ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।पिछले सात साल में हवा की गुणवत्ता के मोर्चे पर भारत ने जो सबसे अहम चीज़ बनाई है, वह कोई फ़िल्टर या ईंधन मानक नहीं है — वह नापने का नेटवर्क है, और यह उपलब्धि उससे कहीं बड़ी है जितनी सुनने में लगती है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत केंद्रीय मदद से शामिल शहरों में निगरानी क्षमता तीन से चार गुना बढ़ी है, और हर शहर में कम से कम एक मैनुअल या सतत निगरानी केंद्र सुनिश्चित किया गया है। कार्यक्रम 131 ग़ैर-प्राप्ति शहरों को कवर करता है और इसका लक्ष्य कण प्रदूषण में 40% की कमी है। जिन 231 शहरों के पर्याप्त आँकड़े हैं, उनमें 128 शहर पीएम2.5 के राष्ट्रीय मानक पर खरे उतरते हैं और 103 उससे ऊपर हैं।
अब तक के नतीजे असली भी हैं और असमान भी — किसी कार्यक्रम की इस अवस्था में ईमानदार आकलन यही होगा। रोज़ाना बुलेटिन में दर्ज वायु गुणवत्ता सूचकांक 2019 से 2023 के बीच क़रीब 13% गिरा। पर एक पुराने आकलन में जिन 43 शहरों को परखा गया, उनमें से सिर्फ़ 14 में 2019 से 2021 के बीच पीएम2.5 में 10% या उससे ज़्यादा की कमी दर्ज हुई। और तालिका का ऊपरी सिरा अब भी कठिन है: असम के बर्नीहाट, दिल्ली और ग़ाज़ियाबाद में सालाना पीएम2.5 का स्तर क्रमशः क़रीब 100, 96 और 93 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा — राष्ट्रीय मानक से कई गुना ऊपर।
पहले नाप, फिर नीति: शामिल शहरों में निगरानी क्षमता तीन से चार गुना बढ़ी है — किसी भी ऐसी नीति की पहली शर्त जिसका मूल्यांकन किया जा सके।
वायु प्रदूषण उन गिनी-चुनी सार्वजनिक समस्याओं में है जिसके कारण पर बहस नहीं है। कमी जानकारी की नहीं, पूरे वायु-क्षेत्र के पैमाने पर काम करने के अधिकार की है।
एक नज़र में
• कार्यक्रम का दायरा: राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत 131 ग़ैर-प्राप्ति शहर
• लक्ष्य: शामिल शहरों में कण प्रदूषण में 40% की कमी
• निगरानी क्षमता: तीन से चार गुना बढ़ी, हर शहर में कम से कम एक केंद्र
• अनुपालन: पर्याप्त आँकड़ों वाले 231 शहरों में 128 मानक पर खरे, 103 उससे ऊपर
• रुझान: 2019 से 2023 के बीच वायु गुणवत्ता सूचकांक में क़रीब 13% की गिरावट
• पुराना आकलन: 43 में से 14 शहरों में 2019–21 के बीच पीएम2.5 में 10%+ की कमी
• सबसे ऊँचा सालाना पीएम2.5: बर्नीहाट क़रीब 100, दिल्ली 96, ग़ाज़ियाबाद 93 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर
• मुख्य कारण: तेज़ शहरीकरण, औद्योगिक गतिविधि और वाहनों का उत्सर्जन
निगरानी के आँकड़ों ने सबसे काम की जो बात साबित की है, वह यह है कि कण प्रदूषण नगरपालिका का नहीं, पूरे इलाक़े का मामला है। सर्दियों के किसी बुरे दिन में किसी भी भारतीय शहर के भीतर नापे गए महीन कणों का बड़ा हिस्सा उस शहर की सीमा के भीतर पैदा ही नहीं हुआ होता; वह आसपास के ज़िलों से, राजमार्गों से, ईंट-भट्ठों और क्षेत्रीय उद्योग से, और उस पूरे इलाक़े में जलाई गई फ़सल की पराली से आता है जो किसी भी नगर निगम के दायरे से कहीं बड़ा है। इसीलिए शहर-स्तर की कार्ययोजनाएँ, चाहे कितनी अच्छी तरह लागू हों, एक हद के बाद रुक जाती हैं: कोई महापौर अपनी सीमा के भीतर निर्माण की धूल और कचरा जलाने पर रोक लगा सकता है, पर उस वायु-क्षेत्र के बारे में कुछ नहीं कर सकता जो हर दिशा में दो सौ किलोमीटर तक फैला है।
यही निदान अगला ठोस क़दम बताता है, और इस पर दुनिया का अनुभव असामान्य रूप से साफ़ है। जिन देशों ने अपनी हवा सचमुच साफ़ की — ब्रिटेन ने स्वच्छ वायु क़ानूनों के बाद, अमेरिका ने क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन ज़िलों के ज़रिए, चीन ने बीजिंग–तिआनजिन–हेबेई क्षेत्र में — उन सबने ऐसी संस्था बनाई जिसका अधिकार-क्षेत्र शहर नहीं, पूरा वायु-क्षेत्र था, और जिसके पास उस पूरे इलाक़े में मानक तय करने तथा लागू कराने की शक्ति थी। भारत ने सबसे प्रभावित क्षेत्र में ऐसा क्षेत्रीय आयोग पहले ही बनाया है, और रचनात्मक एजेंडा यही है कि इस ढाँचे को आगे बढ़ाया जाए, उसे ठीक से पैसा मिले, और उन चार स्रोतों पर उसका अधिकार साफ़ हो जो सूची में सबसे ऊपर हैं: घरों और उद्योगों में जलने वाला ठोस ईंधन, वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण और सड़क की धूल, तथा खेतों में बची पराली। इनमें से हर एक का तकनीकी हल जाना-पहचाना है और लागत का अंदाज़ा भी। एजेंडे का दूसरा आधा हिस्सा प्रकाशन है — हर घंटे का, हर केंद्र का आँकड़ा खुले तौर पर और ऐसे रूप में जिसे नागरिक, शोधकर्ता, अदालतें और राज्य सरकारें सब इस्तेमाल कर सकें, ताकि प्रगति दिखे भी और किसके खाते में जाए यह भी साफ़ हो। भारत ने सात साल वे उपकरण बनाने में लगाए हैं जो हवा को पढ़ने लायक़ बनाते हैं। पढ़ने लायक़ हो जाना ही किसी समस्या को सँभालने लायक़ बनाता है, और देश ठीक इसी बिंदु पर पहुँचा है।














