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दस करोड़ किसान आईडी, अब आगे क्या

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 12, 2026
in the blitz, कृषि
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।सरकार ने मंगलवार को संसद में बताया कि देश में अब तक 10.33 करोड़ से ज़्यादा किसान आईडी बन चुकी हैं। आँकड़ा बड़ा है। पर असली सवाल यह है — इस नंबर से किसान को मिलता क्या है? सीधी बात यह है कि अब हर योजना के लिए बार-बार यह साबित नहीं करना पड़ेगा कि ज़मीन किसकी है और जोतता कौन है।

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने एक लिखित जवाब में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसान अपना आईडी ख़ुद अपने मोबाइल फ़ोन से बनवा सकते हैं। यह काम डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत हो रहा है। दरअसल किसान आईडी एक ऐसा नंबर है जो किसान की पहचान को उसकी ज़मीन के रिकॉर्ड से जोड़ देता है। एक बार यह जुड़ाव बन जाए, तो जिस भी योजना को यह जानना है कि कौन-सा खेत किसका है, वह रिकॉर्ड ख़ुद पढ़ लेगी — दोबारा काग़ज़ नहीं मांगेगी।

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एक बार दर्ज, बार-बार काम: इस नंबर की ताक़त कार्ड में नहीं है। ताक़त इसमें है कि अगली योजना दोबारा नहीं पूछेगी।

ब्लॉक ऑफ़िस की लाइन कभी पैसे के लिए नहीं लगती थी। वह हर बार यही साबित करने के लिए लगती थी कि ज़मीन और किसान एक-दूसरे के हैं।

एक नज़र में

• अब तक बनीं किसान आईडी: 10.33 करोड़ से ज़्यादा
• कब बताया गया: 11 अगस्त 2026 को संसद में
• किसने बताया: राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर, लिखित जवाब में
• कैसे बनवाएँ: किसान ख़ुद मोबाइल फ़ोन से रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं
• किस मिशन के तहत: डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन
• किन योजनाओं से जुड़ता है: पीएम किसान सम्मान निधि
• साथ ही: प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना
• साथ ही: एमएसपी पर सरकारी ख़रीद
• साथ ही: कर्ज़ और आपदा राहत

फ़र्क़ सबसे ज़्यादा तब दिखता है जब हालात सबसे ख़राब हों — और यही इसका मक़सद भी है। मान लीजिए फ़सल ख़राब हो गई। फ़सल बीमा का दावा करने के लिए यह साबित करना पड़ता है कि खेत कौन-सा था और जोत किसकी थी। पहले यह काग़ज़ नुक़सान के बाद जुटाना पड़ता था — ठीक उस वक़्त जब किसान के पास न पैसा होता है, न आने-जाने की ताक़त, और तहसील दफ़्तर में सबसे ज़्यादा भीड़ होती है। रिकॉर्ड पहले से दर्ज हो, तो यह काम जुटाने का नहीं, बस देख लेने का रह जाता है। यही बात मंडी पर लागू होती है। जिस मंडी को जोत का सत्यापित रिकॉर्ड दिख जाए, वह किसान का रजिस्ट्रेशन तेज़ी से कर देती है — और किराए की ट्रॉली लेकर खड़े किसान के लिए यह तेज़ी सीधे पैसे की बचत है।

अब आगे की बात। देश में करीब 14 करोड़ कृषि जोतें हैं। यानी 10.33 करोड़ आईडी का मतलब है कि पहुँच बड़ी है, पर रास्ता अभी बाक़ी है। और जो सबसे पीछे छूटते हैं वे आम तौर पर बटाईदार, ठेके पर खेती करने वाले और वे महिला किसान होती हैं जिनका नाम ज़मीन के काग़ज़ पर होता ही नहीं। यह अड़चन हल हो सकती है और उस पर काम भी चल रहा है — राज्यों में भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण, पंचायत स्तर पर कैंप, और फ़ोन से ख़ुद रजिस्ट्रेशन की सुविधा, जिसने पुरानी व्यवस्था का सबसे बड़ा ख़र्च ही ख़त्म कर दिया — दफ़्तर तक जाने में गई एक दिन की मज़दूरी। बड़ी बात यह है कि यह काम अगले सीज़न से पहले हो जाना चाहिए। अगर घर में खेती है तो इस हफ़्ते बस इतना देख लीजिए कि किसान आईडी बनी है या नहीं। नहीं बनी है, तो खेत में खड़े-खड़े फ़ोन से बन जाएगी।

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