ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इस मौसम में गांव की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अहम आंकड़ा अब सही दिशा में बढ़ रहा है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़ 17 जुलाई तक खरीफ़ फ़सलों की बुवाई 658.19 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले साल इसी समय तक 700.47 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी — यानी 42.28 लाख हेक्टेयर या 6.04% की कमी। पर असली बात स्तर की नहीं, रफ़्तार की है: 10 जुलाई तक यह अंतर क़रीब 16% था और जून के आख़िर में लगभग 23%, जब मानसून देर से आने के कारण बुवाई पिछड़ गई थी। तब से बुवाई ने ज़ोर पकड़ा है, और जुलाई के मध्य तक सामान्य क्षेत्र (क़रीब 1.10 करोड़ हेक्टेयर) का लगभग 60% हिस्सा बोया जा चुका था।
बारीक़ी फ़सलों के बंटवारे में है, और वह एक-सी नहीं है। धान — खरीफ़ की सबसे बड़ी फ़सल और खाद्यान्न की रीढ़ — लगभग पिछले साल के बराबर है: 166.41 लाख हेक्टेयर, पिछले साल के 167.83 लाख के मुक़ाबले, यानी एक फ़ीसदी से भी कम की गिरावट। दालों की तस्वीर कठिन है — 81.52 लाख हेक्टेयर से घटकर 69.23 लाख हेक्टेयर, यानी 15.08% की कमी। दालों में भारत की आयात निर्भरता को देखते हुए यह कमी आगे चलकर खाने-पीने की महंगाई से सीधे जुड़ती है। यानी सुधार असली है, पर वह अनाज में केंद्रित है, हर फ़सल में बराबर नहीं।
भरता हुआ अंतर: 17 जुलाई तक 658.19 लाख हेक्टेयर बुवाई के साथ पिछले साल से अंतर घटकर 6.04% रह गया, जो हफ़्ता भर पहले क़रीब 16% था — धान लगभग बराबर, दालें 15.08% पीछे।
देर से आकर भरपूर बरसने वाला मानसून सिर्फ़ परेशानी है। देर से आकर जल्दी लौट जाने वाला मानसून बजट की समस्या बन जाता है। अभी तक यह पहली वाली स्थिति है।
एक नज़र में
• बुवाई (17 जुलाई तक): 658.19 लाख हे. बनाम 700.47 लाख हे. — 6.04% कम
• रफ़्तार: अंतर 10 जुलाई तक ~16% और जून के अंत में ~23% था
• धान: 166.41 लाख हे. बनाम 167.83 लाख हे. — 0.84% कम
• दालें: 69.23 लाख हे. बनाम 81.52 लाख हे. — 15.08% कम
इसका असर सीधे ग्रामीण मांग पर पड़ता है, जो देश की कुल मांग का एक बड़ा और उतार-चढ़ाव वाला हिस्सा है। बुवाई का क्षेत्र सुधरने से त्योहारी तिमाही तक किसानों की आमदनी को सहारा मिलता है, और उससे वे क्षेत्र मज़बूत होते हैं जो गांव की जेब से चलते हैं — दोपहिया वाहन, सस्ते टिकाऊ उपभोक्ता सामान, रोज़मर्रा का सामान, कृषि-आदान और ग्रामीण क़र्ज़ देने वाली संस्थाएं। दालों की कमी दूसरी दिशा में इशारा करती है, यानी दूसरी छमाही में खाद्य महंगाई पर नज़र रखनी होगी, अगर इसकी भरपाई आयात या मज़बूत रबी से न हो। आगे अगस्त में बारिश का वितरण और जलाशयों का स्तर बुवाई के आंकड़े से भी ज़्यादा मायने रखेगा।
आगे का रचनात्मक रास्ता वही साधारण-सा दिखने वाला काम है जो एक सुधरे मौसम को टिकाऊ मज़बूती में बदलता है। देर से हुई बुवाई के कारण सिमटे कैलेंडर में समय पर अच्छी गुणवत्ता का बीज और खाद पहुंचाना; सिंचाई और सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार ताकि खेती मानसून के आने की तारीख़ पर कम निर्भर रहे; दालों और तिलहन के लिए बेहतर क़ीमत का भरोसा और ख़रीद व्यवस्था, ताकि किसान वही बोए जिसकी देश को सचमुच ज़रूरत है; और भंडारण तथा बाज़ार तक पहुंच, ताकि अच्छी फ़सल औने-पौने दाम पर न बिके। तीन हफ़्तों में 23% से 6% तक सिमटा अंतर बताता है कि व्यवस्था ने अच्छा जवाब दिया। अब काम यह है कि अगली बार मानसून की देरी और छोटी घटना बनकर रह जाए।











