ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।छोटे किसान के लिए मशीन की समस्या क़ीमत नहीं होती — इस्तेमाल का समय होता है। एक ड्रोन साल में कुछ दिन चलता है, और उन कुछ दिनों के लिए कोई अकेला किसान उसे नहीं ख़रीद सकता। बिहार सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026–27 के लिए कृषि यंत्रीकरण की 236.58 करोड़ रुपये की योजना तैयार की है, जिसके तहत 480 किसान ड्रोन कस्टम हायरिंग सेंटर, 267 कस्टम हायरिंग सेंटर, 38 कृषि यंत्र बैंक और पराली प्रबंधन के लिए 200 विशेष कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए जाएँगे।
अनुदान का ढाँचा बताता है कि योजना किसके लिए बनी है। 38 नए कृषि यंत्र बैंकों के लिए पात्र समूहों को लागत का 80 फ़ीसदी अनुदान मिलेगा, अधिकतम 8 लाख रुपये तक। यानी आठ लाख की मशीन पर समूह को अपनी जेब से क़रीब दो लाख लगाने होंगे। यह रक़म एक अकेले छोटे किसान के लिए बहुत है, पर आठ-दस किसानों के समूह के लिए संभव है। बड़ी बात यह है कि इसके बाद वही मशीन गाँव के बाक़ी किसानों को किराये पर मिलती है — और यहीं से एक मशीन दस खेतों तक पहुँचती है, एक खेत तक नहीं।
मालिकाना नहीं, पहुँच: 480 केंद्र ड्रोन किराये पर देने के लिए हैं — छोटे खेत वाले किसान तक तकनीक इसी रास्ते पहुँचती है।
सवाल यह नहीं है कि किसान के पास मशीन है या नहीं। सवाल यह है कि जिस दिन ज़रूरत पड़े, उस दिन मशीन मिल जाती है या नहीं।
एक नज़र में
• योजना: वित्तीय वर्ष 2026–27, केंद्र प्रायोजित एसएमएएम के तहत, चौथे कृषि रोड मैप में
• कुल प्रस्तावित रक़म: 236.58 करोड़ रुपये (क्रियान्वयन व प्रशासनिक ख़र्च सहित)
• ड्रोन: 480 किसान ड्रोन कस्टम हायरिंग सेंटर — कृषि स्नातकों को लागत का 50% (अधिकतम 5 लाख), अन्य को 40% (अधिकतम 4 लाख)
• कस्टम हायरिंग सेंटर: 267 — प्रति केंद्र लागत 10 लाख तक, अनुदान 40% (अधिकतम 4 लाख)
• कृषि यंत्र बैंक: 38 — पात्र समूहों को लागत का 80% अनुदान, अधिकतम 8 लाख रुपये
• विशेष कस्टम हायरिंग सेंटर: 200, पराली प्रबंधन के लिए — लागत 20 लाख तक, अनुदान 40–80% (अधिकतम 12 लाख)
• व्यक्तिगत किसानों को: 86 प्रकार के कृषि यंत्रों पर 40 से 80% तक अनुदान
• किसे फ़ायदा: मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसान, जो मशीन ख़रीद नहीं सकते
• आवेदन: राज्य कृषि विभाग के पोर्टल और प्रखंड कृषि कार्यालय के ज़रिये
ड्रोन का सबसे व्यावहारिक इस्तेमाल छिड़काव है, और इसका फ़ायदा सिर्फ़ समय बचाने का नहीं है। हाथ से या पीठ पर टंकी लादकर छिड़काव करने में दवा ज़्यादा लगती है, समान रूप से नहीं पड़ती, और किसान ख़ुद रसायन के सीधे संपर्क में आता है। ड्रोन से छिड़काव में दवा और पानी दोनों कम लगते हैं और सेहत का जोखिम काफ़ी घट जाता है। इसके अलावा जब खेत में पानी भरा हो — जैसा इन दिनों कई ज़िलों में है — तब मशीन खेत में उतारना मुश्किल होता है, पर ड्रोन ऊपर से काम कर लेता है। बारिश वाले इस हफ़्ते में यह अंतर मामूली नहीं है।
आगे का रास्ता तीन चीज़ों पर टिका है, और तीनों पर काम हो सकता है। पहली, चलाने वाला — ड्रोन उड़ाने के लिए प्रशिक्षित पायलट चाहिए, और गाँव के पढ़े-लिखे नौजवानों के लिए यह अपने आप में एक रोज़गार है; समूह जब मशीन लेता है तो साथ में एक स्थानीय नौजवान को प्रशिक्षण दिलाना सबसे समझदारी का क़दम होता है। दूसरी, मरम्मत — मशीन खड़ी हो जाए और ठीक कराने की जगह ज़िले से बाहर हो, तो पूरा निवेश बेकार हो जाता है; प्रखंड स्तर पर सर्विस की व्यवस्था योजना की सफलता तय करेगी। तीसरी, किराया दर का पारदर्शी होना, ताकि सेंटर चलाने वाला समूह भी टिका रहे और किसान को भी सस्ता पड़े। जिन राज्यों में ये तीनों बातें ठीक बैठी हैं, वहाँ कस्टम हायरिंग का मॉडल चला है। बिहार के पास अब पैसा और ढाँचा दोनों हैं — बाक़ी काम ज़मीन पर होना है।














