ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सरकार के पहले तीन महीने के हिसाब-किताब शुक्रवार को आए। इनमें बड़ी संख्या से ज़्यादा अहम यह है कि पैसा गया कहाँ। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल–जून 2026 में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा क़रीब 3.1 लाख करोड़ रुपये रहा। यह पूरे साल के बजट अनुमान का 18.2% है। महालेखा नियंत्रक (सीजीए) के जारी आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल इसी तिमाही में यह आँकड़ा 2.8 लाख करोड़ रुपये था।
तिमाही में सरकार का कुल खर्च 13.6 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल 12.2 लाख करोड़ था। लेकिन असली फ़र्क़ पूँजीगत खर्च में दिखा — यानी वह पैसा जो सड़क, पुल, रेल, बिजली लाइन जैसी चीज़ें बनाने में लगता है। यह 2.75 लाख करोड़ से बढ़कर 3.4 लाख करोड़ रुपये हो गया, यानी क़रीब 24% ज़्यादा। पूरे साल के लिए सरकार ने 16.96 लाख करोड़ रुपये का घाटा तय किया है, जो सकल घरेलू उत्पाद का 4.3% बैठता है।
बारिश से पहले काम निपटाने की कोशिश: जून तिमाही में 3.4 लाख करोड़ रुपये का पूँजीगत खर्च कुल खर्च का लगभग एक चौथाई रहा।
सड़क बनाने पर हुआ घाटा और ब्याज चुकाने पर हुआ घाटा — दोनों दिखने में एक जैसे हैं, असर में बिल्कुल अलग।
एक नज़र में
• पहली तिमाही का राजकोषीय घाटा: क़रीब 3.1 लाख करोड़ रुपये
• साल के लक्ष्य का हिस्सा: 18.2%
• पिछले साल इसी तिमाही में: 2.8 लाख करोड़ रुपये
• कुल खर्च: 13.6 लाख करोड़ रुपये (पिछले साल 12.2 लाख करोड़)
• पूँजीगत खर्च: 3.4 लाख करोड़ रुपये (पिछले साल 2.75 लाख करोड़) — क़रीब 24% ज़्यादा
• पूरे साल का तय घाटा: 16.96 लाख करोड़ रुपये
• जीडीपी का हिस्सा: 4.3%
• आँकड़े: महालेखा नियंत्रक, 31 जुलाई 2026
पहली तिमाही में साल का 18.2% घाटा होना चिंता की बात नहीं है, बल्कि यह सरकार के अपने तरीक़े के मुताबिक़ है। बारिश शुरू होने से पहले निर्माण का काम तेज़ रखा जाता है, इसलिए खर्च साल की शुरुआत में ज़्यादा होता है और बाद में धीमा पड़ता है। तुलना 25% के सीधे हिसाब से नहीं, बल्कि पिछले सालों के ढर्रे से करनी चाहिए — और उस पैमाने पर साल ठीक चल रहा है। एक और बात ग़ौर करने लायक़ है: खर्च 1.4 लाख करोड़ बढ़ा, लेकिन घाटा सिर्फ़ 0.3 लाख करोड़। इसका मतलब है कि सरकार की कमाई भी उसी रफ़्तार से बढ़ी है।
अब आगे का सवाल दो चीज़ों पर टिका है। पहली, अर्थव्यवस्था की रफ़्तार। 4.3% का लक्ष्य एक अनुपात है, और अगर जीडीपी उम्मीद से धीमी बढ़े तो बिना एक रुपया ज़्यादा खर्च किए भी यह अनुपात बिगड़ जाता है। रिज़र्व बैंक ने जून में चालू वित्त वर्ष के लिए विकास दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% किया है, इसलिए यह आँकड़ा साल भर देखने लायक़ रहेगा। दूसरी, राज्यों का प्रदर्शन। सभी राज्यों का पूँजीगत बजट मिलाकर केंद्र से बड़ा है, लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत असमान है। भारत की सरकारी वित्त व्यवस्था में सबसे ज़्यादा फ़ायदा देने वाला सुधार कोई नई योजना नहीं, बल्कि राज्यों तक पैसा समय पर और तय तारीख़ पर पहुँचाना है — क्योंकि बजट में रखा बहुत सारा पैसा नीति की वजह से नहीं, कैलेंडर की वजह से बिना ख़र्च हुए रह जाता है।














