ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।पानी भारत का इकलौता ऐसा संसाधन है जिसकी कमी अनुमान नहीं, हिसाब है। इसका ढाँचागत जवाब देश ने दो दशक में बना लिया है — अधूरा काम अब निर्माण का नहीं रह गया। जल शक्ति मंत्रालय के आकलन के मुताबिक़ भारत का सालाना भूजल पुनर्भरण 2017 के 432 अरब घन मीटर से बढ़कर 2025 में 448.52 अरब घन मीटर हो गया। 2025 के मानसून के बाद देश के 73% निगरानी वाले कुओं में जलस्तर ऊपर आया, और यह पिछले दस साल के औसत से भी बेहतर रहा।
इसके पीछे का निर्माण-रिकॉर्ड वाक़ई बड़ा है। 2024 में शुरू हुई ‘जल संचय जन भागीदारी’ पहल के तहत हर ज़िले में 10,000 कृत्रिम पुनर्भरण ढाँचे बनाने का लक्ष्य रखा गया था; नवंबर 2025 तक देश भर में लगभग 2.76 करोड़ जल संरक्षण और पुनर्भरण ढाँचे बन चुके थे। ऐसे संसाधन के लिए इस पैमाने पर काम बहुत कम देशों ने किया है, जिसकी कोई बाज़ार क़ीमत तय ही नहीं होती — और यही वजह है कि बढ़ती निकासी के बावजूद कुल पुनर्भरण का आँकड़ा ऊपर गया है।
पुरानी तकनीक, नया पैमाना: नवंबर 2025 तक देश में क़रीब 2.76 करोड़ जल संरक्षण ढाँचे बन चुके थे और सालाना पुनर्भरण 448.52 अरब घन मीटर तक पहुँचा।
पानी का राष्ट्रीय औसत आँकड़ेबाज़ के काम आता है, संगरूर के किसान के नहीं। पानी ब्लॉक-दर-ब्लॉक तय होता है, और उसका हल भी।
एक नज़र में
• सालाना भूजल पुनर्भरण: 2025 में 448.52 अरब घन मीटर, 2017 में 432 अरब घन मीटर
• 2025 के मानसून के बाद: 73% निगरानी वाले कुओं में जलस्तर बढ़ा
• दशक से तुलना: राष्ट्रीय स्तर पिछले दस साल के औसत से ऊपर
• बने ढाँचे: नवंबर 2025 तक लगभग 2.76 करोड़
• लक्ष्य: ‘जल संचय जन भागीदारी’ (2024) के तहत हर ज़िले में 10,000 कृत्रिम पुनर्भरण ढाँचे
• जहाँ जलस्तर अब भी गिर रहा है: पंजाब और हरियाणा के खेती-प्रधान इलाक़े, पहाड़ी ज़िले, तेज़ी से फैलते शहरी इलाक़े
• अभी क्यों अहम: मौसम विभाग ने अगस्त-सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान दिया है
लेकिन राष्ट्रीय औसत असली दिक़्क़त को ढँक देता है। जलस्तर ठीक उन्हीं जगहों पर गिर रहा है जो इसे सबसे कम झेल सकती हैं — पंजाब और हरियाणा की खेती-प्रधान पट्टी, वे पहाड़ी ज़िले जहाँ की ज़मीन पानी सोखने के लायक़ नहीं, और शहरों के किनारे के वे ब्लॉक जहाँ कंक्रीट किसी भी पुनर्भरण ढाँचे से तेज़ फैल रहा है। भूजल एक स्थानीय संसाधन है, जिसे राष्ट्रीय आँकड़े से नापा जाता है — और यह पूरी तरह मुमकिन है कि देश का कुल पुनर्भरण बढ़ता रहे और किसी एक ज़िले के नीचे का जलभृत ख़ाली हो जाए। यह योजना की नाकामी नहीं, अकेले निर्माण की सीमा है — और इसे पहचान लेना ही अगले चरण को डिज़ाइन करने की शुरुआत है।
अब अगले दस लाख ढाँचों से ज़्यादा तीन चीज़ें मायने रखती हैं। पहली, रखरखाव और मापन: चौथे मानसून में गाद से भरा तालाब कुछ भी रिचार्ज नहीं करता, और देश को अभी यह ज़्यादा पता है कि कितने ढाँचे बने, बनिस्बत इसके कि कितने चल रहे हैं। इसीलिए राष्ट्रीय जल डेटा ढाँचे की तरफ़ बढ़ना, चाहे जितना नीरस लगे, सबसे ज़्यादा फ़ायदा देने वाला सुधार है। दूसरी, फ़सल का चुनाव — और यही सबसे मुश्किल है। कम बारिश वाले राज्य में धान उगाना असल में पानी को एक जगह से दूसरी जगह भेजना है, और कितना भी रिचार्ज उसकी भरपाई नहीं करता। रास्ता रोक लगाने का नहीं, विकल्प को फ़ायदेमंद बनाने का है — जिन ज़िलों में जलस्तर गिर रहा है, वहाँ मोटे अनाज, मक्का और दलहन के लिए पक्की ख़रीद, तय बाज़ार और न्यूनतम समर्थन मूल्य का सहारा, ताकि फ़सल बदलने का पूरा जोखिम अकेले किसान पर न पड़े। और तीसरी, खेती की बिजली की माप और क़ीमत इस तरह तय हो कि किसान की आमदनी बनी रहे, पर बिना हिसाब पंप चलाने की मजबूरी ख़त्म हो — कई राज्य दिखा चुके हैं कि यह दर बढ़ाए बिना, सीधे लाभ हस्तांतरण के ज़रिए हो सकता है। जल सुरक्षा की जो भौतिक बुनियाद भारत ने रखी है, वैसी किसी और देश ने कोशिश नहीं की। अगला दशक उसे चलाने, ईमानदारी से नापने और उन प्रोत्साहनों को ठीक करने का है जो चुपचाप उसी पानी को बहा ले जाते हैं।














