ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जो सालों तक कोई लक्षण नहीं दिखातीं, और जब दिखाती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। हेपेटाइटिस बी और सी इसी तरह की बीमारियां हैं। ये लिवर में बीस साल तक बैठी रह सकती हैं और फिर सीधे सिरोसिस या लिवर कैंसर के रूप में सामने आती हैं, जब इलाज महंगा हो जाता है और नतीजे अनिश्चित। ऐसी बीमारी का इंतज़ार नहीं किया जा सकता — उसे ढूंढ़ना पड़ता है। इसीलिए राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़े ठहरकर देखने लायक़ हैं: मार्च 2026 तक इस कार्यक्रम के तहत क़रीब 21.06 करोड़ लोगों की जांच हो चुकी थी और 1,153 उपचार केंद्रों पर लगभग 6.12 लाख हेपेटाइटिस बी और सी मरीज़ों का इलाज किया जा चुका था।
इसे शुरुआत के मुक़ाबले देखिए। 2018 में शुरू हुए इस कार्यक्रम ने वह काम अपने ज़िम्मे लिया जिसे कई अमीर देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं भी ढंग से नहीं कर पाईं — एक ऐसे संक्रमण के लिए पूरे देश में जांच, पहचान और मुफ़्त इलाज की व्यवस्था खड़ी करना, जिसके ज़्यादातर मरीज़ों को पता ही नहीं होता कि उन्हें यह बीमारी है। 21 करोड़ जांच का आंकड़ा लगभग ब्राज़ील की पूरी आबादी जितना है। इलाज का आंकड़ा उसके मुक़ाबले छोटा है, और होना भी यही चाहिए — जांच का मक़सद ही यह है कि जिन्हें संक्रमण नहीं है उन्हें सस्ते में अलग कर दिया जाए, ताकि महंगी व्यवस्था उन 6.12 लाख लोगों के लिए बचे जिन्हें उसकी सचमुच ज़रूरत है।
देर से पता चले तो महंगा पड़ता है: हेपेटाइटिस बी और सी बीस साल तक चुपचाप बढ़ सकते हैं। कार्यक्रम की पूरी अर्थव्यवस्था इसी बात पर टिकी है कि संक्रमण लिवर ख़राब होने से पहले पकड़ा जाए।
जांच का पूरा गणित एक बात पर टिका है — बीमारी जल्दी ढूंढ़ना, देर से इलाज करने से सस्ता है। 21 करोड़ जांच के साथ भारत ने यह दांव दुनिया के सबसे बड़े पैमाने पर लगाया है।
एक नज़र में
• कार्यक्रम: राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम, 2018 में शुरू
• जांच: मार्च 2026 तक क़रीब 21.06 करोड़ लोग
• इलाज: लगभग 6.12 लाख हेपेटाइटिस बी और सी मरीज़
• नेटवर्क: देशभर में 1,153 उपचार केंद्र
• अहमियत: पुराना हेपेटाइटिस सालों तक बिना लक्षण के रहता है, फिर सिरोसिस या लिवर कैंसर बनता है
इस मेहनत के पीछे चिकित्सकीय तर्क बहुत मज़बूत है। हेपेटाइटिस सी अब ज़्यादातर मामलों में बारह हफ़्ते की दवा से पूरी तरह ठीक हो जाता है, और जेनेरिक दवाओं ने — जिनमें बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों का है — इस इलाज की क़ीमत दस साल पहले के मुक़ाबले कई गुना घटा दी है। हेपेटाइटिस बी पूरी तरह ठीक नहीं होता, लेकिन दवा से इस पर काबू रखा जा सकता है और बीमारी बढ़ने का ख़तरा बहुत घट जाता है; और जन्म के समय लगने वाले टीके से इसे रोका भी जा सकता है। यानी एक ही बीमारी में भारत के पास वे तीनों औज़ार मौजूद हैं जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को शायद ही कभी एक साथ मिलते हैं — सस्ती जांच, सस्ता इलाज और काम करने वाला टीका।
आगे की चुनौती वही है जो हर बड़े जांच कार्यक्रम के सामने आती है, और उसे साफ़ कहना ज़रूरी है — जांच से इलाज तक की कड़ी। 21 करोड़ जांच की क़ीमत तभी है जब हर वह व्यक्ति जिसकी रिपोर्ट पॉज़िटिव आई, ढूंढ़ा जाए, उसकी पुष्टि हो, इलाज शुरू हो और पूरा भी हो। इस कड़ी में कई जगह लोग छूट जाते हैं, ख़ासकर प्रवासी मज़दूर और वे लोग जो उपचार केंद्र से दूर रहते हैं। रचनात्मक रास्ता यह है कि सफलता का पैमाना बदला जाए — कितनी जांच हुईं, इसकी जगह कितने इलाज पूरे हुए। साथ ही हर केंद्र के स्तर पर यह आंकड़ा सार्वजनिक हो कि जांच के बाद कितने मरीज़ इलाज तक पहुंचे, ताकि ज़िले देख सकें कि कड़ी कहां टूट रही है, और उपचार केंद्र ज़िला अस्पतालों तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक बढ़ते रहें। सबसे कठिन काम — मरीज़ों को ढूंढ़ना — भारत पहले ही कर चुका है। बाक़ी काम व्यवस्था और प्रबंधन का है, और यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें देश बार-बार अपनी क्षमता साबित कर चुका है।













