ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।मानसून कोई एक आंकड़ा नहीं होता, और इस साल के मानसून ने दो महीने यही साबित करने में लगाए। 1901 के बाद के पांचवें सबसे सूखे जून के बाद देश ने जुलाई की शुरुआत क़रीब 40% की मौसमी बारिश कमी के साथ की। जुलाई के पहले हफ़्ते की तेज़ बारिश ने यह कमी घटाकर लगभग 14% कर दी। दूसरे हफ़्ते के लंबे सूखे दौर ने इसे फिर 24% तक पहुंचा दिया। 21 से 24 जुलाई के बीच हुई व्यापक बारिश ने इसे दोबारा क़रीब 15% पर ले आई। जुलाई का महीना अपने दीर्घावधि औसत 280.4 मिलीमीटर से लगभग 10% कम पर बंद हो रहा है, और यह कमी ज़्यादातर उत्तर और मध्य भारत के हिस्सों में है।
राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा अहम यह है कि बारिश कहां हुई और कब। जुलाई वह महीना है जिसमें ख़रीफ़ की बुवाई होती है और फ़सल जमती है, और खेत को देश के औसत से कोई मतलब नहीं होता — उसे इससे मतलब होता है कि जिस पखवाड़े उसमें बीज पड़ा, उस पखवाड़े मिट्टी में नमी थी या नहीं। जुलाई की शुरुआत में बुवाई क़रीब 3.51 करोड़ हेक्टेयर पर थी, जो पिछले साल से पीछे थी, और सबसे बड़ा अंतर धान, दलहन और मोटे अनाज में था। जुलाई के आख़िर की बारिश ठीक उस समय आई जब देर से हुई बुवाई की भरपाई अब भी मुमकिन थी — यही वजह है कि वही बारिश दो हफ़्ते पहले न होने पर नुक़सान बहुत ज़्यादा होता।
कुल बारिश से ज़्यादा समय मायने रखता है: खेत को उस पखवाड़े की बारिश से मतलब है जिसमें उसका बीज पड़ा, राष्ट्रीय मौसमी औसत से नहीं — इसीलिए जुलाई के आख़िर की बारिश आंकड़े से ज़्यादा मायने रखती है।
कमी 40 से 14, फिर 24 और फिर 15 पर पहुंची। इस तरह डोलने वाला मानसून पूर्वानुमान की समस्या नहीं है — यह पानी सहेजने की समस्या है।
एक नज़र में
• जून: 99.5 मिमी बारिश, सामान्य से क़रीब 40% कम — 1901 के बाद पांचवां सबसे सूखा जून
• मौसमी कमी का सफ़र: क़रीब 40% → 14% → 24% → 21–24 जुलाई की बारिश के बाद लगभग 15%
• जुलाई: सामान्य से क़रीब 10% कम; महीने का दीर्घावधि औसत 280.4 मिमी
• कहां कमी: उत्तर और मध्य भारत के हिस्से, और दक्षिण प्रायद्वीप का भीतरी व दक्षिण-पूर्वी इलाक़ा
• मौसम विभाग का अनुमान: अगस्त में बारिश दीर्घावधि औसत के 97%, ±9%
• अगले दस दिन: पूर्व, पूर्वोत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में बेहतर वितरण; महाराष्ट्र और गुजरात में कमज़ोर दौर
• ख़रीफ़ बुवाई: जुलाई की शुरुआत में क़रीब 3.51 करोड़ हेक्टेयर, पिछले साल से पीछे
आगे का अनुमान राहत देने वाला है। मौसम विभाग के दूसरे हिस्से के पूर्वानुमान के मुताबिक़ अगस्त में बारिश दीर्घावधि औसत के 97% रहने की संभावना है, नौ प्रतिशत अंक की दोनों तरफ़ की गुंजाइश के साथ, और चार महीने के मौसम का बाक़ी आधा हिस्सा मोटे तौर पर सामान्य रहने की उम्मीद है। अगले दस दिनों में पूर्व, पूर्वोत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश का वितरण बेहतर रहने का अनुमान है। महाराष्ट्र और गुजरात समेत मध्य भारत में मानसून का दौर कुछ कमज़ोर रह सकता है, और दक्षिण प्रायद्वीप का भीतरी व दक्षिण-पूर्वी हिस्सा कम बारिश वाला बना रह सकता है। इसका मतलब है कि बाक़ी जोखिम राष्ट्रीय नहीं, क्षेत्रीय है — और क्षेत्रीय जोखिम क्षेत्रीय स्तर पर संभाला जा सकता है।
यहीं से रचनात्मक काम शुरू होता है। जो मानसून चार हफ़्ते में 40% की कमी से लगभग सामान्य तक आ जाए, वह मुख्य रूप से पूर्वानुमान की चूक नहीं है — मौसम विभाग के अनुमान मौसम के साथ ठीक-ठीक चले हैं — वह पानी सहेजने की ज़रूरत का तर्क है। जो उपाय इस उतार-चढ़ाव को झेलने लायक़ बना देते हैं, वे जाने-पहचाने हैं और बड़े हिस्से में मौजूद भी: जलग्रहण कार्यक्रमों के तहत बनने वाले खेत-तालाब और चेक डैम, जो एक पखवाड़े का अतिरिक्त पानी उस पखवाड़े के लिए बचा लेते हैं जब बारिश नहीं होती; जल संचय जन भागीदारी के तहत पूरे हुए भूजल पुनर्भरण के काम; आपात बीज योजनाएं, जिससे बुवाई पिछड़ने पर ज़िला कम अवधि की क़िस्म पर जा सके; और फ़सल बीमा जो मापी गई बारिश के आधार पर भुगतान करे, आंकी गई हानि के आधार पर नहीं, ताकि पैसा हफ़्तों में पहुंचे, महीनों में नहीं। इस मौसम के बाक़ी हिस्से का काम निशाना साधना है: ज़िले के स्तर पर मिट्टी की नमी और बुवाई के आंकड़े सार्वजनिक हों, ताकि कृषि विस्तार तंत्र कम अवधि का बीज और सिंचाई सहायता ठीक उन ब्लॉकों तक पहुंचाए जो पीछे रह गए, पूरे राज्य तक नहीं। भारत मानसून को स्थिर नहीं कर सकता। वह अपने किसानों को इस अस्थिरता से बचा ज़रूर सकता है।












