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भारत निचले वर्ग में: अपने ही एक क़ानून ने अमेरिकी शुल्क की मार हल्की कर दी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 27, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।24 जुलाई को जब अमेरिका का अस्थायी 10% अधिभार ख़त्म हुआ, तो वह ग़ायब नहीं हुआ — उसकी जगह एक नई व्यवस्था ने ले ली। अमेरिका ने ज़बरन श्रम (फ़ोर्स्ड लेबर) से बने सामान को लेकर क़रीब 60 व्यापारिक साझेदारों पर सेक्शन 301 के तहत नया शुल्क लगाया है, जो दो वर्गों — 10% और 12.5% — में बंटा है। भारत निचले 10% वर्ग में है। इसकी वजह घरेलू है: 14 जून को भारत ने अपनी विदेश व्यापार नीति में संशोधन कर ज़बरन श्रम से बने सामान के आयात पर रोक लगाई, और इसी क़दम ने उसे ऊंचे वर्ग से निचले वर्ग में पहुंचा दिया।

ब्योरा शीर्षक से ज़्यादा अहम है। भारत उन 17 देशों में है जिन पर 10% शुल्क है, और यह जून में सुझाए गए 12.5% से कम है। सबसे अहम बात — इस शुल्क से भारत के कई बड़े निर्यात वर्ग बाहर रखे गए हैं: जेनेरिक दवाएं, स्मार्टफ़ोन, इस्पात, एल्युमिनियम और वाहन कलपुर्ज़े। नई दिल्ली ने कहा है कि वह पहले चरण के द्विपक्षीय व्यापार समझौते को पूरा करने के लिए अमेरिका से बातचीत जारी रखेगी, जो बातचीत करने वालों के मुताबिक़ क़ानूनी मसौदे के आख़िरी हिस्से पर टिकी है।

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नीति ही ढाल बनी: 14 जून के आयात प्रतिबंध ने भारत को नए अमेरिकी शुल्क के निचले 10% वर्ग में रखा — 12.5% से कम — और जेनेरिक दवाएं, स्मार्टफ़ोन, इस्पात, एल्युमिनियम व वाहन कलपुर्ज़े इससे बाहर हैं।

सबसे सस्ती रियायत वही होती है जो देश वैसे भी देना चाहता था। ज़बरन श्रम पर रोक अपने आप में अच्छी नीति है — और उसने एक कम शुल्क भी दिला दिया।

एक नज़र में

• नया शुल्क: ~60 साझेदारों पर सेक्शन 301, दो वर्ग — 10% और 12.5%
• भारत: निचला 10% वर्ग — 17 देशों में शामिल
• वजह: 14 जून को ज़बरन श्रम से बने सामान के आयात पर रोक
• बाहर: जेनेरिक दवाएं, स्मार्टफ़ोन, इस्पात, एल्युमिनियम, वाहन कलपुर्ज़े

बीते साल से तुलना करें तो यह झटका नहीं, बल्कि तनाव में कमी है। अमेरिका पहले ही भारतीय सामान पर अपनी पारस्परिक दर 25% से घटाकर 18% कर चुका है, और अब जो वर्ग तय हुआ है, वह उन क्षेत्रों को छूट देता है जहां भारतीय निर्यातक सबसे मज़बूत हैं। बड़ा संदर्भ बढ़ते विकल्पों का है: भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीईटीए) 15 जुलाई से लागू है, जिससे 99% भारतीय सामान ब्रिटेन में शुल्क-मुक्त या कम शुल्क पर पहुंच रहा है, और यूरोपीय संघ के साथ बनी सहमति इसी तर्क को आगे बढ़ाती है। जिस निर्यातक के सामने कई खुले दरवाज़े हों, वह किसी एक शुल्क पर अलग ढंग से मोलभाव करता है।

आगे का रचनात्मक रास्ता उन्हीं दो चीज़ों पर टिका है जो भारत के अपने हाथ में हैं। पहली — व्यापार नियमों को उन मानकों के साथ जोड़ना जिन्हें भारत अपने हित में सही मानता है, जैसे श्रम, पर्यावरण और पारदर्शिता, ताकि नियम-पालन और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलें। दूसरी — अमल: निर्यातकों को नियम-उद्गम (रूल्स ऑफ़ ओरिजिन) के काग़ज़ात में दक्ष बनाना, लॉजिस्टिक्स और प्रमाणन को चुस्त रखना, और अमेरिकी मसौदे पर दस्तख़त होते ही माल भेजने के लिए तैयार रहना। शुल्क वाशिंगटन में तय होता है; उसके बाद बचने वाला मुनाफ़ा तैयारी से तय होता है।

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