ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने 10 और 20 रुपये के प्लास्टिक नोटों के ट्रायल को मंजूरी दे दी है। ऐसे में यह जानना बनता है कि प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट कैसे तैयार होते हैं? इन्हें बनाने में किस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है?
दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले बैंक नोट बड़े तकनीकी बदलाव से गुजर रहे हैं। दरअसल पारंपरिक कॉटन-फाइबर यानी कि कागजी नोटों की जगह पॉलिमर यानी प्लास्टिक के नोट ले रहे हैं। कई देश इनका इस्तेमाल लंबे समय से कर रहे हैं और कुछ ने हाल ही में इनका रुख किया है।
गौरतलब है कि ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान अपने अध्ययन में बता चुका है कि पॉलिमर नोट न सिर्फ टिकाऊ होते हैं बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा ईको फ्रेंडली होते हैं।
प्लास्टिक के नोटों का आविष्कार डेविड सोलोमन ने किया था। इस प्रोजेक्ट को 1988 में ऑस्ट्रेलिया के रिजर्व बैंक के अनुरोध पर शुरू किया गया था, जो कि लगभग 20 साल तक चला।
1988 में ऑस्ट्रेलिया ने अपना पहला 10 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का नोट जारी किया था। इसके बाद 1996 तक ऑस्ट्रेलिया पूरी करेंसी को पॉलिमर नोटों में बदलने वाला पहला देश बन गया था। प्लास्टिक के नोटों का बेस बीओपीपी नाम की एक ट्रांसपेरेंट प्लास्टिक मटेरियल होता है। इसमें कोई रेशा या छेद नहीं होता। इसकी वजह से यह पानी, गंदगी या पसीना आदि नहीं सोखता। इसके एक हिस्से को ट्रांसपेरेंट छोड़ा जाता है। जिसकी वजह से इन्हें स्कैनर या प्रिंटर द्वारा कॉपी करना असंभव हो जाता है। इनमें खास तौर पर डिफ्रेक्शन ग्रेटिंग और ऑप्टिकली वेरिएबल डिवाइसेज का इस्तेमाल होता है, जिससे अलग-अलग एंगल पर इनमें अलग रंग और पैटर्न देखने को मिलते हैं।














