ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।ग्लासगो के स्कॉट्सटाउन स्टेडियम में गुरुवार को हवा उल्टी दिशा में चल रही थी, और उसका असर साफ़ दिखा — राष्ट्रमंडल खेलों की भाला फेंक क्वालिफ़ाइंग में एक भी खिलाड़ी 84 मीटर का सीधा क्वालिफ़ाइंग मार्क नहीं छू सका। फ़ाइनल के लिए बारह नाम रैंकिंग से तय हुए। नीरज चोपड़ा ने पहले प्रयास में 76.28 मीटर फेंका, दूसरे में सुधार कर 79.61 मीटर तक पहुंचे, और जब देखा कि इतने से पांचवां स्थान पक्का है तो तीसरा प्रयास लिया ही नहीं। पर जो आंकड़ा हवा से बड़ा है वह अलग है — रोहित यादव 78.37 मीटर के साथ नौवें और यशवीर सिंह 78.36 मीटर के साथ दसवें स्थान पर रहकर फ़ाइनल में पहुंचे। यह पहली बार है जब भारत के तीन भाला फेंक खिलाड़ी राष्ट्रमंडल खेलों के एक ही फ़ाइनल में उतरेंगे।
यह खेल की ख़बर की शक्ल में एक ढांचागत बदलाव है। दस साल पहले भारत की भाला फेंक की कहानी एक नाम और एक उम्मीद थी। क्वालिफ़ाइंग में एक ख़राब दिन का मतलब होता था — अभियान ख़त्म। शनिवार को एक ही देश के तीन खिलाड़ी एक ही फ़ाइनल में उतरेंगे, और तीनों ऐसी दूरी फेंकने में सक्षम हैं जो ज़्यादातर सालों में पदक दिला देती है। इस तरह की गहराई सालों की मेहनत से बनती है — थ्रोइंग पिट और फ़िज़ियोथेरेपी रूम में। यह अपने आप नहीं आती।
हवा का असर: स्कॉट्सटाउन में उलटी हवा के कारण कोई भी खिलाड़ी 84.00 मीटर के स्वत: क्वालिफ़ाइंग मार्क तक नहीं पहुंच सका — और इसी हालात में भारत ने तीन खिलाड़ी फ़ाइनल में भेज दिए।
फ़ाइनल में एक खिलाड़ी प्रतिभा है। एक ही फ़ाइनल में तीन खिलाड़ी व्यवस्था है — और व्यवस्था को दूसरी स्पर्धाओं तक बढ़ाया जा सकता है।
एक नज़र में
• क्वालिफ़ाइंग: नीरज चोपड़ा पांचवें — 76.28 मीटर, फिर 79.61 मीटर; तीसरा प्रयास नहीं लिया
• साथ में: रोहित यादव नौवें (78.37 मीटर), यशवीर सिंह दसवें (78.36 मीटर)
• हालात: उलटी हवा; कोई भी 84.00 मीटर के मार्क तक नहीं पहुंचा
• पहली बार: राष्ट्रमंडल खेलों के एक फ़ाइनल में भारत के तीन भाला फेंक खिलाड़ी
• फ़ाइनल: शनिवार, भारतीय समयानुसार
• आठवें दिन तक पदक: 17 — 3 स्वर्ण, 10 रजत, 4 कांस्य
• गुरुवार के अन्य पदक: लवप्रीत सिंह को भारोत्तोलन में रजत; सीमा कालीरमना को महिला चक्का फेंक में 58.65 मीटर के साथ कांस्य
• शॉट पुट: शर्मिला ने महिला एफ57 वर्ग में 9.81 मीटर के सत्र-सर्वश्रेष्ठ प्रयास के साथ स्वर्ण जीता
• खेलों का समापन: 2 अगस्त
गुरुवार का बाक़ी दिन भी यही बात कहता है। शर्मिला ने महिलाओं की एफ57 वर्ग की गोला फेंक में 9.81 मीटर के सत्र-सर्वश्रेष्ठ प्रयास के साथ स्वर्ण जीता। लवप्रीत सिंह ने भारोत्तोलन में रजत जोड़ा और सीमा कालीरमना ने महिला चक्का फेंक में 58.65 मीटर के साथ कांस्य। आठवें दिन के बाद भारत के कुल 17 पदक हो चुके हैं — तीन स्वर्ण, दस रजत और चार कांस्य। खेल 2 अगस्त तक चलेंगे। भारोत्तोलन अब तक सबसे ज़्यादा पदक देने वाली स्पर्धा रही है, और पैरा स्पर्धाएं, जो मुख्य कार्यक्रम का ही हिस्सा हैं, तालिका के ऊपरी हिस्से में योगदान दे रही हैं — किनारे पर नहीं।
इस तालिका को ईमानदारी से पढ़ें तो एक अनुपात सामने आता है — तीन स्वर्ण के मुक़ाबले दस रजत। यह उस व्यवस्था की पहचान है जिसने क्वालिफ़ाई करना पूरी तरह सीख लिया है और फ़ाइनल जीतना अब भी सीख रही है। बीस साल पहले की तुलना में यह कहीं बेहतर समस्या है, और इसका हल भी ज़्यादा साफ़ है। ग्लासगो से निकलने वाला सबसे क़ीमती दस्तावेज़ यही दस रजत पदकों की सूची होगी। इनमें से हर एक ऐसा खिलाड़ी है जो एक प्रयास, एक लिफ़्ट या एक रणनीतिक फ़ैसले की दूरी पर शीर्ष स्थान से चूका — और हर एक के पीछे एक पहचानी जा सकने वाली वजह है: तकनीकी चूक, टेपरिंग का समय, या दबाव में फ़ाइनल राउंड का अभ्यास। इस विश्लेषण को प्रकाशित किया जाए और अगले चक्र की फ़ंडिंग इसी के आधार पर तय हो, तो यह अंतर शिकायत नहीं, एक कार्ययोजना बन जाता है। शनिवार का भाला फेंक फ़ाइनल, जिसमें भारत के तीन खिलाड़ी होंगे, इसकी पहली परीक्षा है।













