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सभी शादीशुदा बेटियां दया के आधार पर नौकरी देने की नीति में शामिल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बिहार सरकार की शर्त असंवैधानिक

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 10, 2026
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सुप्रीम कोर्ट

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सहानुभूति के आधार पर नियुक्ति को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई विवाहित बेटियों को नौकरी के लिए पात्र मानना गलत है। अन्य विवाहित बेटियों को इससे बाहर रखना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की नीति की संबंधित शर्त को असंवैधानिक करार दिया।

‘बेटी और बेटे में कोई भेद नहीं किया जा सकता’
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह पहले भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि बेटे और बेटी के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव संविधान के विपरीत है। अदालत ने कहा कि करुणामूलक नियुक्ति के लिए केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता बेटियों को पात्र मानना और अन्य विवाहित बेटियों को बाहर रखना कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।

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‘शादी के बाद बेटी का मायके से रिश्ता खत्म नहीं होता’
राज्य सरकार की इस दलील को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया कि विवाह के बाद बेटी सामान्यतः अपने ससुराल चली जाती है। अदालत ने कहा कि कानून में ऐसा कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि शादी के बाद बेटी का अपने मायके या माता-पिता से संबंध पूरी तरह समाप्त हो जाता है। इसलिए केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर उसे करुणामूलक नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

पिता की मौत के बाद नौकरी का दावा हुआ था खारिज
यह मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा था, जिसके पिता बिहार सरकार में कर्मचारी थे। पिता के निधन के बाद महिला ने करुणामूलक नियुक्ति की मांग की थी, लेकिन अधिकारियों ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि वह न तो तलाकशुदा है और न ही परित्यक्ता। इसके अलावा महिला के चाचा की ओर से कथित आपत्ति का भी हवाला दिया गया था। बाद में चाचा ने अनापत्ति प्रमाणपत्र दे दिया था।

तकनीकी आधार पर दावा ठुकराना गलत
महिला की ओर से अदालत को बताया गया कि भले ही उसका तलाक कानूनी रूप से अंतिम रूप नहीं ले पाया हो, लेकिन वह अपने मायके में रह रही है और उसकी मां व भाई उसका सहारा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह का अत्यधिक तकनीकी (हाइपर टेक्निकल) दृष्टिकोण अपनाकर किसी पात्र व्यक्ति के दावे पर विचार करने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि चाचा की आपत्ति का मुद्दा अब समाप्त हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले और राज्य सरकार द्वारा महिला का आवेदन खारिज करने के आदेश को रद कर दिया। साथ ही बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह महिला के करुणामूलक नियुक्ति के दावे पर सभी तथ्यों और योग्यता के आधार पर आठ सप्ताह के भीतर निर्णय लेकर उचित कार्रवाई करे।

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