ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।कुछ ही हफ़्ते पहले हैदराबाद के एक स्टार्टअप ने भारत को निजी रॉकेट से अंतरिक्ष तक पहुंचाने वाले चुनिंदा देशों में शामिल किया था। अब देश की अंतरिक्ष एजेंसी ने अपना इरादा सामने रखा है — एक के बाद एक सात उड़ानों वाला साल, जो इसरो के इतिहास के सबसे भरे-पूरे उड़ान कैलेंडरों में से एक होगा। इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने इसी महीने बताया कि एजेंसी इस वित्त वर्ष में सात मिशनों का लक्ष्य रख रही है, और अगली उड़ान करीब दो महीने में होने की उम्मीद है।
इस सूची में वह सब कुछ है जो एक आधुनिक अंतरिक्ष शक्ति एक साथ करने की कोशिश करती है। इसमें अमेरिका में बना करीब 6,500 किलोग्राम का एक भारी संचार उपग्रह है, जिसे इसरो आने वाले महीनों में छोड़ेगा — यानी भारतीय प्रक्षेपण पर दुनिया का भरोसा। इसके साथ मानसून, तटों और खेतों पर नज़र रखने वाले पृथ्वी-निगरानी उपग्रह हैं; भारत की पहली मानव अंतरिक्ष उड़ान ‘गगनयान’ की तैयारी है; और एक पुरानी रुकावट के बाद पूरी रफ़्तार दोबारा हासिल करने का काम है।
इक्का-दुक्का उड़ानों से एक नियमित कैलेंडर तक: इसरो ने सात उड़ानों वाला साल तय किया है, अगली उड़ान करीब दो महीने में और आगे अमेरिका में बना 6,500 किलो का संचार उपग्रह भी — प्रक्षेपण की रफ़्तार में बड़ा बदलाव।
अंतरिक्ष कार्यक्रम की परख सिर्फ़ इससे नहीं कि वह कितना ऊंचा पहुंचता है, बल्कि इससे भी कि कितनी बार। यही रफ़्तार एक राष्ट्रीय उपलब्धि को राष्ट्रीय क्षमता में बदलती है।
एक नज़र में
• लक्ष्य: इस वित्त वर्ष सात उड़ानें (इसरो प्रमुख वी. नारायणन)
• अगली उड़ान: करीब दो महीने में होने की उम्मीद
• वाणिज्यिक: अमेरिका में बना ~6,500 किग्रा का संचार उपग्रह आने वाले महीनों में
• आगे: पृथ्वी-निगरानी उपग्रह और गगनयान की तैयारी
रफ़्तार किसी एक मिशन जितनी ही अहम क्यों है? क्योंकि लगातार, भरोसेमंद उड़ानें ही एक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था खड़ी करती हैं। तय समय पर उड़ानें मिलने से भारतीय और विदेशी ग्राहक अपने उपग्रहों की योजना बना पाते हैं, कक्षा तक पहुंचने की असल लागत घटती है, और दो बड़ी उड़ानों के बीच हुनरमंद हाथ व्यस्त रहते हैं। यही लय विदेशी संचार उपग्रह भी ले जाती है और बाढ़ का नक़्शा बनाने व किसानों की मदद करने वाले उपग्रह भी, और धीरे-धीरे उन प्रणालियों को भी परखती है जो एक दिन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाएंगी।
ईमानदार बात यह है कि काग़ज़ पर रखा लक्ष्य मौसम, भौतिकी और रॉकेट-विज्ञान की कड़ी शर्तों से होकर गुज़रता है; सात उड़ानों का साल एक-एक उड़ान से कमाना होगा, यह पहले से मिली गारंटी नहीं है। सकारात्मक रास्ता वही अनुशासन है जो इसरो दिखा रहा है — रुकावट के बाद पूरा कैलेंडर बहाल करना, राजस्व और भरोसा लाने वाले वाणिज्यिक मिशन, और ऐसी साझेदारी जिसमें निजी कंपनियां छोटी-लगातार उड़ानें संभालें और एजेंसी सबसे कठिन मिशनों पर ध्यान दे। इस तरह देखें तो भरा-पूरा कैलेंडर एक अंतरिक्ष शक्ति की सबसे क़ीमती पूंजी बन जाता है: बार-बार कक्षा तक पहुंचने की आदत।












