ब्लिट्ज ब्यूरो
रेवाड़ी। कपास उत्पादन में दक्षिणी हरियाणा के अव्वल रहने वाले महेंद्रगढ़, रेवाड़ी और चरखी दादरी जिलों में कपास की खेती लगातार घट रही है। सात वर्षों में महेंद्रगढ़ में कपास का रकबा 5.30 हजार हेक्टेयर कम हुआ है तो रेवाड़ी में करीब 70 फीसदी खेती घट गई है। चरखी दादरी में 10 सालों में छह हजार हेक्टेयर रकबा घटा है। अब चरखी दादरी में कपास का रकबा 17 हजार हेक्टेयर पर पहुंच गया है।
मौसम की अनिश्चितता और कीटों के प्रकोप व अधिक लागत के कारण अब किसान अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। कपास कभी इन तीनों जिलों की प्रमुख नकदी फसल मानी जाती थी। अब उत्पादन में उतार-चढ़ाव और बढ़ती लागत ने किसानों को निराश किया है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, वर्षा की अनिश्चितता और लंबे सूखे तो कभी अत्यधिक बारिश की स्थिति ने कपास की फसल को नुकसान पहुंचाया है।
गुलाबी सुंडी जैसे कीटों का प्रकोप भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। सिंचाई, कीट प्रबंधन, बिजाई व कीटनाशकों की बढ़ती लागत और बाजार में कीमतों की अनिश्चितता भी किसानों के लिए चिंता का विषय है। इन कारणों से किसान अब बाजरा, मूंग और ग्वार जैसी कम जोखिम वाली फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।














