• Latest
  • Trending
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम

भारत अब अपनी हवा लगभग हर जगह नाप सकता है — अगला दशक इस पर काम करने का है कि मीटर क्या कह रहे हैं

July 31, 2026
Raj-Mandir

पाँच हफ़्ते, सोलह फ़िल्में: जुलाई ने परखा कि भारतीय पर्दे एक साथ कितना बोझ उठा सकते हैं

July 31, 2026
दूर होगा डेंगू का डर, पहली वैक्सीन को दवा नियामक से मिली मंजूरी

डेंगू के टीके को मंज़ूरी, और चुपचाप बदलता देश का प्रयोगशाला नेटवर्क

July 31, 2026
export

निर्यात रिकॉर्ड पर, घाटा भी पाँच महीने के शिखर पर — और दोनों की वजह एक ही आँकड़े में है

July 31, 2026
भारत के एक विश्वविद्यालय पुस्तकालय में पढ़ते छात्र

साढ़े चार करोड़ छात्र, एक करोड़ विज्ञान-तकनीक में — और बढ़ोतरी की रफ़्तार गिरकर 0.8% पर

July 31, 2026
भारत भूजल पुनर्भरण

448 अरब घन मीटर: भूजल की लड़ाई भारत धीरे-धीरे जीत रहा है — पर सबसे तेज़ी वहीं नहीं, जहां सबसे ज़्यादा ज़रूरत है

July 31, 2026
mission Gaganyaan

तीन परीक्षण जिन्हें कोई नहीं देखता — और जिन पर तय होता है कि यात्री सुरक्षित लौटेगा या नहीं

July 31, 2026
United-Kingdom-Parliament

भारत–ब्रिटेन समझौते के दो हफ़्ते: 99% निर्यात पर शुल्क शून्य होने से असल में बदलता क्या है

July 31, 2026
The-Sabarmati-riverfront-in-Ahmedabad,-Gujarat

गुजरात पर रेड अलर्ट, अहमदाबाद में स्कूल बंद — और महीना आंकड़ों में जितना दिखता है, उससे ज़्यादा सूखा

July 31, 2026
Commonwealth-Games

एक ही फ़ाइनल में भारत के तीन भाला फेंक खिलाड़ी — यह आंकड़ा किसी एक थ्रो से बड़ा है

July 31, 2026
5.5% और 16.2%: भारत में नौकरियों की कमी नहीं है, उम्र का मेल नहीं बैठ रहा है

5.5% और 16.2%: भारत में नौकरियों की कमी नहीं है, उम्र का मेल नहीं बैठ रहा है

July 30, 2026
vikram

वह रडार जो ज़मीन का खिसकना देख लेता है: निसार के पहले साल से भारत को क्या मिला

July 30, 2026
Federal-Reserve-board

वॉशिंगटन में तीन अधिकारी ब्याज दर बढ़ाना चाहते थे — और यह ख़बर मुंबई तक सुबह से पहले पहुंच गई

July 30, 2026
Friday, July 31, 2026
Retail
संपर्क
डाउनलोड
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर
No Result
View All Result
Welcome To Blitz India Media
No Result
View All Result

भारत अब अपनी हवा लगभग हर जगह नाप सकता है — अगला दशक इस पर काम करने का है कि मीटर क्या कह रहे हैं

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 31, 2026
in the blitz
0
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।पिछले सात साल में हवा की गुणवत्ता के मोर्चे पर भारत ने जो सबसे अहम चीज़ बनाई है, वह कोई फ़िल्टर या ईंधन मानक नहीं है — वह नापने का नेटवर्क है, और यह उपलब्धि उससे कहीं बड़ी है जितनी सुनने में लगती है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत केंद्रीय मदद से शामिल शहरों में निगरानी क्षमता तीन से चार गुना बढ़ी है, और हर शहर में कम से कम एक मैनुअल या सतत निगरानी केंद्र सुनिश्चित किया गया है। कार्यक्रम 131 ग़ैर-प्राप्ति शहरों को कवर करता है और इसका लक्ष्य कण प्रदूषण में 40% की कमी है। जिन 231 शहरों के पर्याप्त आँकड़े हैं, उनमें 128 शहर पीएम2.5 के राष्ट्रीय मानक पर खरे उतरते हैं और 103 उससे ऊपर हैं।

अब तक के नतीजे असली भी हैं और असमान भी — किसी कार्यक्रम की इस अवस्था में ईमानदार आकलन यही होगा। रोज़ाना बुलेटिन में दर्ज वायु गुणवत्ता सूचकांक 2019 से 2023 के बीच क़रीब 13% गिरा। पर एक पुराने आकलन में जिन 43 शहरों को परखा गया, उनमें से सिर्फ़ 14 में 2019 से 2021 के बीच पीएम2.5 में 10% या उससे ज़्यादा की कमी दर्ज हुई। और तालिका का ऊपरी सिरा अब भी कठिन है: असम के बर्नीहाट, दिल्ली और ग़ाज़ियाबाद में सालाना पीएम2.5 का स्तर क्रमशः क़रीब 100, 96 और 93 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा — राष्ट्रीय मानक से कई गुना ऊपर।

YOU MAY ALSO LIKE

पाँच हफ़्ते, सोलह फ़िल्में: जुलाई ने परखा कि भारतीय पर्दे एक साथ कितना बोझ उठा सकते हैं

डेंगू के टीके को मंज़ूरी, और चुपचाप बदलता देश का प्रयोगशाला नेटवर्क

पहले नाप, फिर नीति: शामिल शहरों में निगरानी क्षमता तीन से चार गुना बढ़ी है — किसी भी ऐसी नीति की पहली शर्त जिसका मूल्यांकन किया जा सके।

वायु प्रदूषण उन गिनी-चुनी सार्वजनिक समस्याओं में है जिसके कारण पर बहस नहीं है। कमी जानकारी की नहीं, पूरे वायु-क्षेत्र के पैमाने पर काम करने के अधिकार की है।

एक नज़र में

• कार्यक्रम का दायरा: राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत 131 ग़ैर-प्राप्ति शहर
• लक्ष्य: शामिल शहरों में कण प्रदूषण में 40% की कमी
• निगरानी क्षमता: तीन से चार गुना बढ़ी, हर शहर में कम से कम एक केंद्र
• अनुपालन: पर्याप्त आँकड़ों वाले 231 शहरों में 128 मानक पर खरे, 103 उससे ऊपर
• रुझान: 2019 से 2023 के बीच वायु गुणवत्ता सूचकांक में क़रीब 13% की गिरावट
• पुराना आकलन: 43 में से 14 शहरों में 2019–21 के बीच पीएम2.5 में 10%+ की कमी
• सबसे ऊँचा सालाना पीएम2.5: बर्नीहाट क़रीब 100, दिल्ली 96, ग़ाज़ियाबाद 93 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर
• मुख्य कारण: तेज़ शहरीकरण, औद्योगिक गतिविधि और वाहनों का उत्सर्जन

निगरानी के आँकड़ों ने सबसे काम की जो बात साबित की है, वह यह है कि कण प्रदूषण नगरपालिका का नहीं, पूरे इलाक़े का मामला है। सर्दियों के किसी बुरे दिन में किसी भी भारतीय शहर के भीतर नापे गए महीन कणों का बड़ा हिस्सा उस शहर की सीमा के भीतर पैदा ही नहीं हुआ होता; वह आसपास के ज़िलों से, राजमार्गों से, ईंट-भट्ठों और क्षेत्रीय उद्योग से, और उस पूरे इलाक़े में जलाई गई फ़सल की पराली से आता है जो किसी भी नगर निगम के दायरे से कहीं बड़ा है। इसीलिए शहर-स्तर की कार्ययोजनाएँ, चाहे कितनी अच्छी तरह लागू हों, एक हद के बाद रुक जाती हैं: कोई महापौर अपनी सीमा के भीतर निर्माण की धूल और कचरा जलाने पर रोक लगा सकता है, पर उस वायु-क्षेत्र के बारे में कुछ नहीं कर सकता जो हर दिशा में दो सौ किलोमीटर तक फैला है।

यही निदान अगला ठोस क़दम बताता है, और इस पर दुनिया का अनुभव असामान्य रूप से साफ़ है। जिन देशों ने अपनी हवा सचमुच साफ़ की — ब्रिटेन ने स्वच्छ वायु क़ानूनों के बाद, अमेरिका ने क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन ज़िलों के ज़रिए, चीन ने बीजिंग–तिआनजिन–हेबेई क्षेत्र में — उन सबने ऐसी संस्था बनाई जिसका अधिकार-क्षेत्र शहर नहीं, पूरा वायु-क्षेत्र था, और जिसके पास उस पूरे इलाक़े में मानक तय करने तथा लागू कराने की शक्ति थी। भारत ने सबसे प्रभावित क्षेत्र में ऐसा क्षेत्रीय आयोग पहले ही बनाया है, और रचनात्मक एजेंडा यही है कि इस ढाँचे को आगे बढ़ाया जाए, उसे ठीक से पैसा मिले, और उन चार स्रोतों पर उसका अधिकार साफ़ हो जो सूची में सबसे ऊपर हैं: घरों और उद्योगों में जलने वाला ठोस ईंधन, वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण और सड़क की धूल, तथा खेतों में बची पराली। इनमें से हर एक का तकनीकी हल जाना-पहचाना है और लागत का अंदाज़ा भी। एजेंडे का दूसरा आधा हिस्सा प्रकाशन है — हर घंटे का, हर केंद्र का आँकड़ा खुले तौर पर और ऐसे रूप में जिसे नागरिक, शोधकर्ता, अदालतें और राज्य सरकारें सब इस्तेमाल कर सकें, ताकि प्रगति दिखे भी और किसके खाते में जाए यह भी साफ़ हो। भारत ने सात साल वे उपकरण बनाने में लगाए हैं जो हवा को पढ़ने लायक़ बनाते हैं। पढ़ने लायक़ हो जाना ही किसी समस्या को सँभालने लायक़ बनाता है, और देश ठीक इसी बिंदु पर पहुँचा है।

ShareTweetSend

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

POPULAR NEWS

  • India shows way out to UN military observer group

    संरा के सैन्य पर्यवेक्षक समूह को भारत ने दिखाया बाहर का रास्ता

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • प्रोपर्टी पर जिसका 12 साल से कब्जा, वही होगा मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • 12 साल से है जमीन पर कब्जा तो वही होगा असली मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • गंगाजल खराब नहीं होता, लेकिन क्यों ?

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • पृथ्वी का आखिरी देश जहां सूरज केवल 40 मिनट के लिए ही डूबता है

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
Welcome To Blitz India Media

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation

Navigate Site

  • About
  • Our Team
  • Contact

Follow Us

No Result
View All Result
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation