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NEW DELHI: भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था अपने इतिहास के सबसे बड़े आकार पर पहुँच गई है, और उन्हीं आँकड़ों में उसने कई साल की सबसे धीमी बढ़ोतरी भी दर्ज की है। दोनों बातें एक ही रिपोर्ट में हैं, और असली काम इन्हें साथ पढ़ने का है। अखिल भारतीय उच्चतर शिक्षा सर्वेक्षण के मुताबिक़ 2023–24 में उच्च शिक्षा में दाख़िला रिकॉर्ड 4.5 करोड़ तक पहुँचा, जो पिछले साल के 4.46 करोड़ से 0.8% ज़्यादा है। सकल नामांकन अनुपात 29.5 से बढ़कर 30 हो गया। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में दाख़िला पहली बार एक करोड़ के पार गया। छात्राओं का दाख़िला 2.24 करोड़ रहा, जो पिछले साल 2.18 करोड़ था — और बीते दस साल में इसमें 42.2% की बढ़त हुई है।
इन छात्रों को सँभालने वाला ढाँचा किसी भी अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर बहुत बड़ा है: सर्वेक्षण में 1,289 विश्वविद्यालय, 48,246 महाविद्यालय और 15,221 स्वतंत्र संस्थान दर्ज हैं, जिनमें साल भर में नए पंजीकृत 1,622 कॉलेज शामिल हैं। इसी साल 173 देशों के 58,134 विदेशी छात्र भारत में पढ़ रहे थे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य 2035 तक सकल नामांकन अनुपात 50% तक ले जाना है। 30 के मौजूदा स्तर से वहाँ पहुँचने का मतलब है कि अगले ग्यारह साल में अनुपात के हिसाब से क़रीब दो-तिहाई और छात्र जोड़ने होंगे — जबकि सबसे ताज़ा साल की बढ़ोतरी एक प्रतिशत से भी कम रही।
1,289 विश्वविद्यालय और 48,246 कॉलेज: भारत अब दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा व्यवस्थाओं में है। अगले दशक का सवाल सीटों की संख्या नहीं, यह है कि एक सीट पर बैठने से मिलता क्या है।
जिस व्यवस्था ने अपना आकार दोगुना कर लिया, उसने मुश्किल और महँगा काम कर लिया। बाक़ी काम सस्ता है और ज़्यादा कठिन — हर सीट को बैठने लायक़ बनाना।
एक नज़र में
• कुल दाख़िला (2023–24): रिकॉर्ड 4.5 करोड़, 4.46 करोड़ से 0.8% ऊपर
• सकल नामांकन अनुपात: 30, पिछले साल 29.5
• राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य: 2035 तक 50%
• विज्ञान-तकनीक (STEM): पहली बार एक करोड़ के पार
• छात्राएँ: 2.24 करोड़, दस साल में 42.2% की बढ़त
• संस्थान: 1,289 विश्वविद्यालय, 48,246 कॉलेज, 15,221 स्वतंत्र संस्थान
• नए पंजीकरण: साल भर में 1,622 कॉलेज
• विदेशी छात्र: 173 देशों के 58,134
• संसद में: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक — यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई की जगह एक नियामक का प्रस्ताव, संयुक्त संसदीय समिति के पास
बढ़ोतरी का धीमा पड़ना उतना चिंताजनक नहीं जितना पहली नज़र में लगता है, और इसकी वजह समझना ही आगे का रास्ता बताता है। पिछले पंद्रह साल में उच्च शिक्षा का विस्तार बड़े हिस्से में दो चीज़ों से चला — बढ़ती युवा आबादी, और वे छात्र जो अपने परिवार में पहली बार कॉलेज पहुँचे। ये दोनों ताक़तें अपना सबसे बड़ा असर शुरू में ही दिखाती हैं। जो छात्र आसानी से पहुँच में थे, वे व्यवस्था में आ चुके; अब हर अगला प्रतिशत उन जगहों से आना है जो कठिन हैं — छोटे क़स्बे, ग़रीब ज़िले, वे छात्र जिन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए आर्थिक मदद चाहिए, और वे नौजवान जो स्कूल के बाद इसलिए रुक जाते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं कि अगले तीन साल की क़ीमत वसूल होगी। इस मोड़ पर रफ़्तार का धीमा होना बताता है कि अड़चन अब सीटों की उपलब्धता नहीं, उन सीटों की क़ीमत को लेकर बना भरोसा है।
इसीलिए अब असली एजेंडा गुणवत्ता और रोज़गार-योग्यता का है, और यहीं संसद में मौजूद विधेयक की अहमियत बनती है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की जगह एक नियामक बनाने का प्रस्ताव रखता है, 13 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र के दौरान संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया है। सैद्धांतिक रूप से यह उस कॉलेज के लिए बड़ी राहत है जिसे अभी कई संस्थाओं को अलग-अलग, अक्सर एक जैसे काग़ज़ भेजने पड़ते हैं। पर नतीजा इस बात से तय होगा कि नया नियामक नापेगा क्या, क्योंकि संस्थान ठीक वही चीज़ बेहतर करते हैं जिसे नापा जाता है। अगर पैमाना इमारत, शिक्षक-छात्र अनुपात और फ़ाइलें रहीं, तो कॉलेज इन्हीं में अच्छे होंगे। अगर पैमाना नतीजे हुए — स्नातकों को नौकरी, दाख़िले और डिग्री के बीच सीखने में हुई असल बढ़त, और जाँची जा सकने वाली प्लेसमेंट जानकारी — तो कॉलेज उनमें अच्छे होंगे। विज्ञान-तकनीक में एक करोड़ का आँकड़ा और छात्राओं की लगातार बढ़ती संख्या दिखाती है कि छात्र पहले से उसी तरफ़ बढ़ रहे हैं जिसे वे फ़ायदेमंद मानते हैं। उन्हें बेहतर जानकारी देना, और संस्थानों को दाख़िले के बजाय पढ़ाई के बाद के नतीजों पर मुक़ाबला करने की वजह देना — यही सबसे ज़्यादा फ़ायदा देने वाला सुधार है।














