ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जब किसी एक देश के दो खिलाड़ी साथ-साथ फ़िनिश लाइन की तरफ़ बढ़ते हैं, तो स्टेडियम की आवाज़ बदल जाती है। बुधवार शाम ग्लासगो ने वही आवाज़ सुनी। दिलीप महादु गावित ने पुरुषों की टी47 वर्ग की 100 मीटर दौड़ 10.71 सेकंड में जीती — खेलों का नया रिकॉर्ड और उनका इस सत्र का सर्वश्रेष्ठ समय। उनके ठीक 0.12 सेकंड बाद मोहम्मद बासिल एम ने 10.83 सेकंड के साथ रजत जीता। राष्ट्रमंडल खेलों की किसी भी 100 मीटर फ़ाइनल में भारत के दो खिलाड़ियों का पहले-दूसरे स्थान पर आना दुर्लभ है। और यह पैरा स्पर्धा में हुआ, उसी ट्रैक पर और उसी कार्यक्रम में जिसमें बाक़ी सभी फ़ाइनल होते हैं — इस बात पर ठहरकर सोचने की ज़रूरत है।
उसी दिन मुरली श्रीशंकर ने पुरुषों की लंबी कूद में 8.09 मीटर के साथ रजत जीता, जो उनका दूसरा प्रयास था। बर्मिंघम 2022 में भी उन्होंने रजत ही जीता था। भारत के छह मुक्केबाज़ सेमीफ़ाइनल में पहुंच गए हैं, और राष्ट्रमंडल नियमों के तहत इसका मतलब है छह पदक पहले से पक्के। छठे दिन के बाद भारत के कुल 15 पदक हो चुके हैं — तीन स्वर्ण, नौ रजत और तीन कांस्य — और वह पदक तालिका में आठवें स्थान पर है, न्यूज़ीलैंड, जमैका और वेल्स से आगे। भारतीय दल में 122 खिलाड़ी हैं और खेल 2 अगस्त तक चलेंगे।
एक ही कार्यक्रम, एक ही स्टेडियम: राष्ट्रमंडल खेलों में पैरा स्पर्धाएं दो दशकों से मुख्य कार्यक्रम का हिस्सा हैं — इसीलिए टी47 फ़र्राटा दौड़ में भारत का पहला-दूसरा स्थान उसी पदक तालिका में गिना जाता है।
जो देश राष्ट्रमंडल की किसी 100 मीटर दौड़ में दो खिलाड़ी शीर्ष दो में भेज सके, उसके पास गहराई है, संयोग नहीं। वर्ग बदलने से यह गणित नहीं बदलता।
एक नज़र में
• पुरुष टी47 100 मीटर: दिलीप महादु गावित स्वर्ण, 10.71 सेकंड — खेलों का रिकॉर्ड और सत्र का सर्वश्रेष्ठ
• रजत: मोहम्मद बासिल एम, 10.83 सेकंड — भारत का पहला-दूसरा स्थान
• लंबी कूद: मुरली श्रीशंकर रजत, दूसरे प्रयास में 8.09 मीटर
• मुक्केबाज़ी: छह भारतीय मुक्केबाज़ सेमीफ़ाइनल में — छह पदक पक्के
• छठे दिन तक: 15 पदक — 3 स्वर्ण, 9 रजत, 3 कांस्य; तालिका में आठवां स्थान
• दल: 122 खिलाड़ी; खेल 23 जुलाई से 2 अगस्त तक
• आज का कार्यक्रम: नीरज चोपड़ा भाला फेंक क्वालिफ़ाइंग; तेजस्विन शंकर डेकाथलॉन में; मार्टिना देवी मैबम महिला 86+ किग्रा भारोत्तोलन फ़ाइनल; ट्रैक साइक्लिंग में भारत का अभियान शुरू
बुधवार के पीछे की बड़ी बात यह है कि राष्ट्रमंडल खेल दो दशकों से पैरा स्पर्धाओं को अलग आयोजन के बजाय मुख्य कार्यक्रम में ही रखते हैं, और भारत की पैरा एथलेटिक्स व्यवस्था चुपचाप देश के सबसे मज़बूत खेल ढांचों में शामिल हो गई है। टी47 फ़ाइनल में खेलों का रिकॉर्ड भागीदारी की कहानी नहीं है — 10.71 सेकंड वह समय है जो कुछ दशक पहले तक राष्ट्रमंडल की सामान्य 100 मीटर दौड़ में भी प्रतिस्पर्धी होता। गावित और बासिल ने ऐसी व्यवस्था में प्रशिक्षण लिया, क्वालिफ़ाई किया और दौड़े जो उन्हें फ़र्राटा धावक मानती है, और घड़ी पर दिखा नतीजा उसी व्यवस्था की उपज है।
गुरुवार का कार्यक्रम असली सवाल पूछता है। नीरज चोपड़ा भाला फेंक क्वालिफ़ाइंग में उतरेंगे — वही खिलाड़ी जिसकी सफलता ने ट्रैक एंड फ़ील्ड से भारतीयों की अपेक्षाएं सबसे ज़्यादा बदलीं। तेजस्विन शंकर डेकाथलॉन में 100 मीटर, लंबी कूद और गोला फेंक में हिस्सा लेंगे। मार्टिना देवी मैबम का महिलाओं का 86+ किग्रा भारोत्तोलन फ़ाइनल है, और भारत के साइकिल चालक ट्रैक साइक्लिंग में अभियान शुरू करेंगे — वह खेल जिसमें देश का राष्ट्रमंडल इतिहास लगभग शून्य है। तीन स्वर्ण के मुक़ाबले नौ रजत अब भी ईमानदार कमज़ोरी है — यह उस व्यवस्था की पहचान है जिसने क्वालिफ़ाई करना सीख लिया है और फ़ाइनल जीतना सीख रही है। ग्लासगो के बाक़ी चार दिनों का सबसे उपयोगी इस्तेमाल यही होगा कि रजत की सूची को इन खेलों का सबसे क़ीमती दस्तावेज़ माना जाए — उन खिलाड़ियों की नामज़द सूची जो शीर्ष पायदान से एक प्रयास दूर रह गए, और हर नाम के साथ उसकी वजह। यह विश्लेषण छपे और उसी के आधार पर पैसा लगे, तो यह कमी शिकायत नहीं, कार्ययोजना बन जाएगी।












