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शिक्षा मंत्रालय में नया चेहरा, अदालत में सुधार की परीक्षा: भरोसा लौटाने की कोशिश तेज़

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 27, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।देश की सबसे अहम परीक्षा को इस सप्ताहांत एक नया संरक्षक मिल गया। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा आने के अगले ही दिन प्रल्हाद जोशी ने शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 75 के तहत इस्तीफ़ा स्वीकार किया और जोशी को यह ज़िम्मेदारी सौंपी। यह बदलाव एक अहम मोड़ पर आया है — सोमवार, 27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट नीट-यूजी में स्थायी सुधार की रूपरेखा पर सुनवाई करेगा, और संसद का मानसून सत्र भी शुरू हो चुका है, जिसमें सरकार यह भरोसा दे चुकी है कि परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही पर सदन में चर्चा होगी।

बदलाव और समय-सारणी दोनों को एक ही मक़सद जोड़ता है — उस परीक्षा की साख लौटाना जो तय करती है कि कौन डॉक्टर बनेगा। संसदीय लोकतंत्र में मंत्री का बदलना जवाबदेही का एक सामान्य तरीक़ा है, और यह बदलाव उस वक़्त हुआ है जब सुधार का एजेंडा पहले से लिखा जा चुका है। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने केंद्र और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) से विस्तृत योजना मांगी है — जिसमें नीट को पूरी तरह कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) में बदलने की प्रगति और उसके लिए ज़रूरी डेटा व साइबर सुरक्षा के इंतज़ाम शामिल हों। नए मंत्री को कोरा पन्ना नहीं, बल्कि अमल के इंतज़ार में खड़ी एक रूपरेखा मिली है।

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अमल के इंतज़ार में रूपरेखा: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद प्रल्हाद जोशी ने शिक्षा मंत्रालय का प्रभार संभाला; 27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट नीट-यूजी सुधार की योजना — जिसमें कंप्यूटर आधारित परीक्षा की ओर बढ़ना शामिल है — पर सुनवाई करेगा।

परीक्षा दरअसल एक वादा है जो देश अपने नौजवानों से करता है — मेहनत करो, नतीजा सिर्फ़ तुम्हारा होगा। अभी खुला हर रास्ता इसी वादे को अटूट बनाने की कोशिश है।

एक नज़र में

• बदलाव: प्रधान के इस्तीफ़े के बाद प्रल्हाद जोशी को शिक्षा का अतिरिक्त प्रभार
• प्रक्रिया: प्रधानमंत्री की सलाह पर अनुच्छेद 75 के तहत इस्तीफ़ा स्वीकार
• अदालत: नीट-यूजी सुधार की रूपरेखा पर सुप्रीम कोर्ट में 27 जुलाई को सुनवाई
• संसद: मानसून सत्र शुरू; परीक्षा में जवाबदेही पर चर्चा का भरोसा

संस्थागत हलचल के बीच इस विवाद का मानवीय पहलू भी अनदेखा नहीं रहा। शुक्रवार को लिखित आश्वासनों के बाद 26 दिन का अनशन ख़त्म करने वाले शिक्षा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली हाईकोर्ट ने शनिवार को लगातार देखभाल के लिए मेदांता अस्पताल ले जाने की अनुमति दे दी — एक ऐसा फ़ैसला जो हर चीज़ से पहले उनकी सेहत को रखता है। छात्र प्रतिनिधियों और सरकार के बीच कुछ मतभेद अब भी खुलकर सामने हैं, और अगली बातचीत की जगह तय होनी बाक़ी है। पर यह कि ये मतभेद सड़क के बजाय अदालत, कैबिनेट और संसद के ज़रिए सुलझाए जा रहे हैं, अपने आप में एक ऐसे लोकतंत्र का संकेत है जो अपनी तकलीफ़ को खुले में हल कर रहा है।

आगे का रचनात्मक रास्ता अब असामान्य रूप से साफ़ है, क्योंकि समस्या की पहचान साझा है। हर साल दो करोड़ से ज़्यादा अभ्यर्थियों के लिए सुरक्षित परीक्षा राजनीति से पहले इंजीनियरिंग और संस्थागत बनावट की समस्या है: इसके लिए संतुलित प्रश्न-बैंक, केंद्र स्तर की निगरानी, बायोमेट्रिक पहचान और ऑडिट के भरोसेमंद रिकॉर्ड चाहिए — और यह सब राष्ट्रीय पैमाने पर बनाना होगा। सोमवार की सुनवाई में देश देखेगा कि यह ढांचा कितनी दूर पहुंचा; मानसून सत्र में जवाबदेही की बात रिकॉर्ड में आएगी; और नए मंत्री का पहला काम रूपरेखा को अमल में बदलना है। इसी गंभीरता के साथ एक व्यवस्था अपने उन छात्रों का भरोसा दोबारा कमाती है जो उस पर निर्भर हैं — किसी एक घोषणा से नहीं, बल्कि एक ऐसी परीक्षा से जो टिकती है।

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