दूसरा भाग और साफ बात कहता है। 24 रिएक्टर, 8.78 गीगावाट — औसत 366 मेगावाट प्रति इकाई। निर्माणाधीन नौ इकाइयाँ, 7.5 गीगावाट — औसत 833 मेगावाट। यानी जो रिएक्टर बन रहे हैं वे, औसतन, चालू रिएक्टरों से दोगुने से बड़े हैं। यह सिर्फ बिजली का नहीं, कारखाने का सवाल है — फोर्जिंग, दाब पात्र, भाप जनित्र और भारी परिवहन, सब इसी अनुपात में बड़े होंगे।

यह तीन चरणों वाला कार्यक्रम डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने 1954 में रखा था। पहले चरण में PHWR प्राकृतिक यूरेनियम जलाते हैं और खर्च हुए ईंधन से प्लूटोनियम निकाला जाता है। दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर उसी प्लूटोनियम से बिजली बनाते हैं और साथ-साथ और ईंधन भी बनाते हैं, तथा थोरियम से यूरेनियम-233 पैदा करते हैं। तीसरे चरण में थोरियम रिएक्टर उसी यूरेनियम-233 पर चलेंगे। भारत का अपना यूरेनियम कम गुणवत्ता का है और आयात से पूरा करना पड़ता है; थोरियम भरपूर है, जो केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड की तटीय रेत में मिलता है।

दूसरा चरण अप्रैल 2026 में शुरू हुआ, जब कलपक्कम के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने पहली बार क्रांतिकता (first criticality) हासिल की। इसकी डिजाइन, विकास, परीक्षण, सुरक्षा आकलन, कमीशनिंग और स्वदेशीकरण का काम IGCAR ने किया, और भारतीय उद्योग के साथ मिलकर रिएक्टर के उपकरणों और प्रणालियों का लगभग 90 प्रतिशत देश में ही बनाया।

मानदंड / विवरण जानकारी
चालू रिएक्टर 24
कुल स्थापित क्षमता 8.78 गीगावाट
निर्माणाधीन 9 इकाइयाँ, 7.5 गीगावाट
चालू बेड़े का औसत आकार 366 मेगावाट
निर्माणाधीन इकाइयों का औसत 833 मेगावाट
फ्लीट मोड में मंजूर 10 स्वदेशी PHWR
दूसरा चरण शुरू PFBR कलपक्कम, अप्रैल 2026
PFBR में स्वदेशी अंश लगभग 90 प्रतिशत
छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर के लिए 20,000 करोड़ रुपये, बजट 2025-26
2033 तक चालू करने का लक्ष्य कम से कम पाँच SMR
2047 का लक्ष्य 100 गीगावाट
इससे निकली रफ्तार हर साल 3.99 गीगावाट
बीस हजार करोड़ और छोटे रिएक्टर

केंद्रीय बजट 2025-26 में परमाणु ऊर्जा मिशन की घोषणा हुई और स्वदेशी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के अनुसंधान, डिजाइन, विकास और तैनाती के लिए 20,000 करोड़ रुपये रखे गए। तीन डिजाइन नाम से बताए गए हैं — भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (BSMR-200), जिसकी क्षमता 220 मेगावाट है और जिसे BARC तथा NPCIL ने मिलकर डिजाइन किया; 55 मेगावाट का SMR-55; और हाइड्रोजन बनाने के लिए एक उच्च तापमान गैस-शीतित रिएक्टर। सरकार का कहना है कि 2033 तक कम से कम पाँच स्वदेशी SMR चालू होंगे। शांति अधिनियम, 2025 वह कानून है जो निजी क्षेत्र की बड़ी भागीदारी का रास्ता खोलता है।

छोटे रिएक्टर की खूबी यह नहीं कि बिजली सस्ती पड़ेगी। खूबी यह है कि वह बनाया नहीं, ढाला जाता है। 220 मेगावाट का हिस्सा कारखाने में बनकर मौके पर जुड़ जाए तो सिविल इंजीनियरिंग की समस्या उत्पादन लाइन की समस्या बन जाती है — और यह वह समस्या है जिसे भारतीय उद्योग बार-बार हल कर चुका है। ऐसा रिएक्टर वहाँ भी बैठ जाता है जहाँ 700 मेगावाट की इकाई नहीं बैठती — बंद होते कोयला संयंत्र के पास, औद्योगिक क्षेत्र के पास, या ऐसे ग्रिड के छोर पर जो बड़ा भार नहीं ले सकता।

जो इस दस्तावेज़ में नहीं है

दो बातें विवरण में नहीं हैं और यह डेस्क उन्हें कहीं और से नहीं लेगा। निर्माणाधीन नौ इकाइयों का साल-दर-साल कमीशनिंग कार्यक्रम इसमें नहीं है, और BSMR-200 डिजाइन की पेटेंट या लाइसेंस स्थिति भी नहीं है। दोनों जानी जा सकती हैं; इस दस्तावेज़ में नहीं छपीं, इसलिए यहाँ भी कोई दावा नहीं किया गया।

सुधार का सुझाव छोटा है और हिसाब से ही निकलता है। 2047 का फैसला 100 से नहीं, 3.99 से होगा। अगर परमाणु ऊर्जा विभाग और NPCIL एक ही चलती-फिरती सूची छाप दें — इकाई, स्थान, क्षमता, क्रांतिकता का अनुमानित वर्ष, व्यावसायिक संचालन का अनुमानित वर्ष, और हर साल संशोधित — तो देश लक्ष्य नहीं, रफ्तार देख सकेगा, और जिस उद्योग को ये इकाइयाँ बनानी हैं वह उसी हिसाब से तैयारी कर सकेगा। PFBR में 90 प्रतिशत स्वदेशी निर्माण साबित करता है कि क्षमता मौजूद है। कमी सिर्फ उस कैलेंडर की है जिस पर आपूर्तिकर्ता भरोसा कर सके।

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