ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने गगनयान के क्रू मॉड्यूल से जुड़े तीन अहम परीक्षण पूरे कर लिए हैं, और इनमें से किसी में कोई रॉकेट नहीं उड़ा। पहला परीक्षण उस प्रणाली का था जो समुद्र में उतरने के बाद कैप्सूल को सीधा खड़ा कर देती है — इसमें पहले से भरी ठंडी गैस का इस्तेमाल होता है। दूसरा उस अम्बिलिकल जोड़ का, जो क्रू मॉड्यूल (जहां यात्री रहते हैं) और सर्विस मॉड्यूल (जो बिजली और प्रणोदन देता है) को जोड़ता है और सही वक़्त पर साफ़-साफ़ अलग होना चाहिए। तीसरे में जांचा गया कि एपेक्स कवर अलग होते समय क्रू मॉड्यूल की संरचना मज़बूत बनी रहती है या नहीं — यह वही ढक्कन है जो पैराशूट की रक्षा करता है और उनके खुलने से ठीक पहले हट जाता है।
ये वे परीक्षण नहीं हैं जो टेलीविज़न पर दिखते हैं। लेकिन असल में यही तय करते हैं कि किसी देश का मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम कागज़ पर है या सचमुच। इन तीनों में से हर एक ऐसी गड़बड़ी से जुड़ा है जिसने दूसरे देशों में यात्रियों की जान ली है — कैप्सूल का पानी में उलटा रह जाना, अम्बिलिकल का ठीक से अलग न होना, या पैराशूट का ढक्कन हटते समय पैराशूट को ही नुक़सान पहुंचा देना। परीक्षण पूरा होने का मतलब है कि हर प्रणाली को असल हालात से ज़्यादा कठिन परिस्थितियों में परखा जा चुका है।
वापसी भी एक प्रणाली है: कैप्सूल को सीधा करना, अम्बिलिकल का अलग होना और एपेक्स कवर का हटना — ये तीनों मिलकर तय करते हैं कि कक्षा तक पहुंचा यान अपने यात्रियों को सुरक्षित लौटा भी पाएगा या नहीं।
मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम की चर्चा प्रक्षेपण से होती है, पर फ़ैसला वापसी पर होता है। भारत ने अभी वापसी की तैयारी प्रमाणित की है।
एक नज़र में
• सफल परीक्षण: क्रू मॉड्यूल अपराइटिंग सिस्टम; अम्बिलिकल पृथक्करण; एपेक्स कवर पृथक्करण
• घोषणा: जुलाई 2026 के मध्य में बेंगलुरु से
• अपराइटिंग सिस्टम: ठंडी गैस आधारित; समुद्र में उतरने के बाद कैप्सूल को सीधा करता है
• एपेक्स कवर: पैराशूट और उससे जुड़ी प्रणालियों की रक्षा करता है; खुलने से पहले अलग होता है
• अगली उड़ान: बिना यात्री वाली जी1 उड़ान, 2026 के आख़िर के आसपास संभावित
• जी1 में: व्योममित्र नाम का अर्ध-मानवाकार रोबोट, यात्री की सीट पर बैठकर जीवन-रक्षक और सुरक्षा प्रणालियों की जांच करेगा
• मानव उड़ान: 2027–28 का लक्ष्य
• प्रक्षेपण कार्यक्रम: इसरो इस वित्त वर्ष में सात मिशनों की तैयारी में
अगला बड़ा पड़ाव बिना यात्री वाली जी1 उड़ान है, जो इस साल के आख़िर के आसपास संभावित है। इसमें व्योममित्र नाम का अर्ध-मानवाकार रोबोट यात्री की सीट पर बैठेगा और जीवन-रक्षक व सुरक्षा प्रणालियों को वैसे ही इस्तेमाल करेगा जैसे कोई इंसान करता। मानव उड़ान का लक्ष्य 2027–28 है। यह क्रम सोच-समझकर तय किया गया है और इसका बचाव किया जाना चाहिए — बिना यात्री वाली हर अतिरिक्त रिहर्सल एक अनजान जोखिम को मापी हुई संख्या में बदल देती है, और जिन देशों ने यह चरण छोटा किया, उन्हें आमतौर पर बाद में उसकी क़ीमत चुकानी पड़ी।
बड़ा संदर्भ यह है कि इसरो इस वित्त वर्ष में सात मिशनों का कार्यक्रम बना रहा है — मानसून, तटरेखा और खेतों पर नज़र रखने वाले पृथ्वी-निगरानी उपग्रह, संचार उपग्रह, तकनीकी प्रदर्शक और गगनयान से जुड़ी उड़ानें। संगठन के सामने चुनौती क्षमता की नहीं, नियमितता की है। कभी-कभार उड़ान भरने वाला कार्यक्रम कुछ असाधारण लोगों के भरोसे चल सकता है, लेकिन हर महीने उड़ान भरने वाले कार्यक्रम को मानकीकृत प्रक्रियाएं, उद्योग की गहरी भागीदारी और ऐसा आपूर्तिकर्ता आधार चाहिए जो बड़ी संख्या में भी सटीकता बनाए रखे। भारत की अंतरिक्ष नीति के सुधारों ने निजी विनिर्माताओं के लिए यह दरवाज़ा खोल दिया है। अब ज़रूरत है एक तय तारीख़ों वाली सार्वजनिक उड़ान-सूची की, जिसके आधार पर आपूर्तिकर्ता पूंजी लगाने की योजना बना सकें। यही वह चीज़ है जो एक अच्छे साल को स्थायी क्षमता में बदलती है।













