ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।ग्लासगो के एसईसी सेंटर में शनिवार को दस भारतीय मुक्केबाज़ रिंग में उतरे। सबका चाँदी का पदक पहले से पक्का था; तय सिर्फ़ यह होना था कि वह सोने में बदलेगा या नहीं। पहले दो मुक़ाबले सोने में बदले। प्रीति पवार ने महिलाओं के 54 किलोग्राम वर्ग के फ़ाइनल में कनाडा की स्कारलेट डेलगाडो को 5–0 से हराकर इन खेलों में भारत का मुक्केबाज़ी में पहला और कुल छठा स्वर्ण जीता। इसके बाद जैस्मीन लंबोरिया ने 57 किलोग्राम वर्ग में सर्वसम्मत फ़ैसले से जीत दर्ज कर भारत को सातवाँ स्वर्ण दिलाया।
प्रीति की जीत एकतरफ़ा रही — पाँचों जजों ने तीनों राउंड उन्हीं के नाम किए। जैस्मीन अपने भार वर्ग की मौजूदा विश्व चैंपियन हैं और उन्होंने उसी नियंत्रण के साथ मुक़ाबला लड़ा। इस दिन भारत के नौ भार वर्गों में कुल दस फ़ाइनलिस्ट थे — छह महिलाएँ और चार पुरुष। इनमें लवलीना बोरगोहेन (75 किग्रा), साक्षी चौधरी (51 किग्रा), प्रिया घनघस (60 किग्रा), अरुंधति चौधरी (70 किग्रा) और पुरुषों में जादुमणि सिंह मंडेंगबम (55 किग्रा), सचिन सिवाच (60 किग्रा), अंकुश पंघाल (80 किग्रा) व नरेंद्र बेरवाल (+90 किग्रा) शामिल रहे। भारत के पदकों की संख्या 25 के पार पहुँच गई और खेल रविवार को ख़त्म हो रहे हैं।
दोनों बार सर्वसम्मत फ़ैसला: प्रीति पवार और जैस्मीन लंबोरिया — दोनों की 5–0 जीत से भारत के रिकॉर्ड फ़ाइनल दिन की शुरुआत हुई।
घंटी बजने से पहले पक्का हो चुका चाँदी का पदक अच्छा आँकड़ा है। उसे सोने में बदलना अलग हुनर है — और पहली दो मुक्केबाज़ों ने वही दिखाया।
एक नज़र में
• प्रीति पवार: स्वर्ण, महिला 54 किग्रा — स्कारलेट डेलगाडो (कनाडा) को 5–0 से हराया
• जैस्मीन लंबोरिया: स्वर्ण, महिला 57 किग्रा — सर्वसम्मत फ़ैसले से जीत
• पहला: इन खेलों में भारत का मुक्केबाज़ी में पहला स्वर्ण; कुल छठा और सातवाँ
• फ़ाइनलिस्ट: नौ भार वर्गों में दस भारतीय — छह महिलाएँ, चार पुरुष
• अन्य फ़ाइनल: लवलीना बोरगोहेन, साक्षी चौधरी, प्रिया घनघस, अरुंधति चौधरी, जादुमणि सिंह मंडेंगबम, सचिन सिवाच, अंकुश पंघाल, नरेंद्र बेरवाल
• भारत के पदक: 25 से ज़्यादा; खेल रविवार को समाप्त
असली उपलब्धि गहराई की है। राष्ट्रमंडल खेलों का फ़ाइनल तक पहुँचने के लिए एक हफ़्ते में ड्रॉ, क्वार्टर फ़ाइनल और सेमीफ़ाइनल — तीनों पार करने पड़ते हैं, और भारत ने एक ही दल में यह दस बार कर दिखाया। यह एक-दो असाधारण मुक्केबाज़ों वाले देश की तस्वीर नहीं है। यह उस देश की तस्वीर है जहाँ घरेलू प्रतियोगिताओं की सीढ़ी है, कोचिंग का ढाँचा है और विदेशी मुक़ाबलों का अनुभव इतना है कि टीम का दसवाँ सबसे अच्छा मुक्केबाज़ भी स्वर्ण पदक के मुक़ाबले तक पहुँच जाता है। दस में से छह महिलाएँ हैं — और यह पिछले एक दशक से चली आ रही उसी कहानी की अगली कड़ी है, जिसमें भारत की महिला मुक्केबाज़ी सबसे भरोसेमंद ओलंपिक-खेल पाइपलाइन साबित हुई है।
असली काम समापन समारोह के बाद शुरू होता है। इस तरह का प्रदर्शन एक तरीक़े का सबूत है, और सबूत तभी काम आता है जब उसे लिखकर रखा जाए। मुक्केबाज़ी महासंघ ने जो किया — जूनियर प्रतियोगिताओं से सीनियर चयन तक का रास्ता, विदेश में अभ्यास की योजना, कोच और सहयोगी स्टाफ़ को टिकाए रखना — उसे ठीक से दर्ज किया जाना चाहिए और अगले खेलों से पहले दो-तीन दूसरे खेलों में आज़माया जाना चाहिए। मौक़ा भी ठीक है: इसी हफ़्ते मंज़ूर हुआ खेलो इंडिया का नया ढाँचा वही ज़रिया है जिससे ऐसी व्यवस्था को पैसा और पैमाना दोनों मिल सकते हैं। ग्लासगो ने सबूत दे दिया है कि यह तरीक़ा काम करता है। अब इसे एक अच्छे हफ़्ते की तरह नहीं, एक नमूने की तरह लेना है।














