ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।बुधवार को बाज़ार अच्छी बढ़त के साथ बंद हुआ। सेंसेक्स 889 अंक यानी 1.16% चढ़कर 77,654.60 पर और निफ्टी 50 265 अंक यानी 1.1% ऊपर 24,250.20 पर बंद हुआ। तेज़ी सिर्फ़ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही — निफ्टी मिडकैप 0.82% और स्मॉलकैप 1.48% ऊपर बंद हुए। आईटी, मेटल और एफ़एमसीजी सूचकांक आगे रहे, जबकि रियल्टी और ऑटो पीछे। लेकिन दिन की सबसे काम की ख़बर आंकड़ों में नहीं, नतीजों में थी।
बुधवार को 85 से ज़्यादा कंपनियों ने जून तिमाही के नतीजे घोषित किए — अदाणी एंटरप्राइज़ेज़, अदाणी पोर्ट्स, एशियन पेंट्स, आयशर मोटर्स, वारी एनर्जीज़, प्रेस्टिज एस्टेट्स, बजाज हाउसिंग फ़ाइनेंस, डाबर और कोलगेट-पामोलिव समेत। इनमें डाबर के अपडेट का एक आंकड़ा सबसे ज़्यादा बताता है: भारत में बिक्री की मात्रा क़रीब 5% बढ़ी, और ग्रामीण मांग लगातार दूसरी तिमाही शहरी मांग से आगे रही। एक तिमाही का फ़र्क़ संयोग हो सकता है। लगातार दो तिमाही का फ़र्क़ रुझान होता है।
रुपये नहीं, डिब्बे गिनिए: उपभोक्ता कंपनियों में असली संकेत बिक्री की मात्रा से मिलता है, क्योंकि उसमें टैक्स घटने से बदली क़ीमत का असर शामिल नहीं होता।
गांव का बाज़ार लगातार दो तिमाही शहर से आगे रहना कोई मार्केटिंग की बात नहीं है। यह इस बात का पहला सबूत है कि टैक्स में कटौती वाक़ई ख़रीदारी में बदली।
एक नज़र में
• सेंसेक्स: 77,654.60, 889 अंक (1.16%) ऊपर
• निफ्टी 50: 24,250.20, 265 अंक (1.1%) ऊपर
• मिडकैप: +0.82%; स्मॉलकैप: +1.48%
• रुपया: डॉलर के मुक़ाबले 96.464, 0.12% कमज़ोर
• विदेशी निवेश: जुलाई में अब तक 11,728.95 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी
• डाबर: भारत में मात्रा में क़रीब 5% वृद्धि; ग्रामीण मांग शहरी से आगे
• जीएसटी 2.0: ज़रूरी सामान 12% से 5% और कई वस्तुएं 28% से 18% की दर पर
यह रुझान क्यों बना, इसका सबसे भरोसेमंद जवाब जीएसटी 2.0 है। ज़रूरी सामान पर दर 12% से घटकर 5% और बहुत-सी वस्तुओं पर 28% से घटकर 18% होने का असर उन घरों में सबसे ज़्यादा दिखता है जहां साबुन, तेल, दवा या पैकेट वाला सामान हर हफ़्ते के बजट में मायने रखता है। ऐसे घरों में क़ीमत में थोड़ी-सी कमी बचत में नहीं, ज़्यादा ख़रीद में बदलती है। दूसरी तरफ़ दबाव भी है — तिमाही के दौरान कच्चे तेल से जुड़े कच्चे माल की लागत बढ़ी है, इसलिए मात्रा बढ़ने के बावजूद कंपनियों का मुनाफ़ा मार्जिन सपाट या थोड़ा कम रहने का अनुमान था।
इस पूरे आंकड़े का असली महत्व शेयर बाज़ार से बड़ा है। ग्रामीण मांग का शहरी मांग से आगे निकलना वह तस्वीर है जिसका भारत की विकास कहानी को इंतज़ार था, क्योंकि इसका मतलब है खपत ऊपर के तबक़े तक सिमटी नहीं, नीचे तक फैल रही है — और फैली हुई खपत ज़्यादा टिकाऊ भी होती है और ज़्यादा रोज़गार भी बनाती है। इसे बनाए रखने का रास्ता सीधा है: जीएसटी में हुई कटौती दुकान की क़ीमत तक पहुंचती रहे, इस साल की असमान बारिश के बीच गांव की आमदनी को सहारा मिले, और छोटे दुकानदारों तथा वितरण नेटवर्क तक कर्ज़ आसानी से पहुंचे — क्योंकि आख़िरी बीस किलोमीटर वही तय करते हैं। अगर तीसरी तिमाही में भी यही रुझान दिखा, तो यह इस दशक के सबसे अहम आर्थिक संकेतों में गिना जाएगा।
यह ख़बर और विश्लेषण है, निवेश की सलाह नहीं। बाज़ार के आंकड़े सत्र के अनुसार दर्ज हैं और इनमें संशोधन संभव है।












